- बिना सदस्यों की सहमति के 'मित्र मंडलीÓ ने महावीर हॉस्पिटल के साथ किया विक्रय अनुबंध
- संयुक्त पंजीयक, सहकारिता ने किया अनुबंध खारिज
इंदौर. विनोद शर्मा ।
महावीर अस्पताल प्रबंधन अपनी मिल्कियत बताते हुए स्कीम-71 की जिस इमारत को सौ प्रतिशत वैध करार दे रहा है मित्र मंडल सार्वजनिक सहकारी चिकित्सालय ने सदस्यों को नजरअंदाज करते हुए उसका विक्रय अनुबंध अस्पताल के साथ साइन किया था। अनुबंध 2006 में हुआ। कुल 2.28 करोड़ रुपए चुकाए जाना थे जबकि 56 लाख रुपए के अग्रिम भुगतान के दम पर ही अस्पताल प्रबंधन ने इमारत कब्जा ली। सात वर्षों में बकाया 1.72 करोड़ रुपए के भुगतान में अस्पताल ने रुचि ली, न वसूली के लिए संस्था ने। इसका खुलासा संयुक्त पंजीयक, सहकारिता की जांच के बाद हुआ।
संयुक्त पंजीयक, सहकारिता सलील कटारे ने जांच के ऐसे ही बिंदुओं की बिनाह पर मित्र मंडल सार्वजनिक सहकारी चिकित्सालय के संचालकों द्वारा लिए गए विक्रय अनुबंध लिखने के निर्णय को सिरे से खारिज कर दिया। जांच रिपोर्ट की मानें तो बिल्डिंग संस्था के सदस्यों की सहमति के बिना नहीं बेची जा सकती। संस्था के संचालकों को सदस्यों की बैठक बुलाने के अधिकार थे। जो नहीं बुलाई गई। जांच के दौरान संचालक यह साबित नहीं कर सके कि इमारत सदस्यों की सहमति से बेची जा रही है। जब संचालकों के अधिकार की जांच हुई तो पता चला उन्हें ऐसे निर्णय लेने का अधिकार ही नहीं है। चूंकि निर्णय बोर्ड का नहीं, संचालकों का था, इसीलिए खारिज कर दिया।
छह महीने का वक्त, छह साल से अनुबंध हवा में...
2006 में साइन हुए अनुबंध के मुताबिक महावीर नर्सिंगहोम एंड रिसर्च सेंटर को बकाया 1.72 करोड़ रुपए चुकाने के लिए छह महीने का वक्त दिया था। अनुबंध के मुताबिक छह महीने बाद बकाया रकम मिलते ही संस्था को रजिस्ट्री करना थी। यदि छह महीने में रकम नहीं मिलती तो संस्था अनुबंध रद्द कर देगी। अनुबंध हुए सात साल हो चुके हैं। आज दिन तक न अस्पताल प्रबंधन ने बकाया रकम चुकाई। न संस्था ने अनुबंध रद्द करने की कार्रवाई की। न इस संबंध में सहकारिता विभाग को किसी तरह की जानकारी दी गई। इसीलिए सहकारिता विभाग ने अनुबंध को भी शुन्य करार दे दिया।
इमारत के चक्कर में बैंक पर डल गए ताले...
इसी इमारत के निर्माण के नाम पर संचालकों ने जो मनमानी राशि खर्च की थी उसी के परिणाम ने मित्र मंडल को-ऑपरेटिव बैंक पर ताले डलवा दिए। सैकड़ों लोग बैंक के जमाकर्ता हैं। चूंकि बैंक पंजीबद्ध थी इसीलिए आरबीआई ने सदस्यों को एक-एक लाख रुपए चुकाए भी। सैकड़ों सदस्य ऐसे भी हैं जिनके बैंक में एक लाख से ज्यादा जमा थे, उनकी रकम अब तक भी अधर में है।
ईओडब्ल्यू भी कर चुका है जांच...
मित्र मंडल सार्वजनिक सहकारी चिकित्सालय, मित्र मंडल को-ऑपरेटिव बैंक की सहयोगी संस्था है। संस्था के कर्ताधर्ता निर्मल कुमार मंडलोई हैं जिन्होंने एक ही संपत्ति पर दो अलग-अलग वित्तीय संस्थानों से लोन लिया। अपनी जांच रिपोर्ट में इसका खुलासा करने के साथ ईओडब्ल्यू मंडलोई सहित तमाम संचालकों के खिलाफ चालान पेश कर चुका है। प्रकरण विचाराधीन है।
एडवांस 56 लाख से चुकाया एमपीएफसी का कर्जा
2006 में हुए अनुबंध के दौरान महावीर नर्सिंगहोम एंड रिसर्च सेंटर के डॉ. एम.के.जैन ने बतौर एडवांस जो 56 लाख रुपए चुकाए थे, संस्था ने वह पैसा सीधे मप्र वित्त निगम में खजाने में जमा किया। वित्त निगम से संस्था ने इमारत की रजिस्ट्री गिरवी रखकर कर्ज लिया था।
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संस्था के संचालकों ने बिना सदस्यों की सहमति के विक्रय अनुबंध करने का निर्णय लिया था इसीलिए उसे खारिज कर दिया। जिन शर्तों के साथ अनुबंध हुआ, उनका पालन भी नहीं हुआ। इसीलिए अनुबंध भी शुन्य है। इमारत में अस्पताल शुरू करने संबंधि किसी तरह की सहमति अब तक न सदस्यों ने दी, न ही सहकारिता विभाग ने।
सलील कटारे, संयुक्त पंजीयक
सहकारिता विभाग
2.28 करोड़ का अनुबंध किया था..
2006 में अनुबंध किया था। 2.28 करोड़ में से 56 लाख मिले। बाकी रकम नहीं मिली। ईओडब्ल्यू चालान पेश कर चुकी है। केस चल रहा है। लोन एमपीएफसी और बैंक से लिया था। बिल्डिंग जहां तक मेरी जानकारी है आवासीय नहीं है।
एड. निर्मल कुमार मंडलोई, कर्ताधर्ता
- संयुक्त पंजीयक, सहकारिता ने किया अनुबंध खारिज
इंदौर. विनोद शर्मा ।
महावीर अस्पताल प्रबंधन अपनी मिल्कियत बताते हुए स्कीम-71 की जिस इमारत को सौ प्रतिशत वैध करार दे रहा है मित्र मंडल सार्वजनिक सहकारी चिकित्सालय ने सदस्यों को नजरअंदाज करते हुए उसका विक्रय अनुबंध अस्पताल के साथ साइन किया था। अनुबंध 2006 में हुआ। कुल 2.28 करोड़ रुपए चुकाए जाना थे जबकि 56 लाख रुपए के अग्रिम भुगतान के दम पर ही अस्पताल प्रबंधन ने इमारत कब्जा ली। सात वर्षों में बकाया 1.72 करोड़ रुपए के भुगतान में अस्पताल ने रुचि ली, न वसूली के लिए संस्था ने। इसका खुलासा संयुक्त पंजीयक, सहकारिता की जांच के बाद हुआ।
संयुक्त पंजीयक, सहकारिता सलील कटारे ने जांच के ऐसे ही बिंदुओं की बिनाह पर मित्र मंडल सार्वजनिक सहकारी चिकित्सालय के संचालकों द्वारा लिए गए विक्रय अनुबंध लिखने के निर्णय को सिरे से खारिज कर दिया। जांच रिपोर्ट की मानें तो बिल्डिंग संस्था के सदस्यों की सहमति के बिना नहीं बेची जा सकती। संस्था के संचालकों को सदस्यों की बैठक बुलाने के अधिकार थे। जो नहीं बुलाई गई। जांच के दौरान संचालक यह साबित नहीं कर सके कि इमारत सदस्यों की सहमति से बेची जा रही है। जब संचालकों के अधिकार की जांच हुई तो पता चला उन्हें ऐसे निर्णय लेने का अधिकार ही नहीं है। चूंकि निर्णय बोर्ड का नहीं, संचालकों का था, इसीलिए खारिज कर दिया।
छह महीने का वक्त, छह साल से अनुबंध हवा में...
2006 में साइन हुए अनुबंध के मुताबिक महावीर नर्सिंगहोम एंड रिसर्च सेंटर को बकाया 1.72 करोड़ रुपए चुकाने के लिए छह महीने का वक्त दिया था। अनुबंध के मुताबिक छह महीने बाद बकाया रकम मिलते ही संस्था को रजिस्ट्री करना थी। यदि छह महीने में रकम नहीं मिलती तो संस्था अनुबंध रद्द कर देगी। अनुबंध हुए सात साल हो चुके हैं। आज दिन तक न अस्पताल प्रबंधन ने बकाया रकम चुकाई। न संस्था ने अनुबंध रद्द करने की कार्रवाई की। न इस संबंध में सहकारिता विभाग को किसी तरह की जानकारी दी गई। इसीलिए सहकारिता विभाग ने अनुबंध को भी शुन्य करार दे दिया।
इमारत के चक्कर में बैंक पर डल गए ताले...
इसी इमारत के निर्माण के नाम पर संचालकों ने जो मनमानी राशि खर्च की थी उसी के परिणाम ने मित्र मंडल को-ऑपरेटिव बैंक पर ताले डलवा दिए। सैकड़ों लोग बैंक के जमाकर्ता हैं। चूंकि बैंक पंजीबद्ध थी इसीलिए आरबीआई ने सदस्यों को एक-एक लाख रुपए चुकाए भी। सैकड़ों सदस्य ऐसे भी हैं जिनके बैंक में एक लाख से ज्यादा जमा थे, उनकी रकम अब तक भी अधर में है।
ईओडब्ल्यू भी कर चुका है जांच...
मित्र मंडल सार्वजनिक सहकारी चिकित्सालय, मित्र मंडल को-ऑपरेटिव बैंक की सहयोगी संस्था है। संस्था के कर्ताधर्ता निर्मल कुमार मंडलोई हैं जिन्होंने एक ही संपत्ति पर दो अलग-अलग वित्तीय संस्थानों से लोन लिया। अपनी जांच रिपोर्ट में इसका खुलासा करने के साथ ईओडब्ल्यू मंडलोई सहित तमाम संचालकों के खिलाफ चालान पेश कर चुका है। प्रकरण विचाराधीन है।
एडवांस 56 लाख से चुकाया एमपीएफसी का कर्जा
2006 में हुए अनुबंध के दौरान महावीर नर्सिंगहोम एंड रिसर्च सेंटर के डॉ. एम.के.जैन ने बतौर एडवांस जो 56 लाख रुपए चुकाए थे, संस्था ने वह पैसा सीधे मप्र वित्त निगम में खजाने में जमा किया। वित्त निगम से संस्था ने इमारत की रजिस्ट्री गिरवी रखकर कर्ज लिया था।
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संस्था के संचालकों ने बिना सदस्यों की सहमति के विक्रय अनुबंध करने का निर्णय लिया था इसीलिए उसे खारिज कर दिया। जिन शर्तों के साथ अनुबंध हुआ, उनका पालन भी नहीं हुआ। इसीलिए अनुबंध भी शुन्य है। इमारत में अस्पताल शुरू करने संबंधि किसी तरह की सहमति अब तक न सदस्यों ने दी, न ही सहकारिता विभाग ने।
सलील कटारे, संयुक्त पंजीयक
सहकारिता विभाग
2.28 करोड़ का अनुबंध किया था..
2006 में अनुबंध किया था। 2.28 करोड़ में से 56 लाख मिले। बाकी रकम नहीं मिली। ईओडब्ल्यू चालान पेश कर चुकी है। केस चल रहा है। लोन एमपीएफसी और बैंक से लिया था। बिल्डिंग जहां तक मेरी जानकारी है आवासीय नहीं है।
एड. निर्मल कुमार मंडलोई, कर्ताधर्ता
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