- संपत्ति कर के नाम पर राजस्व अमले का खेल
- 60 फीसदी वसूली, 40 फीसदी सेंधमारी
- वार्ड से लेकर मुख्यालय तक मिले हैं जिम्मेदार
इंदौर. विनोद शर्मा।
शिकायतों पर सख्त होने के बजाय महापौर ने ‘इस्तीफे’ का जो तीर छोड़ा था उसने जनप्रतिनिधियों को सरेंडर करके मनमानी की हदें लांघ चुके नगर निगम के अधिकारियों के हौंसले बुलंद कर दिए। उदाहरण है राजस्व विभाग का अमला। वसूली के साथ वत्तीय पोषण के प्रति जवाबदेह यह अमला निगम के खजाने में सेंधमारी करके अपनी और बिल्डरों की जेब भर रहा है। ऊपर बैठा हर कोई वाकीफ है लेकिन हिस्सेदारी के लालच ने उन्हें भी बेईमान बना दिया। आंकड़ों के लिहाज से बात करें तो इंदौर के अमुमन कमर्शियल कॉम्पलेक्स, मॉल, होटल, मैरिज गार्डन, स्कूल, कॉलेज और बिजनेस आर्केड से सिर्फ 60 फीसदी संपत्ति कर ही जमा करवाया जा रहा है। 40 फीसदी की सेंधमारी हो रही है। ईल्वा जैसी अन्य एज्यूकेशन सोसायटियों को मिलने वाले फायदे की हकीकत दबंग दुनिया बीते दिनों उजागर भी कर चुका है।
नगर निगम के राजस्व विभाग से प्राप्त जानकारी के अनुसार इंदौर में कुल 4.20 लाख संपत्ति करदाता हैं। इनमें से 60 हजार से ज्यादा सर्वे बिल (फर्जी खाते) हैं। बची 3.60 लाख संपत्ति। इनसे मिलता है तकरीबन 160 करोड़ संपत्ति कर। जानकार इससे इत्तेफाक नहीं रखते। उनकी मानें 2.5 लाख से अधिक ऐसी संपत्तियां हैं जिनके खाते ही नहीं खुले। बारीकी और ईमानदारी से सर्वे हो तो संपत्ति कर का आंकड़ा 160 से बढ़कर 270 करोड़ तक पहुंच जाएगा। अंतर सीधा 110 करोड़ का है जिसके लिए राजस्व विभाग का वह अमला जिम्मेदार है जो तनख्वाह निगम से लेता है लेकिन नौकरी बिल्डरों की बजा रहा है। इसमें दरोगा, बिल कलेक्टर, एआरओ, उपायुक्त, अपर आयुक्त से लेकर एमआईसी तक सभी मिले हुए हैं।
यदि 100 करोड़ साल के मिले तो क्या हो सकता है...
- 1000 हजार बगीचे बन सकते हैं।
- 666 किलोमीटर लंबी डामर की सड़कें सुधारी जा सकती हैं।
- 1000 सुव्यवस्थित सुविधाघर बनाए जा सकते हैं।
- कई किलोमीटर लंबी पेयजल लाइनें डालकर लोगों की प्यास बुझाई जा सकती है।
- कई किलोमीटर लंबी सीवरेज लाइन भी डाली जा सकती है।
गड़बड़ की बड़ी वजहें...
- उद्यान और स्वास्थ्य विभाग में बेहिसाब भरे गए कर्मचारी जबकि राजस्व विभाग में कर्मचारियों का संकट है। बिल कलेक्टरों को एआरओ बनाकर बैठा दिया गया उन्हें ग्रेड का लाभ नहीं मिला।
- बारीकी से सर्वे आज दिन तक नहीं हुआ।
- टेली सिस्टम नहीं बना जिससे पता लगाया जा सके कि सालाना जितने नक्शें पास हो रहे हैं उस हिसाब से संपत्ति के खाते खुल भी रहे हैं या नहीं।
- सर्वे की सुस्त कोशिशे हुई। कंपनियां निगम को धोखा दे गई।
- ठोस सर्वे को लेकर कोई योजना नहीं बनी।
- ऊपर से लेकर नीचे तक के अमले की जुगलबंदी।
किस बिल्डर का खास कौन..?
विष्णपु्रसाद शुक्ला और संजय शुक्ला :- शिवदत्त अवस्थी, महेश वर्मा, किशोर दुबे, संतोष परमार, बहादुर सिंह गुर्जर, पवन उपाध्याय और उपायुक्त नरेंद्र शर्मा।
ओमनी समूह तर्फे सूमित सूरी :- रियाज खान, हरिसिंह चौहान, संतोष परमार
झूम या चौधरी डेवलपर्स- व्यास, पवन पिपलोदिया
अतुल झंवर- मुकेश पटेरिया, जितेंद्र पांडे, सुधीर गुलवे और उपायुक्त लता अग्रवाल
पटवा अभिकरण- शिवनाथसिंह पंवार, संजय वर्मा
रमेश मंगल और राजेश मंगल- हरिसिंह चौहान और संतोष परमार
मनीष कालानी- सुधीर गुलवे, उपायुक्त लता अग्रवाल
अपोलो समूह :- अरविंद नायक, शिवनाथ सिंह पंवार और उपायुक्त अभय रंजनगांवकर
बॉबी छाबड़ा :- राजेंद्र राठौर, जितेंद्र पांडे, हरिसिंह चौहान, महेश वर्मा और एमआईसी सदस्य
संघवी बिल्डर्स :- राजेश परमार,माधोसिंह तोमर, दिलिप मिश्रा
मोहम्मद खम्बाती और महीदपुरवाला : सुधीर गुलवे और उपायुक्त लता अग्रवाल। अन्य अधिकारियों का भी हाथ।
इनके तरीके अलग-अलग...
छजलानी बिल्डर्स :- पहले राजधानी से दबाव बनवाते हैं और बाद में मुख्यालय में बैठे अधिकारियों को सेट करते हैं।
कपड़ा बाजार और सराफा से जुड़े बिल्डर :- किसी न किसी सांसद के फोन से करवाते हैं अपना काम।
शालीमार समूह :- मंत्री और प्रमुख सचिवों का दबाव। आला अधिकारियों से सीधी बातचीत।
अग्रवाल ग्रुप:- इनके काम की शुरूआत भी भोपाल से होती है।
ऐसे करते हैं खेल...
क्षेत्रफल में छेड़छाड़ :- यदि किसी मकान, प्लॉट, फ्लैट या दुकान का क्षेत्रफल 1000 वर्गफीट है तो उसे 100-200 वर्गफीट ही बताया जाता है। फंडा सीधा है जितनी संपत्ति उतना कर ।
रेट जोन में छेड़छाड़ :- रेट जोन क्षेत्र के विकसित होने की निशानी है। उसके आधार पर ही संपत्ति कर तय होता है। जिसे फायदा पहुंचाना है उसके संपत्ति कर की दर कम रेट जोन से जोड़ी जाती है।
वर्षों में अंतर :- किसी खातेदार से पांच साल का पैसा लेना हो तो वह बिल कलेक्टर और एआरओ या मुख्यालय में बैठे आकाओं से संपर्क करके तीन साल करा लेता है। इससे दो साल का पैसा नहीं चुकाना पड़ता। संसोधन मुख्यालय में ही होते हैं।
संपत्ति उपयोग में छेड़छाड़ :- जिस खातेदार की संपत्ति कमर्शियल है और उसे कम टैक्स देना है तो वह मैदानी अमले की मदद से संपत्ति का स्वरूप आवासीय बता देता है। आवासीय की दर यदि 30 रुपए/वर्गफीट है तो व्यावसायिक की दर है 64 रुपए/वर्गफीट।
सड़क से गली तक :- यदि कोई संपत्ति मुख्य मार्ग पर है तो उस पर 10 रुपए/वर्गफीट अतिरिक्त लगता है। इसे बचाने के लिए मुख्यमार्ग का जिक्र खाते में नहीं होता।
चेक :- अपना टार्गेट पूरा करने के लिए खातेदारों से पोस्ट डेटेड चेक ले लेते हैं जो कि बाद में बाउंस हो जाते हैं। इसी बीच खातेदार के खाते में रकम जमा बता दी जाती है। कुछ ही ऐसे खातेदार होंगे जिन पर निगम ने धारा 138 जो कि चेक बाउंस के मामले में लगती है के प्रकरण दर्ज कराए हों।
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