Monday, June 29, 2015

जीपीएस घोटाला -- दो साल से कंट्रोल रूम बंद, मॉनिटरिंग जारी


नगर निगम और एटूजेड की जुगलबंदी का कारनामा
इंदौर. विनोद शर्मा ।
जेएनएनयूआरएम से 43.50 करोड़ के संसाधन मिलने के बावजूद कचरा प्रबंधन में नाकाम रहे नगर निगम और ए-टू-जेड की जुगलबंदी ग्लोबल पोजिसनिंग सिस्टम (जीपीएस) के नाम पर दो साल से शहरवासियों की आंखों में धूल झोंक रही है। कचरा गाडिय़ों पर जीपीएस लगाकर नगर निगम कंट्रोल रूम बनाना भूल गया। यह नगर निगम की विलक्षण प्रतिभा ही है कि जिसके दम पर बिना कंट्रोल रूम के जीपीएस न सिर्फ सफलतापूर्वक चल रहा है बल्कि हर दिन रिपोर्ट भी जनरेट कर रहा है।
कचरे के नाम पर जमकर नगर निगम के खजाने में सेंध लगाई जा रही थी। इसकी रोकथाम और जेएनएनयूआरएम की गाइडलाइन का पालन करते हुए नगर निगम ने जुलाई 2011 में कचरा गाडिय़ों पर जीपीएस लगाने का काम पीसीएस टेक्रोलॉजी को सौंपा। पीसीएस ने नगर निगम की 150 से ज्यादा कचरा गाडिय़ों पर जीपीएस सिस्टम लगाए। जीपीएस इंस्टॉलेशन की लागत आई तकरीबन 20 लाख रुपए। इसी कड़ी में नगर निगम के कंट्रोल रूम पर सेंट्रलाइज कंट्रोल रूम बनाया जाना था ताकि वहां से इन कचरा गाडिय़ों की गतिविधियों पर निगाह रखी जा सके।  22 महीने में यह कंट्रोल रूम नहीं बना। जीपीएस लगी कचरा गाडिय़ां शहर की सड़कों पर सरपट दौड़ रही है। अब बिना कंट्रोल रूम के नगर निगम उन पर निगाह भी रखे तो कैसे?
कभी यहां, कभी वहां...
गाडिय़ों की गतिविधियों पर नजर रखने के लिए बनाया जाने वाला जीपीएस कंट्रोल रूम को लेकर शुरुआत में यह कहा जाता रहा कि स्वास्थ्य विभाग के कंट्रोल रूम के पीछे एटूजेड का जो कंट्रोल रूम है उसी में जीपीएस की मॉनिटरिंग मशीने भी लगी है। दबंग दुनिया ने जब कंट्रोल रूम का जायजा लिया तो वहां किसी तरह की कोई मशीन नजर नहीं आई। अलबत्ता वहां बैठे एक व्यक्ति ने कहा जीपीएस कंट्रोल रूम यहां नहीं, मलेरिया विभाग के कक्ष के पास है। मलेरिया विभाग के कक्ष के पास वर्षों से बंद चैनल गेट पर एक बैनर टंगा है। बैनर पर लिखा है 'जीपीएस/जीआरपीएस कंट्रोल रूम फॉर सॉलिड वेस्ट मैनेजमेंटÓ। पीछले तीन महीने से बंद चैनल गेट पर यह बैनर यूं ही टंगा है। पूछने पर किसी ने बताया नगर निगम के कंट्रोल रूम है जीपीएस व्यवस्था जबकि कंट्रोल रूम में सिवाय फोन लाइन व अन्य दस्तावेजों के अलावा कुछ नजर नहीं आया।
इसीलिए लगाए थे जीपीएस...
-- कचरा गाडिय़ों में कचरा कम भरा जाता है।
-- ट्रेंचिंग ग्राउंड जाने के बजाय गाडिय़ां इधर-उधर फेंक जाती थी कचरा। दस्तावेजों में ट्रेंचिंग ग्राउंड बताती थी। फायदा था डीजल का  पैसा बचाना।
-- हाईकोर्ट की सख्त हिदायत।
-- जेएनएनयूआरएम के मापदंड।
यहां लगने थे...
-- सभी कचरा गाडिय़ों पर।
-- सभी पानी के टेंकर पर।
नुकसान क्या..
-- जब कंट्रोल रूम ही नहीं होगा तो उन गाडिय़ों की मॉनिटरिंग कैसे होगी जिन पर जीपीएस लगाए गए हैं।
-- यदि मॉनिटरिंग ही नहीं होगी तो कैसे पता चलेगा कि कौनसी गाड़ी ट्रेंचिंग ग्राउंड तक पहुंची या नहीं।
-- एक कचरा गाड़ी ने कितने फेरे लगाए।
-- पानी के टेंकर जनता तक पहुंचे या किसी होटल या मॉल में खाली हो गए।

जनहित का मुद्दा ही नहीं है..
कंट्रोल रूम कहां है?
नगर निगम में।
नगर निगम में कहां?
हमने कंपनी को लगाने को कहा था।
कंपनी ने कहां लगाया?
यह कंपनी जाने। हमने जो अनुबंध किया था उसके मुताबिक जीपीएस की व्यवस्था कंपनी को ही करना थी। हमारा कोई लेना-देना नहीं है।
फिर नगर निगम मॉनिटरिंग कैसे रखता है?
मॉनिटरिंग की जिम्मेदारी भी कंपनी की है।
फिर भी शहरहित में तो कभी पूछा ही होगा कंपनी से?
नहीं, इसमें शहरहित से लेना-देना नहीं है। यह तो कंपनी के फायदे के लिए ही था। ताकि कंपनी को पता हो कौनसी गाड़ी कहां है।
आपको पता है कंपनी ने कंट्रोल रूम बनाया ही नहीं?
यह अपना विषय ही नहीं है। कंपनी जाने। हाईकोर्ट में भी कंपनी ने ही हलफनामा दिया है।
मुन्नालाल यादव, प्रभारी
स्वास्थ्य समिति
मेंटेनेंस का खर्च भारी पड़ गया...
वैसे मोबाइल पर मॉनिटरिंग जारी है
जीपीएस कंट्रोल रूम कहां है..?
वो है न, वर्मा के ऑफिस की तरफ जाते हैं उधर।
वह तो बंद पड़ा है?
हां, जीपीएस का मामला थोड़ा प्रॉब्लम में है।
क्या प्रॉब्लम है?
जीपीएस तो लगा रखा है लेकिन मेंटेनेंस खर्च ज्यादा होने के कारण दिक्कत आ रही है।
कितना खर्च?
दो लाख रुपए प्रति माह।
कब से बंद है कंट्रोल रूम।
महीने-दो महीने हुए हैं।
छह महीने पुराने फोटो तो हमारे पास ही है?
हां, तो छह-आठ महीने हो चुके होंगे बंद हुए।
फिर मॉनिटरिंग कैसे करते हो?
फोन पर।
फोन पर ?
हां, यह तो बहुत आसान है। वैसे भी हमने मैदानी अमला लगा रखा है।
विकास झा
डीजीएम एटूजेड


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