Monday, June 29, 2015

यशवंत सागर की 200 एकड़ जमीन पर किसानों का कब्जा

- क्षमता बढ़ी, अधिग्रहण के 60 साल बाद फिर मांगा मुआवजा
- 1950 से पहले के दस्तावेजों से लगा सुराग, जांच शुरू
इंदौर. विनोद शर्मा । 
यशवंत सागर की क्षमता विस्तार से 15 गांवों की जितनी जमीन डूब प्रभावित बताई जा रही है उनमें 200 एकड़ से ज्यादा ऐसी है जो मुआवजा देकर सात दशक पहले ही अधिग्रहण की जा चुकी है। जमीन की मौजूदा कीमत सौ करोड़ से ज्यादा आंकी जा रही है। राजस्व निरीक्षक और पटवारियों की मदद से किसान जमीनों का नामांतरण करवाए बैठे हैं। इसका खुलासा राजस्व विभाग द्वारा नगर निगम को सौंपे गए सागर के शुरुआती दस्तावेजों में हुआ। बहरहाल, निगम प्रशासन की मानें तो दस्तावेजों की समीक्षा जारी है। समीक्षा के बाद ही कब्जे का वास्तविक आंकड़ा सामने आएगा।
आठ दशक पुराने यशवंतसागर की जल संग्रहण क्षमता में बढ़ोत्तरी को लेकर विवाद जारी है। विवाद निगम और उन ग्रामीणों के बीच हैं जो डूब प्रभावित जमीन पर अपनी मिल्कियत का दावा ठोक रहे हैं। दस्तावेजों की मानें तो सागर की क्षमता 2005 तक 522.70 मीटर थी जो 2012 तक 523.63 और 2013 में बढ़कर 524.00 मीटर तक पहुंच चुकी है। 2005 तक जहां 12 मिलियन क्यूबिक मीटर (एमसीएम) तक भरने वाला पानी इस बार 24 एमसीएम से ज्यादा भरेगा। सागर का संवरजन क्षेत्र (जहां पानी भरता है) भी 2,740 से बढ़कर 3,130 एकड़ से ज्यादा हो चुका है। अंतर 390 एकड़ का जिसे लेकर विवाद जारी है। सूत्रों की मानें तो जितने किसानों ने इस जमीन या इससे लगी जमीन पर अपना मालिकाना हक जताते हुए नगर निगम से डूब का मुआवजा मांगा है उनमें सौ से ज्यादा ऐसे हैं जिन्होंने 1950 के बाद जमीन पर नामांतरण करवाया। उनके पास 200 एकड़ से ज्यादा जमीन हैं। 1930 से 1940 के बीच होलकर स्टेट मुआवजा देकर यह जमीन अधिग्रहित कर चुकी थी। इसकी पुष्टि 1930 से 1950 के बीच जमीन के मालिकाना हक को लेकर निगम को जिला प्रशासन द्वारा सौंपे गए दस्तावेज भी करते हैं।
विवाद की जड़ तक पहुंचाया पुराने दस्तावेजों ने...
स्वयं राजस्व अधिकारियों की मानें तो प्रारंभिक जांच में ही कई ऐसे खसरें सामने आए हैं जिनका नामांतरण भले 1950 में हुआ हो लेकिन जमीन 1930 के दशक में ही अधिग्रहित की जा चुकी थी। यानी बाद में दस्तावेजों में छेड़छाड़ करके किसानों का नाम जोड़ा गया। हालांकि ऐसे सभी खसरों को सामने लाने में वक्त लगेगा क्योंकि खसरावार मौजूदा जानकारी लेकर उसका 60 साल पुराने दस्तावेजों से मिलान करके देखा जाना है।
फरवरी में लगाया था आवेदन...
नगर निगम ने फरवरी में प्रशासन को पत्र लिखकर सागर से जुड़ी संपूर्ण जमीन की खसरावार जानकारी मांगी थी। मकसद था मुआवजे को लेकर किसानों द्वारा बनाए जा रहे दबाव और क्षेत्रीय विधायक सत्यनारायण पटेल के विधानसभा में गुंज रहे प्रश्नों का जवाब देना। प्राप्त दस्तावेजों के आधार पर जमीन का भौतिक सत्यापन भी होगा।

''1950 के दस्तावेजों के आधार पर जांच कर रहे हैं। जब तक जांच पूरी नहीं होती और निष्कर्ष नहीं निकलता तब तक कुछ कहना जल्दबाजी होगी। जो किसान मुआवजे के वास्तविक हकदार हैं उन्हें ही मुआवजा देंगे। या जमीन के बदले जमीन।ÓÓ
कृष्णमुरारी मोघे, महापौर
किसानों की मांग
उषापुरा, गुलावट, कलमेर एवं सिकंदरी के किसानों ने बांध विस्तार के कारण जमीन डूब में आने की बात कही थी। जमीन के बदले जमीन की मांग की। मुआवजा मांगा था।
निगम का तर्क
महापौर ने जब निरीक्षण किया था तो पता चला था किसानों द्वारा जो जमीन डूब में बताई जा रही हैए वह जमीन यशवंत सागर की पाल है। जमीन के दोनो ओर सागर का पानी रहता है।
इसीलिए पड़ी प्रमाण की जरूरत
चूंकि जमीन के दोनों ओर सागर का पानी भरा रहता है। इसीलिए दोनो ओर पानी रहने से जमीन की मालिकाना हक के संबंध में प्रामाणीकरण किया जाना आवश्यक है।
कौनसे गांव और कितनी जमीन...
गांव जमीन
उषापुरा ७८९.२३१
खजरिया ६६७.७४५
फूल कराडिय़ा ३२३.८१५
अम्बाखेड़ी ३१५.४५१
गुलावट २५७.२५९
बड़ी कलमेर १९६.१९९
गुर्दाखेड़ी १४७.४१८
सिकंदरी १२४.४६०
सिंगावदा १२४.१९४
हातोद ७६.९१२
बोरसी ५१.124
लोडिंया २०.०००
माली बड़ौदिया १८.००
हिंगोनिया जागिर ११.७३५
रोजड़ी १1.४१६
(वर्षों पहले अधिग्रहित का मुआवजा मांगने वालों में ज्यादातर उषापुरा, खजूरिया, फूल कराडिय़ा, आम्बाखेड़ी, गुलावट और बड़ी कलमेर के किसान हैं। इनके नामों का खुलासा खसरा बी-1 के मिलान के बाद होगा।)

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