Monday, June 29, 2015

ए-टू-जेड का करिश्मा कचरे से 950 करोड़ की कमाई nn


खेल बीओटी और कमीश्नखोरी का
इंदौर. चीफ रिपोर्टर ।
बीओटी के तहत सड़कें बनवाकर पीडब्ल्यूडी ने ठेकेदारों को टोल वसूली का ठेका दे दिया तो नगर निगम से ठेका लेकर ए-टू-जेड कचरे से चांदी काट रही है। आंकड़ों के लिहाज से बात करें तो 15 करोड़ रुपए का प्रोसेसिंग प्लांट खड़ा करने वाली ए-टू-जेड 20 साल में कचरे से ही 850 करोड़ रुपए जुटा लेगी। कुल मिलाकर जमीन नगर निगम की, कचरा नगर निगम का लेकिन 'ए-टू-जेडÓ चांदी कंपनी और निगम के उन कमीश्रखोरों की जिन्होंने कपंनी को ठेका दिलाने में अहम भूमिका अदा की।
जेएनएनयूआरएम के तहत स्वीकृत 58.64 करोड़ की कचरा प्रबंधन योजना के तहत नगर निगम ने पीपीपी के तहत ट्रेंचिंग ग्राउंड पर प्रोसेसिंग प्लांट (जहां कचरे से खाद बनाया जाता है) बनाने की मंजूरी एटूजेड को दी थी। प्लांट मई 2011 से तैयार है। सितंबर से उत्पादन भी शुरू हो चुका। स्वयं कंपनी कर्ताधर्ताओं की मानें तो प्लांट में 600 टन कचरा रोज प्रोसेस होगा। प्रोसेसिंग के बाद 10-15 फीसदी (60 से 90 टन) खाद बनेगा जिसकी बाजार कीमत तकरीबन 10.50 लाख है। इतना ही प्लास्टिक मटेरियल भी बनेगा। जिसकी बाजार कीमत 1.80 लाख रुपए है। 12.30 लाख रुपए रोज का उत्पादन। 3.69 करोड़ रुपए/महीना और 47.16 करोड़ रुपए साल। यानी नगर निगम ने 20 साल का जो ठेका दिया है उसमें कंपनी कमसकम 950 करोड़ रुपए का कारोबार करेगी। वह भी उस स्थिति में जब बेलगाम बढ़ते शहर में कचरे की तादाद भी 10 फीसदी सालाना बढऩा है।
25 एकड़ में फैले इस प्लांट में तीन शिफ्ट में कुल सौ लोगों का मैदानी अमला है। इसमें 50 मजदूर और सुरक्षाकर्मी है। बिजली के बिल, स्टॉफ की सेलेरी, मेंटेनेंस, कचरे के बदले निगम को दी जाने वाली राशि सहित तमाम खर्च जोड़ भी लें तो कंपनी 50 फीसदी विशुद्ध रूप से मुनाफा कमा रही है। इधर, जानकारों की मानें तो सालाना खान नदी के सौंदर्यीकरण, स्वागत-सम्मान-शिलान्यास-लोकार्पण समारोह और बिला वजह की बैठकों पर लाखों रुपए फुंकने वाला निगम 15-20 करोड़ रुपए लगाता तो न सिर्फ खाद उत्पादन से खजाने में बढ़ोत्तरी होती बल्कि कार्बनके्रडिट के लिए भी निगम को 50 फीसदी का भागीदार बनकर संतोष न करना पड़ता। यदि निगम को ठेका कंपनी को देना भी तो उसे यह भी स्पष्ट कर देना था कि ब्याज सहित कंपनी कितना कमाकर प्लांट का कब्जा निगम को सौंपेगी।
ऐसे बढ़ेगा कचरा और उसके साथ मुनाफा....
अनुबंध और आंकड़े बताते हैं कि 2011 में शहर से उत्सर्जित होने वाले कचरे की मात्रा 600 टन है। इसमें 10 फीसदी सालना बढ़ोत्तरी का अनुमान है। 2012 में कचरा बढ़कर 660 टन हो जाएगा। 2013 में 726, 2014 में 798, २०१५ में 877, २०१६ में 964, २०१७ में 1060, 2018 में 1166, 2019 में 1282 टन कचरा रोज उगलेगा। आठ वर्षों में ही कचरे की मात्रा बढ़कर दोगुनी होगी। बनी बात है कि उससे बनने वाली खाद-प्लास्टिक की मात्रा और मुनाफा भी दोगुना होगा। यदि अनुबंध शर्तों के लिहाज से ही बात करें तो कंपनी 20 वर्षों में 2000 करोड़ रुपए से अधिक की खाद बनाएगी। इस आंकड़े के आंकलन की वजह उत्पादन में बेतहाशा बढ़ोत्तरी के साथ खाद की कीमतों में सालाना इजाफा भी है।
जोर का झटका धीरे से....
-- आंकड़ों के लिहाज से बात करें तो इंदौर से हर दिन 600 मीट्रिक टन कचरा टे्रंचिंग ग्राउंड पहुंचता है। अनुबंध में निगम ने 80 प्रतिशत कचरे के उपयोग की बात की थी तब कंपनी ने दावे के साथ कहा था कि 90 फीसदी कचरा उपयोग होगा। 10 प्रतिशत ही लैंडफील में जाएगा।
-- 600 टन कचरा प्रोसेस करने के बाद कायदे से 20 प्रतिशत 120 टन खाद रोज बनता है। 15 प्रतिशत प्लांट की न्यूनतम क्षमता है जबकि कंपनी कहती है 7 प्रतिशत के हिसाब से सिर्फ 40 टन ही बन रहा है।
-- खाद बनाने के लिए कंपनी जो 600 टन कचरा रोज लेगी उसके बदले उसे 21 रुपए/टन के हिसाब से निगम को चुकाना होंगे।
-- सितंबर से दिसंबर 2011 के बीच 120 दिनों में कंपनी ने 72,000 टन कचरा उठाया। प्रोसेसिंग शुरू करने की जानकारी न देकर कंपनी ने 21 रुपए/टन के हिसाब से 15.12 लाख रुपए बचाए, जबकि इसी 72,000 टन कचरे को शहर से उठाने के लिए 270 रुपए/टन के हिसाब से कंपनी ने निगम को 1.94 करोड़ के बिल भी थमा दिए थे।
कमाई के यह भी तरीके...
-- नगर निगम ने ट्रेचिंग ग्राउंड के पास जो 25 एकड़ जमीन कंपनी को दी है उससे लगी जमीनों के भाव 1.5 करोड़ रुपए एकड़ है। यानी ३७ करोड़ बचे।
-- ३० फीसदी कचरा नगर निगम की गाडिय़ां उठाकर दे रही है।
-- कचरा कोठियों का कोई हिसाब नहीं। खराब पेटियां मैदान से तोड़ मरोड़कर कंपनी बेच देती है।
-- निगम की कई गाडिय़ां ट्रांसफर स्टेशन तक कचरा छोड़ती है वहां से कंपनी कचरा उठाती है। जबकि बिलिंग कचरा कंटेनर से ट्रेंचिंग ग्राउंड तक की होती है।
-- नगर निगम ने 500 टन कचरा उठाने की जिम्मेदारी 2009 में दी थी। कचरा सालाना 10 फीसदी बढऩा था। कंपनी उठाती कम कचरा है लेकिन बताती ज्यादा है ताकि प्रति टन ३०० टन रूपया मिलता रहे। दिन की 10 ट्रिप भी फर्जी लगाई तो एक लाख रुपए/माह बचाए।
-- जीपीएस कंट्रोल रूम न लगाकर एक लाख रुपए/ बचाया। तीन साल में ३६ लाख बचाए।
-- वर्कशॉप बनाना थी जो नहीं बनाई। 50 लाख से ज्यादा बचाए।
-- एक गाड़ी के कलपुर्जे निकालकर दूसरी गाड़ी में लगा दिए। गाडिय़ां भंगार कर दी। कलपुर्जों से ही अब तक 25 लाख से ज्यादा कमाए।
निगम ऐसे मेहरबान...
-- एटूजेड के बिल सबसे जल्दी क्लीयर होते हैं।
-- एटूजेड की गड़बड़ गिनने वाला कोई नहीं।
-- जीपीएस कंट्रोल रूम और वर्कशॉप क्यों नहीं बनी? पूछने वाला कोई नहीं।
-- कचरा गाडिय़ां कचरा हो गई। प्रभारी कहते हैं अपना लूक आउट नहीं।
-- आयुक्त कहते हैं सबसे कम लागत में कचरा उठाने के कारण ही खूबसूरत लग रही है कंपनी।
-- आग लगने के कारण महीनेभर प्लांट रहा? कब चालू होगा किसी ने नहीं पूछा। इस बीच 21 रुपए/टन निगम को नहीं मिला। ट्रेचिंग ग्राउंड पर कचरे का ढेर लग गया।
-- आरटीआई या पार्षद प्रश्न का जवाब नहीं मिलता।
कंपनी की खाद
....ब्रांड....
-- गोदावरी
-- कृभको
-- एटूजेड
50 किलोग्राम की एक खाद की बोरी की कीमत औसत 350 रुपए है।
उत्पादन......
गर्मी में : 25 से 30 प्रतिशत तक
बारिश : 15 प्रतिशत
सर्दी में : 15 से 25 प्रतिशत

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