आधा दर्जन से अधिक गांवों की 50 कॉलोनियों के सैकड़ों प्लॉट पर मकान की मंजूरी अटकी
इंदौर. विनोद शर्मा ।
29 गांवों का निगम सीमा में विलय हुए डेढ़ साल हो चुका है लेकिन आधा दर्जन गांवों की 100 से ज्यादा कॉलोनियों की फाइलें अब तक नगर निगम के पास नहीं पहुंची। दस्तावेज के बिना निगम उन कॉलोनियों में भी भवन अनुज्ञा जारी नहीं कर रहा है जिन्हें नियम-कायदे के साथ कटे 12-15 साल हो चुके हैं। उधर, घर बनाने की मंजूरी के लिए पंचायत और नगर निगम के बीच फुटबॉल बनकर रह चुके रहवासी अब विलय को कोसने लगे हैं।
भूमि विकास अधिनियम के कड़क प्रावधाना और शहरसीमा में जमीन संकट के बीच अर्से से तंगहाली झेल रहे नगर निगम के कॉलोनी सेल में 2014-15 में करीब 50 करोड़ का राजस्व प्राप्त हुआ। अफसर इसका जश्न मनाते इससे पहले ही निगम सीमा में जुड़े नए गांवों की कॉलोनी के बाशिंदों ने कॉलोनी सेल को कोसना शुरू कर दिया। चक्कर काटने के बाद भी भवन अनुज्ञा तो दूर उन्हें संतोषजनक जवाब तक नहीं मिल पा रहा है। यही नाराजगी की भी वजह है। हालांकि इस मामले में निगम स्पष्ट कर चुका है कि बार-बार पत्र लिखने के बाद भी छोटा बांगड़दा, बड़ा बांगड़दा, टिगरिया बादशाह, बिलावली, लिम्बोदी, पालदा जैसे गांवों से आधी कॉलोनियों की ही फाइलें मिली है। बिना कॉलोनी का नक्शा और प्लॉट लोकेशन देखे, हम भवन अनुज्ञा नहीं मिल सकती।
आखिर गर्इं कहां फाइलें...
छोटा बांगड़दा, बड़ा बांगड़दा, टिगरिया बादशाह, बिलावली, लिम्बोदी, पालदा जैसी पंचायतों का कहना है कि एसडीएम दस्तावेज लेकर नगर निगम को दे चुके हैं। नगर निगम कहता है कि उस तक दस्तावेज पहुंचे ही नहीं। ऐसे में सवाल यह उठता है कि दस्तावेज गए कहां? इस बीच संबंधित एसडीएम की भूमिका पर अंगुली उठ रही है। चर्चा इस बात की है कि अफसरों ने गांवों से फाइलें लेकर अपने पास रख ली। नगर निगम को दी ही नहीं। इसकी वजह तथाकथित हित बताई जा रही है।
अब तो स्वयं प्लॉटधारक भी कहने लगे हैं कि नगर निगम और पंचायत से निराश होकर हातोद एसडीएम के पास जाते हैं तो वहां टालमटौल होती है और बाद में फाइल ढूंढने के नाम पर पैसे मांगे जाते हैं। अब बिना परेशानी जिसको घर बनाना है उसे पैसा देना ही पड़ता है।
सबसे ज्यादा परेशानि छोटा बागंड़दा में
निगम अफसरों की मानें तो सबसे ज्यादा दिक्कत छोटा बांगड़दा पंचायत में हेैं जहां सबसे ज्यादा वैध-अवैध कॉलोनियां हैं। सिर्फ वही फाइलें निगम तक पहुंची है जिनमें बिल्डरों ने रुचि ली। व्यंकटेश विहार, सुविधिनगर और विद्या पैलेस जैसी उन कॉलोनियों की फाइलें नहीं पहुंची जो वर्ष 2000 या उससे पहले विकसित हो चुकी थीं। इसी तरह पालदा से अब तक सिर्फ 4 कॉलोनियों की फाइल पहुंची है जबकि कॉलोनियां हैं करीब दर्जनभर। निगम सेल के आला अधिकारी बताते हैं कि जिन कॉलोनियों के मामले सामने आते हैं उनकी जानकारी के लिए कलेक्टर को लिख देते हैं कुछ दिन में फाइल मिल जाती है।
फाइल न होने से दिक्कत क्या...?
-- दस्तावेज न मिलने तक निगम कैसे तय करे कि कॉलोनी वैध है या अवैध?
-- भवन अनुज्ञा के लिए प्लॉट होल्डर को रजिस्ट्री की कॉपी लगाना होती है जिसका मिलान कॉलोनी के नक्शे के आधार पर करना पड़ता है। नक्शे के बिना कैसे पता चलेगा निगम को कि कहां सड़क है, कौनसी जमीन बगीचे की है, कौनसी स्कूल की? कौनसा प्लॉट कहां है?
-- मिलान होने के बाद ही प्लॉट को नक्शा मंजूरी के लिए पात्र माना जाता है। वरना नक्शा रिजेक्ट्।
एसडीएम कार्यालयों पर शंका क्यों?
विलय से पहले गांवों की अपनी पंचायत थी, अपने पंच थे। अपने नियम थे। गजट नोटिफिकेशन के बाद पंचायतों के अधिकार खत्म हुए और गांवों को निगम सीमा से जोड़ दिया गया। इस काम में प्रशासनिक स्तर पर ही अंजाम दिया गया। पंचायतों से गांव के राजस्व व कॉलोनियों-मकानों-मार्केट की अनुमति से संबंधित दस्तावेज जब्त करके निगम को लौटाने की जिम्मेदारी भी एसडीएम की थी।
इंदौर. विनोद शर्मा ।
29 गांवों का निगम सीमा में विलय हुए डेढ़ साल हो चुका है लेकिन आधा दर्जन गांवों की 100 से ज्यादा कॉलोनियों की फाइलें अब तक नगर निगम के पास नहीं पहुंची। दस्तावेज के बिना निगम उन कॉलोनियों में भी भवन अनुज्ञा जारी नहीं कर रहा है जिन्हें नियम-कायदे के साथ कटे 12-15 साल हो चुके हैं। उधर, घर बनाने की मंजूरी के लिए पंचायत और नगर निगम के बीच फुटबॉल बनकर रह चुके रहवासी अब विलय को कोसने लगे हैं।
भूमि विकास अधिनियम के कड़क प्रावधाना और शहरसीमा में जमीन संकट के बीच अर्से से तंगहाली झेल रहे नगर निगम के कॉलोनी सेल में 2014-15 में करीब 50 करोड़ का राजस्व प्राप्त हुआ। अफसर इसका जश्न मनाते इससे पहले ही निगम सीमा में जुड़े नए गांवों की कॉलोनी के बाशिंदों ने कॉलोनी सेल को कोसना शुरू कर दिया। चक्कर काटने के बाद भी भवन अनुज्ञा तो दूर उन्हें संतोषजनक जवाब तक नहीं मिल पा रहा है। यही नाराजगी की भी वजह है। हालांकि इस मामले में निगम स्पष्ट कर चुका है कि बार-बार पत्र लिखने के बाद भी छोटा बांगड़दा, बड़ा बांगड़दा, टिगरिया बादशाह, बिलावली, लिम्बोदी, पालदा जैसे गांवों से आधी कॉलोनियों की ही फाइलें मिली है। बिना कॉलोनी का नक्शा और प्लॉट लोकेशन देखे, हम भवन अनुज्ञा नहीं मिल सकती।
आखिर गर्इं कहां फाइलें...
छोटा बांगड़दा, बड़ा बांगड़दा, टिगरिया बादशाह, बिलावली, लिम्बोदी, पालदा जैसी पंचायतों का कहना है कि एसडीएम दस्तावेज लेकर नगर निगम को दे चुके हैं। नगर निगम कहता है कि उस तक दस्तावेज पहुंचे ही नहीं। ऐसे में सवाल यह उठता है कि दस्तावेज गए कहां? इस बीच संबंधित एसडीएम की भूमिका पर अंगुली उठ रही है। चर्चा इस बात की है कि अफसरों ने गांवों से फाइलें लेकर अपने पास रख ली। नगर निगम को दी ही नहीं। इसकी वजह तथाकथित हित बताई जा रही है।
अब तो स्वयं प्लॉटधारक भी कहने लगे हैं कि नगर निगम और पंचायत से निराश होकर हातोद एसडीएम के पास जाते हैं तो वहां टालमटौल होती है और बाद में फाइल ढूंढने के नाम पर पैसे मांगे जाते हैं। अब बिना परेशानी जिसको घर बनाना है उसे पैसा देना ही पड़ता है।
सबसे ज्यादा परेशानि छोटा बागंड़दा में
निगम अफसरों की मानें तो सबसे ज्यादा दिक्कत छोटा बांगड़दा पंचायत में हेैं जहां सबसे ज्यादा वैध-अवैध कॉलोनियां हैं। सिर्फ वही फाइलें निगम तक पहुंची है जिनमें बिल्डरों ने रुचि ली। व्यंकटेश विहार, सुविधिनगर और विद्या पैलेस जैसी उन कॉलोनियों की फाइलें नहीं पहुंची जो वर्ष 2000 या उससे पहले विकसित हो चुकी थीं। इसी तरह पालदा से अब तक सिर्फ 4 कॉलोनियों की फाइल पहुंची है जबकि कॉलोनियां हैं करीब दर्जनभर। निगम सेल के आला अधिकारी बताते हैं कि जिन कॉलोनियों के मामले सामने आते हैं उनकी जानकारी के लिए कलेक्टर को लिख देते हैं कुछ दिन में फाइल मिल जाती है।
फाइल न होने से दिक्कत क्या...?
-- दस्तावेज न मिलने तक निगम कैसे तय करे कि कॉलोनी वैध है या अवैध?
-- भवन अनुज्ञा के लिए प्लॉट होल्डर को रजिस्ट्री की कॉपी लगाना होती है जिसका मिलान कॉलोनी के नक्शे के आधार पर करना पड़ता है। नक्शे के बिना कैसे पता चलेगा निगम को कि कहां सड़क है, कौनसी जमीन बगीचे की है, कौनसी स्कूल की? कौनसा प्लॉट कहां है?
-- मिलान होने के बाद ही प्लॉट को नक्शा मंजूरी के लिए पात्र माना जाता है। वरना नक्शा रिजेक्ट्।
एसडीएम कार्यालयों पर शंका क्यों?
विलय से पहले गांवों की अपनी पंचायत थी, अपने पंच थे। अपने नियम थे। गजट नोटिफिकेशन के बाद पंचायतों के अधिकार खत्म हुए और गांवों को निगम सीमा से जोड़ दिया गया। इस काम में प्रशासनिक स्तर पर ही अंजाम दिया गया। पंचायतों से गांव के राजस्व व कॉलोनियों-मकानों-मार्केट की अनुमति से संबंधित दस्तावेज जब्त करके निगम को लौटाने की जिम्मेदारी भी एसडीएम की थी।
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