Monday, June 29, 2015

29 गांव ganv ki seema

इंदौर. दबंग रिपोर्टर ।
29 गांव को शहरसीमा में शामिल करने की सहमति सरकार दे चुकी है। सहमति के बाद नगर निगम, कॉलोनाइजर, बिल्डर और रहवासियों ने फायदे-नुकसान का गणित लगाना शुरू कर दिया है। वहीं नए पंचायत  अधिनियम को संविलियन की राह का रोड़ा माना जा रहा है। जानकारों की मानें तो संविलियन से नगर निगम की कमाई तो बढ़ेगी ही, लोगों को सड़क, सफाई, पानी जैसी सहुलियतें भी मिलेंगी। हां, इसके लिए बिल्डिंग पर्मिशन और संपत्ति कर के रूप में थोड़ा ज्यादा खर्च जरूर करना पड़ेगा।
2006-07 से चल रही गांवों के संविलियन की चर्चा शुक्रवार को सरकार की सहमति के बाद अंजाम तक पहुंची। इसके साथ ही नगर निगम और टाउन एंड कंट्री प्लानिंग के बीच झुलते गांव के विकास को भी नगर निगम के रूप में ठोर मिला। अब 29 ग्राम पंचायतों में टाउन एंट्री प्लानिंग कॉलोनियों के ले-आउट तो मंजूर करेगा लेकिन बिल्डिंग पर्मिशन देने की जिम्मेदारी नगर निगम ही होगी। इससे पहले इन गांवों में बनने वाली बिल्डिंग के लिए टीएंडसीपी में आवेदन करना पड़ते थे। जहां स्वीकृति में वक्त ज्यादा लगता था। कारण था स्टाफ संकट। बहरहाल, संविलियन के बाद नगर निगम की भूमिका क्या होगी? क्या जिम्मेदारी होगी? इस पर मंथन जारी है।
नगर निगम का...
फायदा..
-- 2008 में आए मास्टर प्लान और उसके प्रावधानों के बाद से नगर निगम की कॉलोनी सेल में कॉलोनियों का अकाल पड़ गया था। पांच साल में गिनती की कॉलोनियां मंजूरी के लिए आई। 29 गांवों में अनुमति का रास्ता खुलते ही यह अकाल भी दूर होगा।
-- शहरी क्षेत्र में भवन अनुज्ञा के आवेदनों का ग्राफ भी गिरने लगा था जो अब ऊंचाई छुएंगा।
-- बिल्डिंग पर्मिशन फीस, कॉलोनी सेल फीस, नर्मदा केपिटल के रूप में नगर निगम की आय बढ़ेगी। एक अनुमान के अनुसार अभी नगर निगम की राजस्व वसूली 250 करोड़ है जो कि 300 करोड़ के पार हो जाएगी।
-- नगर निगम भविष्य की प्लानिंग अच्छे से कर सकता है।
नुकसान...
-- ग्रामीण क्षेत्र छितरे हुए हैं, दूर-दूर हैं। ऐसे में वहां सड़क या अन्य बुनियादी सहुलियत उपलब्ध कराना निगम की बड़ी चुनौती होगी। उन पर पैसा ज्यादा खर्च होगा लेकिन खर्च राशि के मुकाबले आय कम होगी।
रहवासी..
फायदा
-- बिल्डिंग पर्मिशन के लिए नगर निगम अधिकृत है। नगर निगम के शहर में 15 जोन है। इनमें आधे जोन में यह गांव आएंगे। यानी हर छोटी-बड़ी मंजूरी के लिए लोगों को टीएंडसीपी नहीं जाना पड़ेगा जिसका कार्यालय इंदौर में एक ही है।
-- सरपंच और सचिव की मिलीभगत से गांवों में जिस तरह मनमाने निर्माणों को मंजूरी मिली रही थी उस पर अंकुश लगेगा। क्षेत्र व्यवस्थित होंगे।
-- सड़क, सफाई, प्रकाश व्यवस्था जैसी सुविधाएं मिलेगी।
नुकसान...
-- पंचायतों में बिल्डिंग पर्मिशन की फीस कम है। यदि नगर निगम बिल्डिंग पर्मिशन देगा तो उसकी फीस ज्यादा होगी।
--  ग्रामीण क्षेत्रों में संपत्तिकर भी कम है। कई प्रकरणों में तो संपत्तिकर मिलता ही नहीं है। संविलियन के बाद नगर निगम वर्गफीट के आधार पर संपत्तिकर वसूलेगा।
--  विकास के लिए पंचायत जिम्मेदार थी अब नगर निगम। नगर निगम में जोन संख्या मौजूदा वार्डों की संख्या को देखते हुए तय हुई। यदि गांव जुड़ते हैं तो कितने वार्ड बढ़ेंगे? यह निगम तय नहीं कर पाया। ्र
२४० वर्ग कि.मी का क्षेत्रफल
गांवों के शामिल होने के बाद अब शहर का क्षेत्रफल २४० वर्ग किमी का हो गया है। फिलहाल शहर का क्षेत्रफल १३१ वर्ग किमी है। इसमें पूर्वी क्षेत्र में टाउनशिप के होने से निगम को वहां अधिक मात्रा में विकास पर खर्च नहीं करना पड़ेगा, लेकिन पश्चिम क्षेत्र के गांवों के अंतर्गत आने वाली कॉलोनियों में सर्वाधिक खर्च करना पड़ेगा।
फिलहाल यहां हैं सर्वाधिक बसाहट
निगम के उपयंत्री दिनेश शर्मा ने सभी गांवों के बारे में जानकारी जुटाकर आयुक्त राकेशसिंह को रिर्पोट दी है। शर्मा के मुताबिक छोटा और बड़ा बांगड़दा में सर्वाधिक बसाहट है। वहां के गांवों में तीन लाख से अधिक लोग रहते है। यही पर सर्वाधिक विकास कार्य की आवश्यकता भी है। इसके अलावा अन्य गांवों में कम ही मात्रा में लोग रहते है।
संपत्तिकर के मिलेंगे २५ करोड रुपए
नगर निगम को राजस्व में कोई खास फायदा नहीं होने वाला है। २९ गांव के शामिल हो जाने के बाद २५ करोड रुपए प्रतिवर्ष का संपत्तिकर ही मिलेगा। इसमें भी निगम द्वारा मुख्य कॉलोनियों को चिन्हित किया है, वही गांवों की छोटी और मलिन बस्तियों से कितना राजस्व मिलेगा, उसका भी आंकड़ा निकाला गया है।
पानी पर ही 10 करोड का खर्च
गांवों में पानी की सप्लाई के लिए १० करोड रुपए का खर्च अनुमानित किया है। पाइप लाइन के बिछाने से लेकर घर-घर तक कनेक्शन देने की योजना तक का प्रस्तावित खर्च का बजट तैयार किया जा रहा है। इसी आधार पर नर्मदा परियोजना विभाग द्वारा काम के लिए टेंडर बुलाए जाएंगे। वहां पर प्रतिदिन न्यूनतम २० एमएलडी पानी की आवश्यकता रहेगी।
नए सेटअप पर सबकुछ निर्भर
उन गांवों में सफाई कार्य, स्ट्रीट लाइट मेंटेनेस, ड्रेनेज सफाई के साथ में मूलभूत कार्यों के लिए निगम को नए सेटअप की आवश्यकता होगी। कारण है कि मौजूदा स्टाफ से गांवों के मूलभूत कामों की पूर्ति नहीं हो पाएगी। इसके लिए नए सेटअप का प्रस्ताव बनाकर निगम की ओर से शासन को प्रस्ताव भेजा गया है। अनुमति मिलते ही निगम द्वारा भर्ती की प्रक्रिया शुरु कर दी जाएगी।
चुनौती...
नया पंचायत अधिनियम बड़ी चुनौती है। अधिनियम के तहत निगम सीमा से 16 किमी के दायरे में मौजूद गांवों में कॉलोनियों के लिए अनुमति देेने से पूर्व 15 प्रतिशत जमीन गरीबों के लिए छोडऩी होगी या फिर आश्रय निधि अदा करनी पड़ेगी। चूंकि आश्रय निधि का मामला अभी शासन के पास लंबित है, इसलिए ये निधि की राशि निगम को मिलेगी या नहीं, कुछ स्पष्ट नहीं है। केवल आश्रय निधि ही नहीं, अनेक और शुल्क हैं जिन्हें भी निगम कैसे वसूल सकेगा, ये अहम सवाल है।
कहता है पंचायत अधिनियम
मप्र पंचायत राज एवं ग्राम स्वराज संशोधन अधिनियम पूरे प्रदेश में लागू है। इसके तहत वे ग्राम पंचायतें भी हैं जो जो नगर निगम सीमा के 16 किमी और नपा या नप के 8 किमी के दायरे में हैं। ऐसे नगर जो नगरीय निकाय नहीं है, की सीमा से 3 किमी में हैं या फिर राष्ट्रीय राजमार्ग अधिनियम 1956 के तहत राष्ट्रीय राजमार्ग या मप्र हाईवे एक्ट 1936 के तहत बने लोकमार्ग के पाश्र्व से एक किमी की दूरी के भीतर ग्राम पंचायत क्षेत्र हों अथवा मप्र नगर तथा ग्राम निवेश अधिनियम 1973 के तहत किसी निवेश क्षेत्र के भीतर ग्राम पंचायत हों, वहां भी ये अधिनियम लागू होगा। अधिनियम कहता है कि ऐसी ग्राम पंचायतों में कॉलोनियां बनाने की अनुमति शासन की ओर से प्राधिकृत प्राधिकारी ही देगा। इसी अधिनियम में ये भी कहा गया है कि यदि ऐसी ग्राम पंचायतों में यदि कोई अवैध कॉलोनी काटता है तो उसे कम से कम तीन साल की सजा और दस हजार रुपए जुर्माना की सजा होगी।
सवाल आश्रय निधि समेत अन्य शुल्कों का
जब भी कोई कॉलोनी कटेगी तो उसमें 15 प्रतिशत जमीन गरीबों के लिए छोड़ी जाएगी। यदि जमीन नहीं छोड़ी जाएगी तो उसकी कीमत के बराबर राशि को आश्रय निधि में दिया जाएगा। अब सवाल ये है कि जब नगर निगम ग्राम पंचायतों में निर्माण के लिए भवन अनुज्ञा जारी करेगा तो आश्रय निधि का क्या होगा? राशि वसूलना नियम है और फिलहाल शासन ने इस पर रोक लगा रखी है। यदि ये राशि बाद में भी वसूली जाएगी तो कौन लेगा? निगम सालभर बाद जब इन गांवों को अपनी सीमा में मिलाएगा, तब ही ले सकेगा और नियमानुसार पंचायतें ले नहीं सकती। केवल ये ही नहीं, भवन निर्माण अनुज्ञा शुल्क के अलावा तमाम शुल्क भी हैं जो कैसे निगम ले सकेगा?
गांवों की जमीन नजूल की, ये भी एक संकट
नजूल तहसीलदार अजीत श्रीवास्तव ने एक पत्र तहसीलदार बिहारीसिंह को भेजा है जिसमें इन 29 गांवों की सरकारी और सीलिंग एक्ट में मिली जमीन को सौंपने को कहा है। इसके लिए उन्होंने श्री सिंह से सभी जमीनों की खसरा नकल की प्रतियां मांगने के सात इसके भौतिक सत्यापन करने व मौके पर कब्जा देने का आग्रह किया है। तहसील कार्यालय के सामने संकट ये है कि वो ऐसी जानकारियां जुटा पाने में विफल होगा क्योंकि जमीन घोटाले सामने आ जाएंगे। सरकारी जमीन पर कब्जे का रिकार्ड सामने आएगा और सबसे बड़ी दिक्कत ये है गांवों की कितनी जमीन निगम की और कितनी नजूल में जाएगी, ये भी कोई विभाजन रेखा नहीं है। खुद निगम के अधिकारी भी आश्वस्त नहीं हैंं कि  जमीनों का बंटवारा आसानी से हो जाएगा।
कुछ भी स्पष्ट नहीं है, ये ही दिक्कत-
29 गांवों को शहरी सीमा में शामिल करने को लेकर कुछ स्पष्ट नहीं है। शुल्कों को लेकर स्थिति स्पष्ट न होने से बाद में दिक्कतें आएंगी।
प्रमोद द्विवेदी, वरिष्ठ अभिभाषक

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