Monday, June 29, 2015

पट्टे की जमीन पर केट special


- अधिग्रहण करके फर्जी मालिकों को बांट दिया था मुआवजा
- नामांतरण के 40 और अधिग्रहण के 30 साल बाद हुआ खुलासा
इंदौर. विनोद शर्मा।
राजा रमन्ना प्रगत प्रोद्योगिकी संस्था (आरआरकेट) के लिए 19 साल पहले नावदा पंथ की जो जमीन अधिग्रहित करते हुए लाखों रुपया मुआवजा बांटा गया था असल में वह पट्टे की जमीन थी। अनुसूचित जाति के लोगों को जमीन पट्टे पर दी गई थी जो अवैधानिक रूप से खरीदी-बेची गई। इसका खुलासा जमीन बिक्री के 30 साल बाद और जमीन अधिग्रहण 18 साल बाद हुई शिकायत के आधार पर की गई 40 साल बाद हुई जांच में हुआ। शिकायत भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी के कार्यकर्ताओं ने 2002 में की थी। शिकायत के 10 साल बाद हुए खुलासे के बाद जिला प्रशासन ने 16 में से 6 लोगों के खिलाफ मय ब्याज के मुआवजे की रकम वसूलने के आदेश जारी कर दिए हैं। उधर, कम्युनिस्ट भी बाकी से मुआवजा वसूली की मांग पर अड़े हैं। बहरहाल, शिकवा-शिकायत के दौर के बावजूद सरकार का रवैया बाकी के प्रति सुस्त है।
1983-85 के बीच तकरीबन 27 लोगों की तकरीबन 130 एकड़ जमीन अधिग्रहित की गई थी। उस वक्त तकरीबन 17 लाख रुपए से ज्यादा का मुआवजा तय हुआ था। काफी हिस्सा वितरित हुआ भी। कॉमरेड कैलाश गोठानिया और कॉमरेड रामचंद्र नाना की शिकायत पर मुआवजा वितरण बंद हुआ। तकरीबन 20 साल से जारी शिकवा-शिकायतों के दौर को सितंबर 2012 में अंजाम मिला। जब पहले एसडीएम और बाद में अपर कलेक्टर ने न सिर्फ कॉमरेड की आपत्तियों को जायज माना बल्कि छह के खिलाफ ब्याज सहित मुआवजा वसूली के आदेश भी जारी कर दिए। बाकी के खिलाफ कार्रवाई क्यों नहीं हुई? तमाम कोशिशों के बावजूद शिकायतकर्ताओं को इसका जवाब नहीं मिला। बहरहाल, 28 दिसंबर को कॉमरेड गोठानिया ने भू-अर्जन अधिकारी को पत्र लिखा। पत्र में उन्होंने लिखा कि केट के लिए नावदा पंथ की अधिग्रहित भूमि का मुआवजा रसूखदारों ने गैरकानूनी रूप से रजिस्ट्री कराकर हासिल किया था। छह लोगों से मुआवजा वसूली के आदेश तो जारी हुए थे लेकिन राशि वसूल हुई भी या नहीं? यह आज तक स्पष्ट नहीं ह़ुआ। यह भी स्पष्ट नहीं हुआ कि बाकी रसूखदारों के लिए प्रशासन की क्या रणनीति है।
जांच में सामने आया......
(1) 1958-59 में ग्राम नावदापंथ की जमीन सर्वे नं. 337/1 में से 27 अनुसूचित जाति के व्यक्तियों को पट्टा वंटन हुआ था।
(2) 1963-64 से 1970-71 तक राजस्व दस्तावेजों में शासकीय पट्टेदार नहीं लिखा गया था। पट्टेधारियों के नाम जमीन मालिक के रूप में दर्ज होने से जमीन बेच दी गई। 1972-73 में के्रेताओं का नामांतरण भी हो गया। नामांतरण पर उस वक्त किसी ने आपत्ति भी नहीं ली। कुल मिलाकर पट्टेदार ने बिना सक्षम स्वीकृति के गैरकानूनी तरीके से पट्टे की जमीन बेची।
(3) आरआरकेट की स्थापना में 1984-85 में जमीन अधिग्रहित की गई थी। चूंकि राजस्व रिकॉर्ड में क्रेताओं का नाम दर्ज था इसीलिए स्वत्व के आधार पर मुआवजा उन्हें दिया गया।
(4) नामांतरण 1972-73, 1974-75 और 1976-77 में हुआ। केट की स्थापना 1984-85 मे हुई। पहली शिकायत 2002 में यानी नामांतरण के 30 और अधिग्रहण के 18 साल बाद हुई।
दोषी कौन-कौन...?
राजस्व विभाग :- पट्टे दिए लेकिन जमीन पर सरकारी पट्टेदार नहीं लिखा।
पट्टेदार :- बिना सक्षम स्वीकृति बेची जमीन।
खरीदार :- न सिर्फ जमीन खरीदी बल्कि मुआवजा भी लिया।
राजस्व अधिकारी :- बिना जांचे-परखे नामांतरण किया।
अवैधानिक तरीके से खरीदी गई थी जमीन
जमीन अनुसूचित जाति के लोगों को पट्टे पर दी थी। इन लोगों की निरक्षरता का फायदा उठाकर वहां के रंगदार लोगों ने जमीन ओने-पोने दाम पर अपने नाम लिखवा ली। किसी को कीमत चुकाई तो किसी की कीमत पुरानी लेनदारी में बराबर कर दी गई।
कॉ. कैलाश गोठानिया, शिकायतकर्ता
अवैधानिक तरीके से खरीदी गई थी जमीन
रंगदारों ने न सिर्फ गैरकानूनी रूप से जमीन खरीदी बल्कि मुआवजा लेकर 28 वर्षों तक उसका इस्तेमाल किया। इसीलिए उनसे मुआवजे की रकम ब्याज सहित वसूल हो। जैसे 1984 से 2012 के बीच सोने की कीमत बढ़ी वैसे ही रुपए की भी बढ़ी। इसी बढ़ी हुई दर से हो वसूली हो। आपराधिक प्रकरण भी दर्ज हो।
कॉ.रामचंद्र नाना, शिकायतकर्ता
































जुलाई 1985 से मई 86 के बीच इन्हें दिया मुआवजा
नाम खसरा रकबा   मुआवजा यह थे असल मालिक
भगवान पिता हीरालाल 337/1/9 2.024 42,738 गंगाराम पिता रामा
सत्यनारायण देवीलाल 337/1/10 1.943 95,055 बुद्धा पिता नाथू
गणेश पिता मोतीराम "" "" " "" " "" बुद्धा पिता नाथू
अनिल पिता सदाशिव "" "" " "" " "" बुद्धा पिता नाथू
मांगीलाल, विष्णु, नारायण 337/1/7 2.024 42,738 जगन्नाथ पिता सुखराम
घनश्याम पिता रामनाथ 337/1/2 2.024 42,738 गोपाल पिता लाला
गोविंद पिता जगन्नाथ 337/1/24 2.024 42,738 आत्माराम पिता सुखराम
















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