Sunday, June 28, 2015

संपत्ति कर चोरी : सुंधार का सुनियोजित खेल MAHAPOR KE MAHACHOR


मुख्यालय के मुखिया ही मेहरबान
- जोनों से ज्यादा खेल मूल काउंटर पर
इंदौर. चीफ रिपोर्टर ।
संपत्ति कर के नाम पर नगर निगम में हो रही राजस्व की सेंधमारी की जड़ें जोनों पर कम, मुख्यालय पर ज्यादा फैली है। यहां पदस्थ सहायक राजस्व अधिकारी और एलबिज सिस्टम प्रा.लि. के कर्मचारी मिलकर नामांतरण-संशोधन के नाम हर दिन खातेदारों को लाखों का फायदा पहुंचाया जा रहा है। इस खेल को अंजाम दे रहे आला अफसर संशोधन डेस्क के लंबे-चौड़े लबाजमें को गिने-चुने लोगों के बीच समेटे बैठे हैं। लीज के लाखों खातें लावारिस हैं। उनकी जिम्मेदारी लेने को कोई तैयार ही नहीं। हां, फायदा पहुंचाकर माल कमाना है तो हर कोई तैयार है।
जितनी हेराफेरी सब जोन मिलाकर होती है उससे ज्यादा हेराफेरी को निगम के नुमाइंदे मुख्यालय में बैठे-बैठे आला अधिकारियों की नजर के सामने अंजाम दे रहे हैं। हिस्से की भूख के बीच न कोई रोकने वाला है। न कोई टोकने वाला। संशोधन के नाम पर किसी का क्षेत्रफल कम कर दिया जाता है तो किसी के संपत्ति कर का आंकड़ा। कई बार चेक लेकर खातेदार के खाते में उक्त रकम जमा बता दी जाती है लेकिन बाद में चेक बाउंस होने के बाद भी उसे ले देकर हटाया नहीं किया जाता। हर साल ऐसे 500 से ज्यादा चेक सामने आते हैं लेकिन निगम ने अब तक कुछ ही लोगों पर चेक बाउंस की धारा के तहत प्रकरण दर्ज कराए हैं।
खातों में सुधार का पासवर्ड सिर्फ मुख्यालय पर बैठे लोगों के पास है। उसी का फायदा उठाकर वे अपनी जेब भर रहे हैं। मुख्यालय एआरओ, उपायुक्त, अपर आयुक्त से लेकर इस मामले की कड़ी एमआईसी सदस्यों के कैबिन तक भी पहुंचती है जो अपने इशारों पर साल में दो पांच बड़े संसोधन कराकर अच्छी खासी रकम उगाते हैं।
सिकुड़ गया संशोधन..
-- निगम मुख्यालय में संसोधन टीम में कभी चार एआरओ हुआ करते थे जबकि अब सिर्फ एक ही है। एआरओ में पासवर्ड सिर्फ उसके पास है।  नाम, मात्रा, पते, सरनेम जैसी गलतियां दुरुस्त करने के साथ वहीं पांच गुना पेनल्टी के प्रकरण भी देख रहा है। एनओसी के मामले भी वही देखता है। उसकी मॉनिटरिंग स्वयं उपायुक्त अभय राजनांदगांवकर करते हैं। इससे पहले कैलाश विजयवर्गीय ने महापौर रहते जो संसोधन टीम बनाई थी उसमें तीन उपायुक्त, चार एआरओ और मस्टरकर्मियों की अच्छीखासी फौज थी। मकसद था काम जल्द हों और भ्रष्टाचार भी कम हो। अभी संशोधन यूनिट में सिर्फ तीन ही लोग हैं अरविंद नायक, रमेश जोशी और संजय यादव।
-- यही तीन पूरे शहर के खातों में संशोधन, एनओसी में परिवर्तन, गलत सर्विस नंबर से कटी रसीदों का निपटान, बाउंस चेक का चेक रिटर्न संशोधन, चेक की रसीदों के हंटिंग होने का संशोधन करते हैं। यह एआरओ की सुनेंगे या उसके खासमखास की। दूसरे की नहीं। रिकार्ड मांगने वालों से आवेदन लेकर मूल फाइल की कॉपी न देकर कम्प्यूटर शिट थमा दी जाती है।
-- अब जब संपत्ति कर के बिलों में भारी गड़बड़ियां सामने आ रही है तो निगम के आला अफसरों और महापौर को पुरानी टीम का स्वरूप फिर याद आने लगा है। आईडीए, हाउसिंग बोर्ड सहित सरकारी संपत्तियों में भी बड़े संसोधन हुए हैं। बीएसएनएल, बिजली कंपनी, वक्फ बोड्र की संपत्तियों को एक रुपए का कर नहीं मिलता।
मोटी इंकम का खेल है लीज...
चूंकि नगर निगम का अस्तित्व सवा सौ साल पुराना है लिहाजा उसकी लीज संपत्तियों का लेखाजोखा भी लंबा है। लीज शाखा और उसका कम्प्यूटराइजेशन कमजोर कड़ी है। जोर सिर्फ टॉकिज, पुरानी बड़ी इमारतों और विवादास्पद जमीनों तक ही सीमित है। मनोरमागंज, स्नेहलतागंज, शिवाजीनगर, राजमोहल्ला, उषा फाटक, रोशनसिंह भंडारी मार्ग, केसरबाग रोड की संपत्तियां अवेरने को कोई तैयार ही नहीं है। लीज सेल बनाने के मामले को पांच साल से पहल का इंतजार है।
दो दशक पुराने अससेमेंट से ही कर...
कीबे कंपाउंड, छोटी ग्वालटोली, बस स्टैंड के आसपास वर्षों से असेसमेंट हुआ ही नहीं। दो दशक पुराने असेसमेंट के आधार पर ही संपत्ति कर लिया जा रहा है जबकि इस दौरान क्षेत्र में कई पुराने निर्माणों ने आसमान छू लिया है। कई बड़ी संपत्तियों के फ्लोर छूटे हुए हैं। इनमें होटलें भी शामिल है।
‘सर्वे’ ही बड़ा खेल...
विजयवर्गीय ने महापौर रहते 0 असेसमेंट का सर्वे कराया था। अच्छी सफलता मिली। हजारों खाते बढ़े। बाद में मामला ठंडा पड़ गया। इसके बाद डॉ.उमाशशि शर्मा ने हैदराबाद की कंपनी को सर्वे की जिम्मेदारी दी थी। वार्ड-60 से शुरू हुए सर्वे के बाद कंपनी ने 15 दिन में ही चौकाने वाली रिपोर्ट देते हुए कहा था कि 70 फीसदी क्षेत्र संपत्ति कर से छूटा हुआ है। इसके बाद कंपनी को 27 वार्डों की जिम्मेदारी दी गई लेकिन कंपनी स्थानीय कलाकारों की मनमानी के आगे घुटने टेक भाग गई।
पांच गुना पेनल्टी के नाम मिला भरपल्ले पैसा...
फैली हुई संपत्तियों को सिकुड़ी बताकर संपत्ति कर चोरी करने वालों के खिलाफ निगम  ने 5 गुना पेनल्टी का नियम लागू किया था। इसमें 170 मामले सामने आए थे। इन सभी मामलों को निगम मुख्यालय पर बैठे अधिकारियों ने ले देकर रफा दफा कर दिया। किसी को दो प्रतिशत पेनल्टी लेकर छोड़ा तो कई ऐसे हैं जिन पर पेनल्टी का मुद्दा ही सिरे से खारिज कर दिया गया।

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