Monday, June 29, 2015

उद्घाटन से पहले थमी स्कूल की सांस

खातीपुरा में पार्षद के घर के पीछे ठेकेदार का मनमाना निर्माण
अनुमान से डेढ़ गुना ज्यादा का ठेका फिर भी जवाब दे गया स्कूल
- ठेके से पहले ही शुरू हो गया था काम
इंदौर. विनोद शर्मा । 
दरकती दीवारें...। दीवारों का दामन छोड़ते बीम...। हाथ लगाते ही झड़ता प्लास्टर...। बिना इस्तेमाल के कबाड़ हो चुके इलेक्ट्रॉनिक बोर्ड और स्वीच...। खिड़की खोलते ही टूटते कांच...। यह हालात है खातीपुरा (सुखलिया) स्थित शासकीय माध्यमिक विद्यालय की। मप्र के वजनदार मंत्री के गृह क्षेत्र और मालवा के दमदार विधायक की विधानसभा में उनका काम बोले न बोले लेकिन उद्घाटन से पहले ही डेढ़ करोड़ का स्कूल जवाब दे चुका है। स्कूल के नाम पर बना घटिया सामग्री और कमीशनखोरी का यह नायाब नमूना क्षेत्रीय पार्षद के घर से चंद कदम दूर है लेकिन उन्होंने कभी घटिया निर्माण पर आपत्ति लेने की जहमत नहीं की।
भावी पीढ़ी का भाग्य बनाने वाले स्कूलों के निर्माण को लेकर जनप्रतिनिधि और नगर निगम कितने गंभीर है इसका अंदाजा खातीपुरा के निर्माणाधीन स्कूल की बदहाली देखकर ही लगाया जा सकता है। नगर निगम ने 10 अगस्त 2009 को बृजेंद्र कश्यप की फर्म मेसर्स बाबा डेवलपर्स को स्कूल बनाने का वर्कऑर्डर जारी किया था। लागत थी 1.59 करोड़ रुपए। काम सालभर में पूरा होना था। पूरा हुआ 2011-12 में। फिनिशिंग जनवरी 2013 तक चली। 29 जनवरी को ठेकेदार स्कूल में रखा अपना सामान भी ले जा चुका है। शुरुआत से ही स्कूल के निर्माण में इस्तेमाल हो रही सामग्री को लेकर शिकायतें हुई लेकिन न ठेकेदार से उपकृत हो चुके पार्षद ने उनके निराकरण में रुचि ली, न ही निगम के नुमाइंदों ने। नतीजा यह निकला कि फीता कटने से पहले ही बिल्डिंग की दीवारें फट गईं।
63 प्रतिशत ज्यादा में दिया ठेका, फिर भी गड़बड़
आरटीआई के तहत प्राप्त दस्तावेजों की मानें तो नगर निगम ने स्कूल की लागत 97,85,000 आंकी थी जबकि मेसर्स बाबा डेवलपर्स को ठेका दिया गया 1,59,49,550 रुपए में। अंतर सीधे 63 प्रतिशत का। नियमानुसार ठेका 20 प्रतिशत से अधिक राशि पर नहीं दिया जाता, फिर इस कंपनी पर इतनी मेहरबानी क्यों? यदि 63 प्रतिशत ज्यादा में भी ठेका दिया था तो गुणवत्ता की ग्यारंटी क्यों नहीं ली गई? क्यों उद्घाटन से पहले ही स्कूल भवन जवाब दे गया? इन सवालों का जवाब जानने में जुटे क्षेत्रीय रहवासियों और स्कूल स्टाफ की मानें तो स्कूल की लागत 90 लाख से ज्यादा नहीं आई, बाकी के 70 लाख रुपए तो क्षेत्रीय विधायक, पार्षद और अधिकारी ठेकेदार के साथ मिलकर जीम गए।
वर्कआर्डर से पहले ही ठेकेदार ने शुरू कर दिया था काम
जिम्मेदारों और ठेकेदारों की मिलीभगत का अंदाजा इस बात से भी लगाया जा सकता है कि वर्कऑर्डर भले अगस्त 2009 में जारी हुआ जबकि काम मार्च 2009 से पहले ही शुरू हो चुका था। क्षेत्रवासियों के आरोप की पुष्टि गुगल अर्थ भी करता है। गुगल अर्थ के मुताबिक जिस जमीन पर स्कूल बना है उस पर अक्टूबर 2008 तक दो-तीन पुराने भवन बने थे। मार्च 2009 तक इन भवनों को यथास्थिति रखते हुए 6200 वर्गफीट पर नया भवन आकार लेने लगा था। भवन की ग्राउंड फ्लोर का काम हो चुका था। इससे पहले पेड़ों की कटाई हुई। खुदाई हुई। भराव हुआ। यानी काम दो महीने पहले जनवरी 2009 में ही शुरू हो चुका था जबकि कंपनी को वर्कऑर्डर जारी हुआ 10 अगस्त 2009 को। इसके दो मायने हैं। एक, ठेका पहले किसी और को मिला हो। दूसरा, पार्षद और अधिकारियों की सांठगांठ से ठेकेदार ने पहले ही काम शुरू कर दिया हो। वह भी उस स्थिति में जब काम का प्रस्ताव (क्र. 302) ही 19 जून 2009 को हुई महापौर परिषद की बैठक में मंजूर हुआ था। इसके बाद परिषद ने मंजूरी दी। वैसे भी वर्कऑडर में कहीं भी नहीं लिखा है कि यह काम पहले किसी और फर्म को दिया गया था।
ब्लैक लिस्टेड हो कंपनी...
क्ष्ेात्रवासियों की मानें तो बृजेंद्र कश्यप की फर्म मेसर्स बाबा डेवलपर्स को ज्यादातर काम गौरीनगर क्षेत्र में मिले हैं। कंपनी ने जितने भी काम किए हैं वे सब घटिया हैं। इससे पहले 2011-12 में फर्म ने न्यू गौरीनगर में केले के गोदाम के पास जो सीवरेज लाइन डाली थी वह सालभर नहीं चली। चैम्बर टूट गए। पाइप फूट गए। क्षेत्रीय जनप्रतिनिधियों का वरदहस्त प्राप्त इस फर्म को नगर निगम को ब्लैक लिस्टेड कर देना चाहिए।

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