सरकार की सुस्ती से 100 करोड़ के पार!
2008 में थी 54 करोड़, चार साल में 46 करोड़ रुपए बढ़े
-- 2008 में हुआ था भूमिपूजन, श्रीगणेश आज तक नहीं
इंदौर, चीफ रिपोर्टर।
मेट्रो, ट्राम, मोनो रेल और अंतरराज्यीय बस टर्मिनल जैसी योजनाओं की बात करने वाली सरकार लंबे इंतजार के बावजूद पश्चिमी रिंग रोड के निर्माण को हरी झंडी नहीं दे पाई। मंजूरी के इंतजार में लंबे समय से अटके पड़े पश्चिमी रिंग रोड के दो किमी हिस्से के लिए इंदौर विकास प्राधिकरण ने राज्य शासन को रिमाइंडर पर रिमाइंडर भेजे लेकिन बात नहीं बनी। उलटा, तीन साल में प्रोजेक्ट की लागत 54 करोड़ से बढ़कर एक अरब के पार हो गई। उधर, सरकारी सुस्ती का खामियाजा बदहाल यातायात के कारण आम नागरिकों को जान देकर चुकाना पड़ रहा है।
दर्जनों घोषणाएं, भूमिपूजन के बाद सवा दो साल का इंतजार और आखिर में हाथ लगी निराशा। ये हाल हैं रिंग रोड की उस रिंग की जो आज तक अधूरी है। विधानसभा चुनाव-2008 के ठीक दो महीने पहले सितंबर में लोक निर्माण मंत्री कैलाश विजयवर्गीय और तत्कालीन आईडीए अध्यक्ष मधु वर्मा ने लंबे-चौड़े वादों के साथ मोहताबाग के पास भूमिपूजन करते हुए जो शिलालेख लगाया था, उसे ही लोग उखाड़ ले गए। सरकार की बेरुखी देख प्राधिकरण ने भी पैर खींचे और दिया हुआ वर्कऑर्डर निरस्त कर दिया। सड़क कब बनेगी? अब इसके जवाब में प्राधिकरण सरकार की तरफ इशारा करता है तो सरकार प्राधिकरण की तरफ। कुल मिलाकर सरकार-प्राधिकरण के दोराहे पर सड़क का मकसद चकरघिन्नी हो चुका है।
इस लेटलतीफी से 2008 में जो लागत 54 करोड़ आंकी गई थी वही आज 100 करोड़ का आंकड़ा छू रही है। हालात ये हैं कि उस वक्त सड़क में बाधक 850 मकान हटाने के लिए मुआवजा 15 करोड़ देना था, आज वह 22 करोड़ के पार हो चुका है। गाइडलाइन के हिसाब से सिरपुर (चंदननगर रहवासी क्षेत्र) की लागत बढ़कर 2012 में 450 से 500 रुपए वर्गफीट हो गई। वहीं बाजार कीमत के लिहाज से बात करें तो 2008 से 2012 के बीच क्षेत्र में जमीन की कीमतें 500 रुपए वर्गफीट तक बढ़ी हैं। बाधक निर्माणों की संख्या भी 900 हो गई। ऐसे में मुआवजे की लागत दो गुना करीब 30 करोड़ रुपए होना लाजमी है।
क्या है लड़ाई
- 2008 में सड़क की लागत 54 करोड़ थी। इसमें 10 करोड़ रुपए प्राधिकरण को देना थे जबकि बची राशि शासन को। दो साल में न सरकार ने राशि दी और न ही स्पष्ट किया कि उक्त अनुदान रोड के लिए है या प्रभावितों के मुआवजे के लिए। पूरा मामला शासन के आवास और पर्यावरण विभाग के इर्द-गिर्द घूम रहा है।
- अब नया झगड़ा यह भी है कि उस वक्त 18.50 प्रतिशत की दर से प्राधिकरण को 10 करोड़ रुपए देना थे। चूंकि लागत बढ़ चुकी है, ऐसे में पुराने अनुपात के आधार पर बंटवारा किया जाता है तो प्राधिकरण को 15 करोड़ रुपए देना पड़ेंगे। देरी सरकार की ओर से हुई तो प्राधिकरण यह कीमत चुकाने के लिए तैयार होगा, इसकी गारंटी भी कम है।
इसलिए जरूरी है रोड...
-- बिजलपुर क्रॉसिंग से लेकर चंदननगर तक पश्चिमी रिंग रोड करीब पांच किलोमीटर लंबा बना है। चंदननगर तक हलके-भारी वाहन गंगवाल की ओर आकर धार रोड का दबाव बढ़ा देते हैं। इस वजह से कई हादसे पहले भी हो चुके हैं।
-- दो किलोमीटर लंबे इस टुकड़े के न बनने से लोगों को चार किलोमीटर घूमकर मोहताबाग जाना पड़ता है। रास्ता बनता है तो पोलाग्रांउड और सांवेर रोड औद्योगिक क्षेत्र आने-जाने वाले भारी वाहन गंगवाल-बड़ा गणपति क्षेत्र में दबाव बढ़ाए बिना ही चंदननगर से एरोड्रम और एरोड्रम रोड से वीआईपी रूट होते हुए मरीमाता आ-जा सकेंगे।
ये हैं बाधाएं
- चंदननगर से मोहताबाग (एरोड्रम रोड) और मोहताबाग तक काम होना है। बीच में चंदननगर, नंदननगर, हुजूरगंज, गंगानगर, ग्रेटर तिरुपति और राजनगर के 850 निर्माण हटाए जाना है 2008 के सर्वे के अनुसार। चार वर्षों में बाधक निर्माणों की संख्या भी 1000 के पार पहुंच गई।
- 2008-09 की गाइडलाइन के हिसाब से इनका मुआवजा 15 करोड़ रुपए बन रहा था लेकिन 2008-09 और 2012-13 के बीच गाइडलाइन ने क्षेत्र में 50 फीसदी से ज्यादा कीमतें बढ़ा दी। अब मुआवजे की लागत 30 करोड़ आंकी जा रही है।
तब बिना पैसा लगाए ही बन रही थी सड़क
--- प्राधिकरण ने 1994-95 में पूर्वी रिंग रोड बनाया। लागत आई थी तकरीबन 15 करोड़ रुपए। 250 मीटर तक स्कीम-94 जैसी कॉलोनी विकसित करके चुनिंदा प्लॉट बेचकर ही प्राधिकरण ने लागत निकाल ली थी। इसी तरह पश्चिमी रिंग रोड के विकास के साथ स्कीम-9७(4) और स्कीम-71 विकसित की। जितना पैसा सड़क निर्माण में लगा उससे कई गुना ज्यादा की लागत निकाली। 1998-1999 जब कि पूर्वी रिंग रोड का काम शुरू हुआ था उस दौरान यदि 200 फीट चौड़े इस रिंग रोड को चंदननगर से आगे बढ़ाया जाता तो न्यूनतम लागत में ही काम हो जाता। जो पैसा लगता उसकी भरपाई प्राधिकरण स्कीम-71 के प्लॉटों से कर लेता।
--- 1998-1999 में चंदननगर में बाधक निर्माण भी कम थे। जो थे उन्हें नगर निगम और प्राधिकरण ने विस्थापित करने की योजना बनाई थी जो दस्तावेजों में ही दम तोड़ गई। इतना ही नहीं जिम्मेदारों ने इस बात पर भी जोर नहीं दिया कि प्रस्तावित सड़क पर निर्माण न हो।
एक्सपर्ट कमेंट....
कागजों में ही खत्म हो गई रिंग...लोग भी भूल जाएं और प्राधिकरण भी
मास्टर प्लान में जिस मकसद के साथ रिंग रोड की कल्पना की गई थी वह दस्तावेजों में ही दम तोड़ चुकी है। इतने वर्षों में प्राधिकरण रोड बनाना तो दूर अलाइनमेंट तक तय नहीं कर पाया कि सड़क कैसे और कहां से बनेगी। कभी कहा जाता है कि चंदननगर चौराहे से ही सड़क आगे बढ़ेगी। कभी किसी ढाबे के पास जाएगी यह बताया जाता है। इसका बड़ा कारण जिम्मेदारों में इच्छाशक्ति की कमी रही। 1998-1999 के मुकाबले आज हालात अलग है। लागत कई गुना बढ़ चुकी है। एक तरफ मैदानी मशक्कत में उलझी रिंग और दूसरी तरफ सुपर कॉरिडोर ऐसे में मेरे ख्याल से प्राधिकरण को रिंग की जिद छोड़कर सुपर कॉरिडोर पर ध्यान देना चाहिए।
सी.एम.डगावकर,
आईडीए के रिटायर इंजीनियर
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मामला कैबिनेट की मंजूरी के इंतजार में है। जो फैसला होगा उसके आधार पर निर्णय लेंगे। मुझे उम्मीद है निर्णय जल्द होगा।
जयंत मलैया, आवास एवं पर्यावरण मंत्री
2008 में थी 54 करोड़, चार साल में 46 करोड़ रुपए बढ़े
-- 2008 में हुआ था भूमिपूजन, श्रीगणेश आज तक नहीं
इंदौर, चीफ रिपोर्टर।
मेट्रो, ट्राम, मोनो रेल और अंतरराज्यीय बस टर्मिनल जैसी योजनाओं की बात करने वाली सरकार लंबे इंतजार के बावजूद पश्चिमी रिंग रोड के निर्माण को हरी झंडी नहीं दे पाई। मंजूरी के इंतजार में लंबे समय से अटके पड़े पश्चिमी रिंग रोड के दो किमी हिस्से के लिए इंदौर विकास प्राधिकरण ने राज्य शासन को रिमाइंडर पर रिमाइंडर भेजे लेकिन बात नहीं बनी। उलटा, तीन साल में प्रोजेक्ट की लागत 54 करोड़ से बढ़कर एक अरब के पार हो गई। उधर, सरकारी सुस्ती का खामियाजा बदहाल यातायात के कारण आम नागरिकों को जान देकर चुकाना पड़ रहा है।
दर्जनों घोषणाएं, भूमिपूजन के बाद सवा दो साल का इंतजार और आखिर में हाथ लगी निराशा। ये हाल हैं रिंग रोड की उस रिंग की जो आज तक अधूरी है। विधानसभा चुनाव-2008 के ठीक दो महीने पहले सितंबर में लोक निर्माण मंत्री कैलाश विजयवर्गीय और तत्कालीन आईडीए अध्यक्ष मधु वर्मा ने लंबे-चौड़े वादों के साथ मोहताबाग के पास भूमिपूजन करते हुए जो शिलालेख लगाया था, उसे ही लोग उखाड़ ले गए। सरकार की बेरुखी देख प्राधिकरण ने भी पैर खींचे और दिया हुआ वर्कऑर्डर निरस्त कर दिया। सड़क कब बनेगी? अब इसके जवाब में प्राधिकरण सरकार की तरफ इशारा करता है तो सरकार प्राधिकरण की तरफ। कुल मिलाकर सरकार-प्राधिकरण के दोराहे पर सड़क का मकसद चकरघिन्नी हो चुका है।
इस लेटलतीफी से 2008 में जो लागत 54 करोड़ आंकी गई थी वही आज 100 करोड़ का आंकड़ा छू रही है। हालात ये हैं कि उस वक्त सड़क में बाधक 850 मकान हटाने के लिए मुआवजा 15 करोड़ देना था, आज वह 22 करोड़ के पार हो चुका है। गाइडलाइन के हिसाब से सिरपुर (चंदननगर रहवासी क्षेत्र) की लागत बढ़कर 2012 में 450 से 500 रुपए वर्गफीट हो गई। वहीं बाजार कीमत के लिहाज से बात करें तो 2008 से 2012 के बीच क्षेत्र में जमीन की कीमतें 500 रुपए वर्गफीट तक बढ़ी हैं। बाधक निर्माणों की संख्या भी 900 हो गई। ऐसे में मुआवजे की लागत दो गुना करीब 30 करोड़ रुपए होना लाजमी है।
क्या है लड़ाई
- 2008 में सड़क की लागत 54 करोड़ थी। इसमें 10 करोड़ रुपए प्राधिकरण को देना थे जबकि बची राशि शासन को। दो साल में न सरकार ने राशि दी और न ही स्पष्ट किया कि उक्त अनुदान रोड के लिए है या प्रभावितों के मुआवजे के लिए। पूरा मामला शासन के आवास और पर्यावरण विभाग के इर्द-गिर्द घूम रहा है।
- अब नया झगड़ा यह भी है कि उस वक्त 18.50 प्रतिशत की दर से प्राधिकरण को 10 करोड़ रुपए देना थे। चूंकि लागत बढ़ चुकी है, ऐसे में पुराने अनुपात के आधार पर बंटवारा किया जाता है तो प्राधिकरण को 15 करोड़ रुपए देना पड़ेंगे। देरी सरकार की ओर से हुई तो प्राधिकरण यह कीमत चुकाने के लिए तैयार होगा, इसकी गारंटी भी कम है।
इसलिए जरूरी है रोड...
-- बिजलपुर क्रॉसिंग से लेकर चंदननगर तक पश्चिमी रिंग रोड करीब पांच किलोमीटर लंबा बना है। चंदननगर तक हलके-भारी वाहन गंगवाल की ओर आकर धार रोड का दबाव बढ़ा देते हैं। इस वजह से कई हादसे पहले भी हो चुके हैं।
-- दो किलोमीटर लंबे इस टुकड़े के न बनने से लोगों को चार किलोमीटर घूमकर मोहताबाग जाना पड़ता है। रास्ता बनता है तो पोलाग्रांउड और सांवेर रोड औद्योगिक क्षेत्र आने-जाने वाले भारी वाहन गंगवाल-बड़ा गणपति क्षेत्र में दबाव बढ़ाए बिना ही चंदननगर से एरोड्रम और एरोड्रम रोड से वीआईपी रूट होते हुए मरीमाता आ-जा सकेंगे।
ये हैं बाधाएं
- चंदननगर से मोहताबाग (एरोड्रम रोड) और मोहताबाग तक काम होना है। बीच में चंदननगर, नंदननगर, हुजूरगंज, गंगानगर, ग्रेटर तिरुपति और राजनगर के 850 निर्माण हटाए जाना है 2008 के सर्वे के अनुसार। चार वर्षों में बाधक निर्माणों की संख्या भी 1000 के पार पहुंच गई।
- 2008-09 की गाइडलाइन के हिसाब से इनका मुआवजा 15 करोड़ रुपए बन रहा था लेकिन 2008-09 और 2012-13 के बीच गाइडलाइन ने क्षेत्र में 50 फीसदी से ज्यादा कीमतें बढ़ा दी। अब मुआवजे की लागत 30 करोड़ आंकी जा रही है।
तब बिना पैसा लगाए ही बन रही थी सड़क
--- प्राधिकरण ने 1994-95 में पूर्वी रिंग रोड बनाया। लागत आई थी तकरीबन 15 करोड़ रुपए। 250 मीटर तक स्कीम-94 जैसी कॉलोनी विकसित करके चुनिंदा प्लॉट बेचकर ही प्राधिकरण ने लागत निकाल ली थी। इसी तरह पश्चिमी रिंग रोड के विकास के साथ स्कीम-9७(4) और स्कीम-71 विकसित की। जितना पैसा सड़क निर्माण में लगा उससे कई गुना ज्यादा की लागत निकाली। 1998-1999 जब कि पूर्वी रिंग रोड का काम शुरू हुआ था उस दौरान यदि 200 फीट चौड़े इस रिंग रोड को चंदननगर से आगे बढ़ाया जाता तो न्यूनतम लागत में ही काम हो जाता। जो पैसा लगता उसकी भरपाई प्राधिकरण स्कीम-71 के प्लॉटों से कर लेता।
--- 1998-1999 में चंदननगर में बाधक निर्माण भी कम थे। जो थे उन्हें नगर निगम और प्राधिकरण ने विस्थापित करने की योजना बनाई थी जो दस्तावेजों में ही दम तोड़ गई। इतना ही नहीं जिम्मेदारों ने इस बात पर भी जोर नहीं दिया कि प्रस्तावित सड़क पर निर्माण न हो।
एक्सपर्ट कमेंट....
कागजों में ही खत्म हो गई रिंग...लोग भी भूल जाएं और प्राधिकरण भी
मास्टर प्लान में जिस मकसद के साथ रिंग रोड की कल्पना की गई थी वह दस्तावेजों में ही दम तोड़ चुकी है। इतने वर्षों में प्राधिकरण रोड बनाना तो दूर अलाइनमेंट तक तय नहीं कर पाया कि सड़क कैसे और कहां से बनेगी। कभी कहा जाता है कि चंदननगर चौराहे से ही सड़क आगे बढ़ेगी। कभी किसी ढाबे के पास जाएगी यह बताया जाता है। इसका बड़ा कारण जिम्मेदारों में इच्छाशक्ति की कमी रही। 1998-1999 के मुकाबले आज हालात अलग है। लागत कई गुना बढ़ चुकी है। एक तरफ मैदानी मशक्कत में उलझी रिंग और दूसरी तरफ सुपर कॉरिडोर ऐसे में मेरे ख्याल से प्राधिकरण को रिंग की जिद छोड़कर सुपर कॉरिडोर पर ध्यान देना चाहिए।
सी.एम.डगावकर,
आईडीए के रिटायर इंजीनियर
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मामला कैबिनेट की मंजूरी के इंतजार में है। जो फैसला होगा उसके आधार पर निर्णय लेंगे। मुझे उम्मीद है निर्णय जल्द होगा।
जयंत मलैया, आवास एवं पर्यावरण मंत्री
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