इंदौर-उज्जैन संभाग में तीन साल में बिगड़े मोतियाबिंद ऑपरेशन ने छीनी 25 की आंख
'मुआवजे का प्रावधान नहींÓ कहकर सरकार ने दे दी दोषियों को क्लीन चिट
इंदौर. चीफ रिपोर्टर ।
महू के अम्बाराम सिसोदिया ने दिसंबर 2010 में इंदौर नेत्र चिकित्सालय में मोतियाबिंद का ऑपरेशन कराया था। उम्मीद थी रोशनी की। अस्पताल प्रबंधन की लापरवाही के इन्फेक्शन ने अम्बाराम की आंख छीनी, उनकी जिंदगी में अंधेरा कर दिया। पीडि़त और उनका परिवार दो साल से सरकारी दहलीज पर दुखड़ा सुना रहे हैं। अब तक न अस्पताल पर गाज गिरी। न प्रबंधन पर। मुआवजा तक नसीब नहीं हुआ। अस्पतालों में मोतियाबिंद ऑपरेशन के नाम पर आंख गवाने वाले अम्बाराम अकेले नहीं है। विधायक प्रताप ग्रेवाल द्वारा पूछे गए एक सवाल के जवाब में विधानसभा में पेश की गई जानकारी की मानें 2011 से 2013 के बीच इंदौर-उज्जैन संभाग में 25 लोग 'ऑपरेशन लापरवाहीÓ का शिकार हुए।
विधानसभा में पेश तथ्यों के आधार पर बात करें तो पांच वर्षों में इंदौर संभाग में 2288 नेत्र शिविर आयोजित हुए। इन शिविर में 64,307 पीडि़तों के मोतियाबिंद ऑपरेशन हुए। उज्जैन संभाग में 3289 शिविरों में 1,21,271 के ऑपरेशन हुए। इनमें तीन शिविर में ऑपरेशन के दौरान अस्पताल प्रबंधन द्वारा बरती गई लापरवाही के कारण 25 लोगों को इन्फेक्शन से आंख गवाना पड़ी। पीडि़तों में दिसंबर 2010 में इंदौर नेत्र चिकित्सालय में ऑपरेशन कराने वाले महू, मानपुर, नेमावर, चापड़ा, पुंजापुरा, हाटपीपल्या जैसे गांवों के 18, 2012-13 में खंडवा के अस्पताल में ऑपरेशन कराने वाले 5 और नवंबर 2012 में देवास में संपन्न हुए नेत्र शिविर के दौरान ऑपरेशन कराने वाले 2 लोग शामिल हैं। सरकारी जांच में सभी दोषी डॉक्टरों को क्लीन मिली। जबकि सरकार ने पीडि़तोंके मुआवजे को लेकर यह कहते हुए हाथ खड़े कर दिए कि इसका प्रावधान ही नहीं है।
आंख नहीं, जीवन खराब कर दिया...
शिविर में मोतियाबिंद का ऑपरेशन कराने वालों में 90 प्रतिशत लोग ऐसे परिवारों से ताल्लुक रखते हैं जो आर्थिक रूप से संपन्न नहीं है। रोजनदारी की कमाई से गुजरबसर करते हैं। रोजनदारी की कमाई छोड़कर व्यक्ति शिविर में आकर इसीलिए ऑपरेशन कराता है ताकि रोशनी बढऩे के बाद दुगनी क्षमता के साथ काम किया जा सके। ऑपरेशन के बाद इन्फेक्शन के कारण आंखें खराब होने से लोगों का पेट पालना भी मुश्किल हो गया है।
खराब हुई थी इनकी आंखे...
इंदौर :- अम्बाराम सिसोदिया, प्रेमबाई, बसंति बाई, गंगाधर सिंह, लक्ष्मीबाई और फूलबाई ।
देवास :- सावित्रीबाई, हरदेव, राधाबाई
(महंगी दवाई से हुए ईलाज के बाद सावित्रीबाई की आंख बच गई।)
इन्फेक्शन से उठे ऑपरेशन की गुणवत्ता पर सवाल...
सूत्रों की मानें तो ऑपरेशन के बाद आंखों में हुए इन्फेक्शन ने अस्पताल प्रबंधन की भूमिका के साथ ऑपरेशन की तकनीक पर भी सवाल खड़े कर दिए हैं। जांच के दौरान पता चला था कि इंदौर नेत्र चिकित्सालय के ऑपरेशन थिएटर में चल रहे नवीनीकरण के काम के साथ ऑपरेशन किया। वहीं खंडवा और देवास में भी ऐसी लापरवाही सामने आई। ऐसे में सवाल यह उठता है कि आंख शरीर का सबसे जरूरी और संवेदनशील हिस्सा होता है? नेत्र विशेषज्ञ यह बात अच्छे से जानते हैं। बावजूद इसके यदि चलते निर्माणकार्य या सुधार के बीच ऑपरेशन किया गया तो इसके लिए सीधे-सीधे नेत्र विशेषज्ञ का दायित्व तय करके उनके खिलाफ कार्रवाई होना थी जो आज तक नहीं हुई। शायद इसीलिए आंखों में ऑपरेशन के बाद इन्फेक्शन होने का सिलसिला बदस्तूर जारी है।
क्या हुआ कार्रवाई के नाम पर...
-------
शहर नेत्र शिविर ऑपरेशन
इंदौर १३७० २५४२५
झाबुआ ७ ८८०
बड़वानी ३५७ ३५२८
खरगोन ४१६ १४१३१
खंडवा ३२ ९७२८
बुरहानपुर ६१ ७८४५
अलीराजपुर ४५ २८३४
उज्जैन संभाग...
देवास ७३५ ३१६७३
नीमच १३० २३७२३
उज्जैन १३६ ७९८३
मंदसौर २५४ १४४५०
रतलाम ४४० १७६८२
शाजापुर १५९४ २५७६०
शिविर के मापदंड
- संस्थागत शिविर हो। रोगियों का पूरी जांच के बाद ही उपचार हो।
- ऑपरेशन व्यवस्थित और साफ-स्वच्छ ओटी में हो।
- ऑपरेशन की संख्या निर्धारित नहीं है।
- गुणवत्ता के लिए अस्पतालों को सरकार ने निर्देशित किया।
यह हुआ कार्रवाई के नाम पर...
इंदौर नेत्र चिकित्सालय में ऑपरेशन फेल होने के बाद प्रबंधन ने गलती छिपाने के लिए मरीजों को अलग वार्ड में शिफ्ट करके उपचार हुआ।
- सीएमएचओ डॉ.शरद पंडित ने 2011 जनवरी में हॉस्पिटल की ओटी सील करवा दी।
- जनवरी 2011 में मरीजों की जांच एमजीएम डीन डॉ.पुष्पा वर्मा को सौंपी जिन्होंने डॉ. सुधीर महाशब्दे और डॉ. सुभाष बांडे को क्लीन चिट दी।
- इसी तरह खंडवा के जिला कार्यक्रम अधिकारी (अंधत्व) डॉ. एस.सी.जैन को क्लीन चिट मिली।
- देवास जिले के आयोजन नोडल अधिकारी डॉ.एस.के.सरल और नेत्र सर्जन डॉ. आर.के.सक्सेना को भी क्लीन चिट दी।
'मुआवजे का प्रावधान नहींÓ कहकर सरकार ने दे दी दोषियों को क्लीन चिट
इंदौर. चीफ रिपोर्टर ।
महू के अम्बाराम सिसोदिया ने दिसंबर 2010 में इंदौर नेत्र चिकित्सालय में मोतियाबिंद का ऑपरेशन कराया था। उम्मीद थी रोशनी की। अस्पताल प्रबंधन की लापरवाही के इन्फेक्शन ने अम्बाराम की आंख छीनी, उनकी जिंदगी में अंधेरा कर दिया। पीडि़त और उनका परिवार दो साल से सरकारी दहलीज पर दुखड़ा सुना रहे हैं। अब तक न अस्पताल पर गाज गिरी। न प्रबंधन पर। मुआवजा तक नसीब नहीं हुआ। अस्पतालों में मोतियाबिंद ऑपरेशन के नाम पर आंख गवाने वाले अम्बाराम अकेले नहीं है। विधायक प्रताप ग्रेवाल द्वारा पूछे गए एक सवाल के जवाब में विधानसभा में पेश की गई जानकारी की मानें 2011 से 2013 के बीच इंदौर-उज्जैन संभाग में 25 लोग 'ऑपरेशन लापरवाहीÓ का शिकार हुए।
विधानसभा में पेश तथ्यों के आधार पर बात करें तो पांच वर्षों में इंदौर संभाग में 2288 नेत्र शिविर आयोजित हुए। इन शिविर में 64,307 पीडि़तों के मोतियाबिंद ऑपरेशन हुए। उज्जैन संभाग में 3289 शिविरों में 1,21,271 के ऑपरेशन हुए। इनमें तीन शिविर में ऑपरेशन के दौरान अस्पताल प्रबंधन द्वारा बरती गई लापरवाही के कारण 25 लोगों को इन्फेक्शन से आंख गवाना पड़ी। पीडि़तों में दिसंबर 2010 में इंदौर नेत्र चिकित्सालय में ऑपरेशन कराने वाले महू, मानपुर, नेमावर, चापड़ा, पुंजापुरा, हाटपीपल्या जैसे गांवों के 18, 2012-13 में खंडवा के अस्पताल में ऑपरेशन कराने वाले 5 और नवंबर 2012 में देवास में संपन्न हुए नेत्र शिविर के दौरान ऑपरेशन कराने वाले 2 लोग शामिल हैं। सरकारी जांच में सभी दोषी डॉक्टरों को क्लीन मिली। जबकि सरकार ने पीडि़तोंके मुआवजे को लेकर यह कहते हुए हाथ खड़े कर दिए कि इसका प्रावधान ही नहीं है।
आंख नहीं, जीवन खराब कर दिया...
शिविर में मोतियाबिंद का ऑपरेशन कराने वालों में 90 प्रतिशत लोग ऐसे परिवारों से ताल्लुक रखते हैं जो आर्थिक रूप से संपन्न नहीं है। रोजनदारी की कमाई से गुजरबसर करते हैं। रोजनदारी की कमाई छोड़कर व्यक्ति शिविर में आकर इसीलिए ऑपरेशन कराता है ताकि रोशनी बढऩे के बाद दुगनी क्षमता के साथ काम किया जा सके। ऑपरेशन के बाद इन्फेक्शन के कारण आंखें खराब होने से लोगों का पेट पालना भी मुश्किल हो गया है।
खराब हुई थी इनकी आंखे...
इंदौर :- अम्बाराम सिसोदिया, प्रेमबाई, बसंति बाई, गंगाधर सिंह, लक्ष्मीबाई और फूलबाई ।
देवास :- सावित्रीबाई, हरदेव, राधाबाई
(महंगी दवाई से हुए ईलाज के बाद सावित्रीबाई की आंख बच गई।)
इन्फेक्शन से उठे ऑपरेशन की गुणवत्ता पर सवाल...
सूत्रों की मानें तो ऑपरेशन के बाद आंखों में हुए इन्फेक्शन ने अस्पताल प्रबंधन की भूमिका के साथ ऑपरेशन की तकनीक पर भी सवाल खड़े कर दिए हैं। जांच के दौरान पता चला था कि इंदौर नेत्र चिकित्सालय के ऑपरेशन थिएटर में चल रहे नवीनीकरण के काम के साथ ऑपरेशन किया। वहीं खंडवा और देवास में भी ऐसी लापरवाही सामने आई। ऐसे में सवाल यह उठता है कि आंख शरीर का सबसे जरूरी और संवेदनशील हिस्सा होता है? नेत्र विशेषज्ञ यह बात अच्छे से जानते हैं। बावजूद इसके यदि चलते निर्माणकार्य या सुधार के बीच ऑपरेशन किया गया तो इसके लिए सीधे-सीधे नेत्र विशेषज्ञ का दायित्व तय करके उनके खिलाफ कार्रवाई होना थी जो आज तक नहीं हुई। शायद इसीलिए आंखों में ऑपरेशन के बाद इन्फेक्शन होने का सिलसिला बदस्तूर जारी है।
क्या हुआ कार्रवाई के नाम पर...
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शहर नेत्र शिविर ऑपरेशन
इंदौर १३७० २५४२५
झाबुआ ७ ८८०
बड़वानी ३५७ ३५२८
खरगोन ४१६ १४१३१
खंडवा ३२ ९७२८
बुरहानपुर ६१ ७८४५
अलीराजपुर ४५ २८३४
उज्जैन संभाग...
देवास ७३५ ३१६७३
नीमच १३० २३७२३
उज्जैन १३६ ७९८३
मंदसौर २५४ १४४५०
रतलाम ४४० १७६८२
शाजापुर १५९४ २५७६०
शिविर के मापदंड
- संस्थागत शिविर हो। रोगियों का पूरी जांच के बाद ही उपचार हो।
- ऑपरेशन व्यवस्थित और साफ-स्वच्छ ओटी में हो।
- ऑपरेशन की संख्या निर्धारित नहीं है।
- गुणवत्ता के लिए अस्पतालों को सरकार ने निर्देशित किया।
यह हुआ कार्रवाई के नाम पर...
इंदौर नेत्र चिकित्सालय में ऑपरेशन फेल होने के बाद प्रबंधन ने गलती छिपाने के लिए मरीजों को अलग वार्ड में शिफ्ट करके उपचार हुआ।
- सीएमएचओ डॉ.शरद पंडित ने 2011 जनवरी में हॉस्पिटल की ओटी सील करवा दी।
- जनवरी 2011 में मरीजों की जांच एमजीएम डीन डॉ.पुष्पा वर्मा को सौंपी जिन्होंने डॉ. सुधीर महाशब्दे और डॉ. सुभाष बांडे को क्लीन चिट दी।
- इसी तरह खंडवा के जिला कार्यक्रम अधिकारी (अंधत्व) डॉ. एस.सी.जैन को क्लीन चिट मिली।
- देवास जिले के आयोजन नोडल अधिकारी डॉ.एस.के.सरल और नेत्र सर्जन डॉ. आर.के.सक्सेना को भी क्लीन चिट दी।
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