कार्यकर्ताओं की शिकवा-शिकायत से कोपभवन में 'राघवÓ
लिखा प्रदेश अध्यक्ष को पत्र कहा अब नहीं जाऊंगा इंदौर
इंदौर. दबंग रिपोर्टर ।
तेरी गलियों में ना रखेंगे कदम
''तू मेरा मिलना समझ लेना एक सपना था...।
तुझको अब मिल ही गया जो तेरा अपना था...।ÓÓ
इंदौर के प्रभारी मंत्री और 'शिवÓ सरकार के खजांची राघवजी स्थानीय कार्यकर्ताओं की शिकवा-शिकयात से नाराज होकर कोपभवन में बैठ गए हैं। उन्होंने प्रदेश अध्यक्ष प्रभात झा को पत्र लिखा। पत्र में उन्होंने 1974 में रिलीज फिल्म 'हवसÓ के हिट गाने के बोल इस्तेमाल करते हुए झा को स्पष्ट कर दिया कि जब तक कार्यकर्ताओं का रवैया नहीं सुधरता तब तक वे इंदौर नहीं आएंगे। इधर, स्थानीय कार्यकर्ताओं की मानें तो इंदौर जैसे फास्ट ग्रोइंग शहर को 77 सावन देख चुके राघवजी जैसा सुस्त स्वभावी प्रभारी मंत्री नहीं चाहिए। कमान वही संभाले जिसमें शहर की सूरत संवारने का जेहादी जज्बा हो।
राघवजी के इंदौर आने पर भाजपा कार्यालय नहीं जाने पर पार्टी कार्यकर्ताओं में खासी नाराजगी थी। उनका कहना था कि राघवजी को जिला प्रभारी मंत्री होने के नाते उनकी समस्याएं सुनना चाहिए लेकिन वे कतराते हैं। इस पर श्री झा ने इंदौर में ही कार्यकर्ताओं से कह दिया था कि वे राघवजी भाई के इंदौर आने पर प्रदर्शन करेंगे। बाद में भोपाल में श्री झा ने श्री राघवजी फटकारते हुए कहा था कि वे इंदौर के कार्यकर्ताओं को संतुष्ट रखें। जब भी इंदौर जाएं तो कार्यकर्ताओं से जरूर मिलें। राघवजी ने कार्यकर्ताओं से मिलने के बजाय 21 अक्टूबर को प्रदेश अध्यक्ष को पत्र लिखा। पत्र में उन्होंने लिखा मैं जब भी इंदौर जाता हूं तो मुझसे कोई कार्यकर्ता या पदाधिकारी कोई शिकायत-सुझाव बताता ही नहीं। इसलिए वहां जाने का मतलब क्या है? बावजूद इसके कार्यकर्ताओं ने शिकायत की। आपने उनकी बात सूनी। मेरी बात सुने बगैर मुझे फटकार दिया। अब में इंदौर नहीं जाऊंगा। गया भी तो भाजपा कार्यालय तो कमसकम नहीं ही जाऊंगा। वह भी तब तक जब तक कि कार्यकर्ता अपना शिकायती रवैया न सुधार ले।
क्यों नाराज है कार्यकर्ता....
2004 से लेकर 2007 तक आवास एवं पर्यावरण मंत्री जयंत मलैया इंदौर के प्रभारी मंत्री रही। 2007 से लेकर 2008 तक नगरीय प्रशासन मंत्री बाबुलाल गौर ने कमान संभाली।
2004 से लेकर 2007 के बीच जेएनएनयूआरएम ने 2745 करोड़ की डीपीआर मंजूर की। निगम की आर्थिक स्थिति सुधरी। यशवंतसागर जलावर्धन योजना, नर्मदा तृतीय चरण और बांड रोड द्वितीय चरण जैसी 800 करोड़ से अधिक की कई योजनाओं पर काम शुरू हुए। आधा दर्जन नई पानी की टंकियां बनी।
2007 से 2008 के बीच बीआरटीएस का काम शुरू हुआ। आवासीय इकाइयों के काम शुरू हुआ। कचरा प्रबंधन के तहत संसाधन खरीदे गए। बीओटी के तहत निगम ने कई करोड़ के काम किए।
2008 के बाद जब से राघवजी ने बतौर प्रभारी मंत्री इंदौर की कमान संभाली उनके सुस्त रवैये का अफसरों ने फायदा उठाया। 2004 से लेकर 2008 के बीच जितने भी काम शुरू हुए ढिलाई के कारण एक भी 2011 तक पूरा नहीं हुआ।
अपराध बढ़े..। कॉलोनियों में कब्जे बढ़े। हाउसिंग सोसायटियों के खिलाफ बड़े पैमाने पर प्रशासन-पुलिस ने मोर्चा खोला लेकिन प्रभारी मंत्री ने दोषियों को दंड दिलाने में रुचि नहीं दिखाई।
नगर निगम में महापौर सुस्त हैं। इंदौर विकास प्राधिकरण में राजनीतिक अध्यक्ष है नहीं। ऐसे में प्रभारी मंत्री से काम की गति का संतुलन बनाए रखने की उम्मीद रखनें वालों को राघवजी ने निराश ही किया।
तीन वर्षों में उन्होंने बैठकें बहुत ली लेकिन बैठकें सार्थक साबित भी या नहीं इसकी समीक्षा कभी नहीं की।
यह है राघवजी की शिकायत
-- इंदौर के कार्यकर्ताओं ने साथ नहीं दिया।
-- पार्टी एक परिवार की तरह है। यदि मुझसे शिकायत थी तो उन्हें शिकवा-शिकायत करने के बजाय मुझसे बात करना थी।
-- विकासकार्यों में देर हुई उसकी कई अलग-अलग वजह हैं।
-- हर समीक्षा बैठक में आगे रहकर कार्यकर्ताओं से पूछता रहा लेकिन कोई बोलता ही नहीं था।
लिखा प्रदेश अध्यक्ष को पत्र कहा अब नहीं जाऊंगा इंदौर
इंदौर. दबंग रिपोर्टर ।
तेरी गलियों में ना रखेंगे कदम
''तू मेरा मिलना समझ लेना एक सपना था...।
तुझको अब मिल ही गया जो तेरा अपना था...।ÓÓ
इंदौर के प्रभारी मंत्री और 'शिवÓ सरकार के खजांची राघवजी स्थानीय कार्यकर्ताओं की शिकवा-शिकयात से नाराज होकर कोपभवन में बैठ गए हैं। उन्होंने प्रदेश अध्यक्ष प्रभात झा को पत्र लिखा। पत्र में उन्होंने 1974 में रिलीज फिल्म 'हवसÓ के हिट गाने के बोल इस्तेमाल करते हुए झा को स्पष्ट कर दिया कि जब तक कार्यकर्ताओं का रवैया नहीं सुधरता तब तक वे इंदौर नहीं आएंगे। इधर, स्थानीय कार्यकर्ताओं की मानें तो इंदौर जैसे फास्ट ग्रोइंग शहर को 77 सावन देख चुके राघवजी जैसा सुस्त स्वभावी प्रभारी मंत्री नहीं चाहिए। कमान वही संभाले जिसमें शहर की सूरत संवारने का जेहादी जज्बा हो।
राघवजी के इंदौर आने पर भाजपा कार्यालय नहीं जाने पर पार्टी कार्यकर्ताओं में खासी नाराजगी थी। उनका कहना था कि राघवजी को जिला प्रभारी मंत्री होने के नाते उनकी समस्याएं सुनना चाहिए लेकिन वे कतराते हैं। इस पर श्री झा ने इंदौर में ही कार्यकर्ताओं से कह दिया था कि वे राघवजी भाई के इंदौर आने पर प्रदर्शन करेंगे। बाद में भोपाल में श्री झा ने श्री राघवजी फटकारते हुए कहा था कि वे इंदौर के कार्यकर्ताओं को संतुष्ट रखें। जब भी इंदौर जाएं तो कार्यकर्ताओं से जरूर मिलें। राघवजी ने कार्यकर्ताओं से मिलने के बजाय 21 अक्टूबर को प्रदेश अध्यक्ष को पत्र लिखा। पत्र में उन्होंने लिखा मैं जब भी इंदौर जाता हूं तो मुझसे कोई कार्यकर्ता या पदाधिकारी कोई शिकायत-सुझाव बताता ही नहीं। इसलिए वहां जाने का मतलब क्या है? बावजूद इसके कार्यकर्ताओं ने शिकायत की। आपने उनकी बात सूनी। मेरी बात सुने बगैर मुझे फटकार दिया। अब में इंदौर नहीं जाऊंगा। गया भी तो भाजपा कार्यालय तो कमसकम नहीं ही जाऊंगा। वह भी तब तक जब तक कि कार्यकर्ता अपना शिकायती रवैया न सुधार ले।
क्यों नाराज है कार्यकर्ता....
2004 से लेकर 2007 तक आवास एवं पर्यावरण मंत्री जयंत मलैया इंदौर के प्रभारी मंत्री रही। 2007 से लेकर 2008 तक नगरीय प्रशासन मंत्री बाबुलाल गौर ने कमान संभाली।
2004 से लेकर 2007 के बीच जेएनएनयूआरएम ने 2745 करोड़ की डीपीआर मंजूर की। निगम की आर्थिक स्थिति सुधरी। यशवंतसागर जलावर्धन योजना, नर्मदा तृतीय चरण और बांड रोड द्वितीय चरण जैसी 800 करोड़ से अधिक की कई योजनाओं पर काम शुरू हुए। आधा दर्जन नई पानी की टंकियां बनी।
2007 से 2008 के बीच बीआरटीएस का काम शुरू हुआ। आवासीय इकाइयों के काम शुरू हुआ। कचरा प्रबंधन के तहत संसाधन खरीदे गए। बीओटी के तहत निगम ने कई करोड़ के काम किए।
2008 के बाद जब से राघवजी ने बतौर प्रभारी मंत्री इंदौर की कमान संभाली उनके सुस्त रवैये का अफसरों ने फायदा उठाया। 2004 से लेकर 2008 के बीच जितने भी काम शुरू हुए ढिलाई के कारण एक भी 2011 तक पूरा नहीं हुआ।
अपराध बढ़े..। कॉलोनियों में कब्जे बढ़े। हाउसिंग सोसायटियों के खिलाफ बड़े पैमाने पर प्रशासन-पुलिस ने मोर्चा खोला लेकिन प्रभारी मंत्री ने दोषियों को दंड दिलाने में रुचि नहीं दिखाई।
नगर निगम में महापौर सुस्त हैं। इंदौर विकास प्राधिकरण में राजनीतिक अध्यक्ष है नहीं। ऐसे में प्रभारी मंत्री से काम की गति का संतुलन बनाए रखने की उम्मीद रखनें वालों को राघवजी ने निराश ही किया।
तीन वर्षों में उन्होंने बैठकें बहुत ली लेकिन बैठकें सार्थक साबित भी या नहीं इसकी समीक्षा कभी नहीं की।
यह है राघवजी की शिकायत
-- इंदौर के कार्यकर्ताओं ने साथ नहीं दिया।
-- पार्टी एक परिवार की तरह है। यदि मुझसे शिकायत थी तो उन्हें शिकवा-शिकायत करने के बजाय मुझसे बात करना थी।
-- विकासकार्यों में देर हुई उसकी कई अलग-अलग वजह हैं।
-- हर समीक्षा बैठक में आगे रहकर कार्यकर्ताओं से पूछता रहा लेकिन कोई बोलता ही नहीं था।
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