लक्ष्मी फायर वर्क्स से आशंकित है लोग
गेट पर ताला डालकर लिखा है कारखाना बंद, अंदर बन रहे हैं सुतली बम
पांच किलोग्राम बारूद और सुतली देकर घर-घर में बनवा रहे हैं पटाखे
इंदौर. विनोद शर्मा ।
7 अक्टूबर 2011 दशहरे के दूसरे दिन राऊ की पटाखा फेक्टरी में अचानक विस्फोट के साथ लगी आग में एक महिला सहित 6 लोगों की मौत का मामला अभी ठंडा भी नहीं पड़ा है कि खंडवा रोड स्थित नौ मिल गांव का भविष्य बारूद के ढेर पर आकर टिक गया। यहां लक्ष्मी फायर वर्क्स नाम की पटाखा फेक्टरी है जहां, 'फेक्टरी बंद हैÓ, का बोर्ड लगाकर सूतली बम बनाने का काम जारी है। नियमों को तांक पर रखकर स्कूल और आबादी से सटकर बने इस कारखाने में आग से निपटने के लिए न पर्याप्त पानी है न ही रेत से भरी बाल्टियां। एश्टिंग््यूशर भी खाली पड़े हैं। बीते दिनों कंपनी परिसर में लगी आग और आग में झूलसे चौकीदार के परिवार ने कंपनी के पुख्ता सुरक्षा इंतजामों की पोल भी खोल दी। इतना ही नहीं कंपनी ग्रामीण श्रमिकों को पटाखा बनाने के लिए पांच किलो बारूद और एक किलोग्राम सुतली भी देती है जिससे गांव के कई घरों में बम बनाए जाते हैं।
सीमेंट की तरह बोरियों में भरा बारूद...। सूतली बम के ढेर के बीच बैठकर पटाखे बनाती महिलाएं...। गेट पर ताला डला है...। ऑफिस की दीवार पर लिखा है 'फैक्ट्री बंद है, आगामी आदेश तक...Ó। यह मंजर है खंडवा रोड पर दतौदा फाटे से लगे नौ मिल गांव का जिसका भविष्य गांव से लगी पटाखा फेक्टरी के बारूद पर टिका है। कंपनी में लगी आग से तीन लोग झुलसने के बाद पूरा गांव राऊ की तरह किसी बड़े हादसे की आशंका से आशंकित है। आशंकित हो भी क्यों न, बारूद के गोदाम से चंद कदम की दूरी पर स्कूल और आबादी जो ठहरी। वह भी उस स्थिति में जब राऊ हादसे में न सिर्फ अगल-बगल के मकानों को नुकसान पहुंचा था बल्कि 4 किलोमीटर दूर तक की जमीन थर्रा गई थी।
ऐसी है कंपनी...
कंपनी ग्राम दतौदा की सर्वे नं. 445/1 की 2.631 हेक्टेयर जमीन पर है। जमीन 341 साधुवासवानीनगर निवासी नरेंद्र पिता घनश्यामदास बालचंदानी के नाम दर्ज है। दतौदा रोड से लगी जमीन पर 11 अगल-अलग निर्माणों के रूप में कारखाना संचालित है। कारखाने का नाम लक्ष्मी फायर वर्क्स है। भारत सरकार के विस्फोटक विभाग से कंपनी को लाइसेंस प्राप्त है। लाइसेंस नं. ई/सीसी/एमपी/२०/३९(ई३८०३३) और ई/सीसी/एमपी/२1/2९(ई३८०३2) है। सड़क से लगे तीन निर्माण में चौकीदार-श्रमिक रहते हैं। एक में ऑफिस है। एक में बारूद का गौदाम। जहां सीमेंट की तरह बोरियों में बारूद भरा है। इसी गोदाम से चंद कदम की दूरी पर ही टीन शेड की वह खोली है जहां तेजसिंह और उसका परिवार आग में झूलसा था।
जो है और जो लिखा है उसमें अंतर है...
छोटे-छोटे जो निर्माण है उनमें से एक पर लिखा है मिक्सिंग शेड जिसकी क्षमता 10 किलोग्राम बारूद की है और यहां एक साथ चार लोग बैठकर काम कर सकते हैं। दूसरे शेड पर लिखा था फिलिंग शेड, जिसकी क्षमता 20 किलोग्राम बारूद की है और चार लोग बैठ सकते हैं। हालांकि इन शेड का इस्तेमाल सिर्फ स्टोर रूम की तरह हो रहा है। पटाखे बाहर बैठकर बनाए जा रहे हैं।
कारखाना बंद है...लेकिन काम जारी है...
गेट पर ताला डला रहता है। आवाज लगाने पर जिस ऑफिस के अंदर से चौकीदार चाबी लाकर दरवाजा खोलता है उसकी दीवार पर लिखा है कारखाना आगामी आदेश तक बंद है। अंदर धूप में बैठा महिलाओं का दो समूह सुतली बम बनाता नजर आ जाता है। सूरक्षा के नाम पर उनके पास बाल्टियां टंगी है। कुछ में रेत है तो कुछ खाली है। पानी के दो छोटे-छोटे होद है जिनमें बमुश्किल 50-50 लीटर पानी आता है। एस्टिंग्यूशर पुराने हैं। कुछ रिफिल्ड हैं। कुछ खाली।
50 फीट पर स्कूल और 50 मीटर पर आबादी...
जिस जगह पर बारूद का गोदाम और कारखाना है वहां से बमुश्किल 50 कदम की दूरी पर सरकारी स्कूल है जहां नौ मिल और दतौदा के ही नहीं बल्कि आसपास के गांवों से बच्चे पढऩे आते हैं। वहीं बमुश्किल 50 मीटर की दूरी पर झूग्गी आबादी है। ज्यादातर के मकान घास-फुस और टीनशेड के हैं। आसपास के लोगों ने बताया कि जब से राऊ में हादसा हुआ था तभी से दहशत में हैं लेकिन बीते दिनों यहां लगी आग ने डर को दोगुना कर दिया है। कारखाना कब कैसे बंद हो जाता है और कैसे शुरू हो जाता है इसकी जानकारी कोई नहीं देता।
पांच किलो बारूद और एक किलो सुतली...बन गया हर घर कारखाना
सूत्रों की मानें तो कंपनी द्वारा पांच किलोग्राम बारूद और एक किलो दिया जाता है। ओवरटाइम के रूप में श्रमिक इस सामग्री को ले जाकर घर में पटाखे बनाते हैं। उनके घरों में न तो आग बुझाने के लिए ढंग से पानी मिलता है न ही रेत की बाल्टी। उधर, दो नंबर से मंगाई गई बारूद से इस हिसाब को बराबर कर दिया जाता है।
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