Sunday, June 28, 2015

मशहुरियत के मुकाम पर 'मच्छरÓ TIKHI KALAM

राजनीतिक नारों, नेता के तानों, जोक्स से लेकर सोशल साइट्स तक में चर्चा का विषय
तीखी कलम
विनोद शर्मा
'किंग ऑफ रोमांसÓ मशहूर फिल्म निर्माता-निर्देशक यश चौपड़ा को अपना शिकार बनाकर डेंग मच्छर पहले ही हाईप्रोफाइल पहचान बना चुका है। राष्ट्रपति से रहम की दरखास किए बैठै आतंकी अजमल कसाब को काटकर यही मच्छर हिंदुस्तान के राष्ट्रीय कीड़े होने का खिताब भी अपने नाम कर चुका है। मुंबई-पूणे-पटना-पणजी-पटियाला और दिल्ली जैसे शहरों में अपनी दहशतगर्दी का सिक्का जमा चुका 'मच्छरÓ राजनीतिक गलियारों और नेताओं के नारे से लेकर सोशल साइट्स तक भी अपनी अमिट छाप छोड़ चुका है। 'मच्छरÓ कभी डंक से डराता है तो चुटकुलों में 'सन ऑफ सरदारÓ की जगह लेकर गुदगुदाता भी है। आज मच्छर व्यंगकारों की कलम से छूटा 'कटाक्षÓ है तो प्रेमरस से बोर कवियों के लिए नया 'सब्जेक्टÓ।
'मच्छरÓ द्वारा अपनी महानता का लोहा मनवाने का सिलसिला नया नहीं बल्कि 1996-97 से जारी है। शायद इसीलिए फिल्म 'यशवंतÓ में नाना पाटेकर 'एक मच्छर..Ó का बखान करते नजर आए थे। 15 वर्षों में वक्त बदला तो मच्छरों का मुकाम भी बदला। कभी गरीब को अपने डंक से डराता रहा मच्छर अब 'मशहूरोंÓ का शिकार कर मशहुरियत की मिसाल बन चुका है।
''मंजिले उनको मिलती है जिनके सपनो में जान होती है
पंख से कुछ नही होता होसले से उडान होती हैÓÓ
सार्वजनिक मंच पर हौसलाअफजाही का तकिया कलाम बन चुके इस शैर को मच्छरों ने गंभीरता से लिया। किस्मत ने भी साथ दिया। उनके पास पंख भी थे और हौसले भी। यानी उड़ान दो गुनी हो गई। इसीलिए सोच-समझ में वे हर खासोआम से आगे निकल गए। शायद यही वजह है कि आज मच्छर से निपटने के लिए राज्य से लेकर केंद्र सरकार तक 'युद्धस्तरीÓ अभियान का ऐलान कर चुकी है। कहीं एसटीएफ की तरह टास्क फोर्स गठित की जा रही है तो कहीं मच्छर से मुकाबले के लिए मच्छरदानियों का दान जारी है।
मच्छर आम हिंदुस्तानी की तरह हिंद हितैषी है। कई मामलों में आम आदमी से आगे है मच्छर। इसीलिए तो मुंबई हमले के हमलावर कसाब को मिल रहे वीआईपी ट्रिटमेंट पर आम आदमी सिर्फ टिका-टिप्पणी करता रह गया। उधर, मौका मिलते ही मच्छर अपना काम दिखा गया। फांसी के फैसले पर सरकारी सुस्ती से बोर हो चुके मच्छर को राष्ट्रहित में मामला अपने हाथ लेना पड़ा। यश चौपड़ा के डेंगू से देहांत के बाद लोगों में मच्छर के प्रति जो रोश और नाराजगी थी उसे उसने कसाब को काटकर दूर कर दिया। आज लोग सचिन-धनराज भूलकर मच्छर को भारत रत्न और पद्म भूषण का दावेदार बता रहे हैं। बताए भी क्यों न? जो काम मनमोहन-मोदी-ममता-मुलायम-शिव सरकार नहीं कर सकी, वो मच्छर ने जो कर दिखाया। उसने राजनीतिक पकड़ भी मजबूत कर ली। आगामी चुनाव में मच्छर ने रुचि ले ली तो स्पष्ट बहुमत के साथ उसका सरकार बनाना भी तय है।  कांग्रेस-भाजपा की तरह मच्छरों की पार्टी भी राष्ट्रीय है। हर राज्य में मच्छरों का मुकम्मल मुकाम है। कहीं डेंगू के डर से वोट मिलेंगे तो कहीं मच्छर की देशभक्ति को देखकर।
ग्लोबलाइजेशन के दौर में फ्रीज, कुलर, पौधों और गंदे पानी में पनपने वाले मच्छर की पकड़ भी ग्लोबल हो गई है। फ्रांस मच्छर जनित बीमारियों की रोकथाम में व्यस्त है तो ब्राजिल अनौखे मच्छर पैदा करने में। देश-दुनिया में डेंगू मच्छर चर्चा में है। सब यही कहते हैं कि डेंगू मच्छर बहुत तंग कर रहा है, लेकिन सच यह है कि डेंगू का मच्छर किसी को नहीं काटता। सारी कारस्तानी उसकी बहन, बेटियों और पत्नी की होती है। वे इस बात से नाराज हैं कि अंतरराष्ट्रीय ख्याती पाने के बाद भी लोग मच्छर को लेकर गंभीर नहीं है। कोई किसी को डराने के लिए मच्छर के नाम की आड़ लेता है तो कोई अपनी हैसियत बताने में। ऐसे में मादाओं की नाराजगी जायज है। आखिर बड़े काम का बड़ा नाम और ईनाम मच्छर को मिलना ही चाहिए। उसका हक जो बनता है। खैर, इन तमाम बातों से मच्छर इत्तेफाक नहीं रखता। वह तो आजकल यही गुनगुनाता नजर आता है कि 'जबसे में थोड़ा बदनाम हो गया राम कसम मेरा बड़ा नाम हो गया।Ó 

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