- पोलोग्राउंड में 1997 में नहीं दिखा नल में पानी
- बड़ी योजनाओं के बावजूद देवास और पीथमपुर में जलसंकट बड़ी कहानी
- पालदा, सांवेर रोड, मांगलिया और राऊ जैसे क्षेत्र गिनती में ही नहीं
इंदौर. विनोद शर्मा।
एक तरफ मध्य प्रदेश सरकार विदेशी उद्योगों को प्रदेश में लाने के लिए करोड़ों रुपया पानी की तरह बहा रही है वहीं दूसरी ओर पानी के संकट के कारण इंदौर और इंदौर के आसपास के औद्योगिक क्षेत्र पानी-पानी के लिए तरस रहे हैं। इंदौर का पोलोग्राउंड सबसे बड़ा उदाहरण है जहां 1994 में नल लगे थे लेकिन 1997 के बाद से उद्योगपतियों ने नल पानी की एक बूंद टपकती नहीं देखी। कनेक्शन कटवाने के बाद भी नगर निगम उन्हें बकायादार बताकर कुर्की के नोटिस जरूर थमाता रहता है। आंकड़ों के लिहाज से बात करें तो इन दिनों सांवेर रोड, पोलोग्राउंड, मांगलिया, पीथमपुर, पालदा और देवास जैसे औद्योगिक क्षेत्रों में तकरीबन 5000 छोटी-मोटी इकाइयां पानी के लिए परेशान है। सरकारी अनदेखी से निराश यह उद्योग जरूरत पूर्ति के लिए 20 लाख रुपए रोज का पानी इस्तेमाल कर रहे हैं। औसत के लिहाज से यह आंकड़ा सालाना 50 करोड़ होता है।
जल आपूर्ति सुविधा के लिए सांवेर रोड व पोलोग्राउंड औद्योगिक क्षेत्र के उद्योग सालों से नगर निगम से मांग कर रहे हैं। 1994-95 में नगर निगम ने तकरीबन 350 इकाइयों को कनेक्शन दिए भी। 1995, 1996 और 1997 तक पानी आया भी। 1997 के बाद नल से पानी ऐसा सूखा कि आज भी टोटी बूंद को तरसती है। शिकवा-शिकायत के बाद भी जब नल में 'नर्मदाÓ नहीं आई तो परेशान उद्योगपतियों ने 2002 में एकमुश्त नल कनेक्शन कटवा दिए। न नल बचा, न पानी लेकिन नगर निगम का बिल जरूर बकाया रह गया। ऐसोसिएशन ऑफ इंडस्ट्री मप्र(एआईएमपी) के महासचिव विजय अग्रवाल ने बताया बकाया बिलों को लेकर हमने आपत्ति ली तो नगर निगम से जवाब मिला बकाया है तो बकाया ही चलने दो। डाटा सिस्टम में सेव है। इसे सरकार की मर्जी के बगैर हटा नहीं सकते। 2002 में कनेक्शन कटवाकर 2006 में नगर निगम अधिकारियों के साथ हुई बैठक में लिए गए निर्णय के अनुसार सेटलमेंट राशि भी जमा करा दि गई थी। बावजूद इसके नगर निगम ने किसी को 17 हजार का बिल थमाया तो किसी को 35,000, किसी को 50,000 का। गौरतलब है कि सांवेर रोड, पोलोगाउंड और लक्ष्मीनगर औद्योगिक क्षेत्र में स्थित 1800 से अधिक छोटी-मोटी औद्योगिक इकाइयां सालों से पानी की आपूर्ति के लिए परेशान है। निगम ने सालों पहले यहां पाइप लाइन डाली भी लेकिन पानी की आपूर्ति आज तक नहीं की गई।
कभी सिस्टम की गड़बड़, कभी कुर्की की धमकी
उद्योगपतियों का कहना है कि निगम ने कई मर्तबा नोटिस भेजकर बकाया बिल जमा करने का कहा। संपत्ति कुर्क करने की चेतावनी भी दी। नल के कनेक्शन उद्योगपतियों ने जरूरत के हिसाब से लिए थे। उसी जरूरत के हिसाब से बिल आता था जो आ रहा है लेकिन पानी नहीं आता। निगम कभी सिस्टम की गड़बड़ बताकर बात टाल जाता है तो वही निगम बाद में कुर्की की धमकी देता है नोटिस भेजकर।
20 लाख रुपए रोज का पानी
उद्योग सूत्रों के अनुसार इंदौर के आसपास स्थित पीथमपुर, सांवेर रोड़, देवास, पोलोग्राउंड, लक्ष्मीनगर, उद्योग नगर, पालदा औद्योगिक क्षेत्र में स्थित कंपनियां रोजाना 20 लाख रुपये का पानी प्राइवेट सप्लायर्स से खरीद रही हैं। इन औद्योगिक क्षेत्र में लगभग 20 हजार छोटे बड़ी कंपनियां व फैक्ट्रियां हैं जो प्रतिदिन लगभग 15 हजार किलो लीटर पानी प्राइवेट टैंकरों से खरीदती हैं।
नर्मदा से मिलेगा सहारा
नर्मदा के तृतीय चरण में सांवेर रोड़ के उद्योगों को पानी प्रदान करने की बात इंदौर नगर निगम द्वारा कहीं जा रही है लेकिन इस पर कब तक अमल किया जाएगा यह कोई कहने को तैयार नहीं है।
मांगते हैं पानी मिलता है आश्वासन
एआईएमपी के पूर्व अध्यक्ष अशोक जायसवाल ने बताया जब उद्योगों को निगम ने पानी सप्लाई नहीं किया तो उसका बिल कैसे भेज दिया। इस मामले में एसोसिएशन के प्रतिनिधियों ने नगर निगम के अपर आयुक्त से विस्तृत चर्चा भी करी है जिसमें निगम ने आश्वासन दिया की एक माह में यह समस्या दूर कर दी जाएगी।
पानी अच्छा गिरे या बूरा यहां हालात नहीं बदलते
गौरतलब है कि प्रदेश की औद्योगिक राजधानी इंदौर के आसपास स्थित औद्योगिक क्षेत्रों में उद्योगों को भारी जल संकट का सामना करना पड़ रहा है। इस साल बेहतर बारिश के चलते यह संकट थोड़ा कम जरूर हुआ है लेकिन कंपनियों को अभी भी रोजमर्रा के उपयोग व कर्मचारियों और मजदूरों के पीने के पानी की व्यवस्था प्राइवेट वॉटर सप्लायरों से पानी खरीद कर करना पड़ रही है।
पानी से यह है परेशानी
-- हर कंपनी ने बोरिंग करवाए।
-- कुछ के बोरिंग 12 महीने चलते हैं तो 90 फीसदी से ज्यादा बोरिंग गर्मी शुरू होने से पहले ही जवाब दे जाते हेैं।
-- एक कंपनी में एक वक्त में औसत 30 लोगों का स्टॉफ रहता है। 80 लीटर/प्रति व्यक्ति के हिसाब से इनकी जरूरत की पूर्ति ही की जाए तो 2400 लीटर पानी लगेगा। जिसकी बाजार कीमत 80 रुपए है।
-- कभी टेंकर वक्त पर मिल जाते हैं तो कभी समय लगता है।
-- पानी पर होने वाले खर्च उत्पादन लागत भी बढ़ा देता है।
यहां-यहां है सबसे ज्यादा परेशानी
पोलोग्राउंड : नल है पानी नहीं।
लक्ष्मीनगर : नल है पानी नहीं।
सांवेर रोड : 5 फीसदी हिस्से में है लाइन।
पालदा : नर्मदा नहीं है।
मांगलिया : बोरिंग-टैंकर सहारा।
देवास नाका : बोरिंग-टैंकर सहारा।
पीथमपुर : संजय जलाशय से मिलता है पानी। गर्मी में दिक्कत।
देवास - गर्मी में आती है दिक्कत।
राऊ - बोरिंग-टैंकर सहारा।
- बड़ी योजनाओं के बावजूद देवास और पीथमपुर में जलसंकट बड़ी कहानी
- पालदा, सांवेर रोड, मांगलिया और राऊ जैसे क्षेत्र गिनती में ही नहीं
इंदौर. विनोद शर्मा।
एक तरफ मध्य प्रदेश सरकार विदेशी उद्योगों को प्रदेश में लाने के लिए करोड़ों रुपया पानी की तरह बहा रही है वहीं दूसरी ओर पानी के संकट के कारण इंदौर और इंदौर के आसपास के औद्योगिक क्षेत्र पानी-पानी के लिए तरस रहे हैं। इंदौर का पोलोग्राउंड सबसे बड़ा उदाहरण है जहां 1994 में नल लगे थे लेकिन 1997 के बाद से उद्योगपतियों ने नल पानी की एक बूंद टपकती नहीं देखी। कनेक्शन कटवाने के बाद भी नगर निगम उन्हें बकायादार बताकर कुर्की के नोटिस जरूर थमाता रहता है। आंकड़ों के लिहाज से बात करें तो इन दिनों सांवेर रोड, पोलोग्राउंड, मांगलिया, पीथमपुर, पालदा और देवास जैसे औद्योगिक क्षेत्रों में तकरीबन 5000 छोटी-मोटी इकाइयां पानी के लिए परेशान है। सरकारी अनदेखी से निराश यह उद्योग जरूरत पूर्ति के लिए 20 लाख रुपए रोज का पानी इस्तेमाल कर रहे हैं। औसत के लिहाज से यह आंकड़ा सालाना 50 करोड़ होता है।
जल आपूर्ति सुविधा के लिए सांवेर रोड व पोलोग्राउंड औद्योगिक क्षेत्र के उद्योग सालों से नगर निगम से मांग कर रहे हैं। 1994-95 में नगर निगम ने तकरीबन 350 इकाइयों को कनेक्शन दिए भी। 1995, 1996 और 1997 तक पानी आया भी। 1997 के बाद नल से पानी ऐसा सूखा कि आज भी टोटी बूंद को तरसती है। शिकवा-शिकायत के बाद भी जब नल में 'नर्मदाÓ नहीं आई तो परेशान उद्योगपतियों ने 2002 में एकमुश्त नल कनेक्शन कटवा दिए। न नल बचा, न पानी लेकिन नगर निगम का बिल जरूर बकाया रह गया। ऐसोसिएशन ऑफ इंडस्ट्री मप्र(एआईएमपी) के महासचिव विजय अग्रवाल ने बताया बकाया बिलों को लेकर हमने आपत्ति ली तो नगर निगम से जवाब मिला बकाया है तो बकाया ही चलने दो। डाटा सिस्टम में सेव है। इसे सरकार की मर्जी के बगैर हटा नहीं सकते। 2002 में कनेक्शन कटवाकर 2006 में नगर निगम अधिकारियों के साथ हुई बैठक में लिए गए निर्णय के अनुसार सेटलमेंट राशि भी जमा करा दि गई थी। बावजूद इसके नगर निगम ने किसी को 17 हजार का बिल थमाया तो किसी को 35,000, किसी को 50,000 का। गौरतलब है कि सांवेर रोड, पोलोगाउंड और लक्ष्मीनगर औद्योगिक क्षेत्र में स्थित 1800 से अधिक छोटी-मोटी औद्योगिक इकाइयां सालों से पानी की आपूर्ति के लिए परेशान है। निगम ने सालों पहले यहां पाइप लाइन डाली भी लेकिन पानी की आपूर्ति आज तक नहीं की गई।
कभी सिस्टम की गड़बड़, कभी कुर्की की धमकी
उद्योगपतियों का कहना है कि निगम ने कई मर्तबा नोटिस भेजकर बकाया बिल जमा करने का कहा। संपत्ति कुर्क करने की चेतावनी भी दी। नल के कनेक्शन उद्योगपतियों ने जरूरत के हिसाब से लिए थे। उसी जरूरत के हिसाब से बिल आता था जो आ रहा है लेकिन पानी नहीं आता। निगम कभी सिस्टम की गड़बड़ बताकर बात टाल जाता है तो वही निगम बाद में कुर्की की धमकी देता है नोटिस भेजकर।
20 लाख रुपए रोज का पानी
उद्योग सूत्रों के अनुसार इंदौर के आसपास स्थित पीथमपुर, सांवेर रोड़, देवास, पोलोग्राउंड, लक्ष्मीनगर, उद्योग नगर, पालदा औद्योगिक क्षेत्र में स्थित कंपनियां रोजाना 20 लाख रुपये का पानी प्राइवेट सप्लायर्स से खरीद रही हैं। इन औद्योगिक क्षेत्र में लगभग 20 हजार छोटे बड़ी कंपनियां व फैक्ट्रियां हैं जो प्रतिदिन लगभग 15 हजार किलो लीटर पानी प्राइवेट टैंकरों से खरीदती हैं।
नर्मदा से मिलेगा सहारा
नर्मदा के तृतीय चरण में सांवेर रोड़ के उद्योगों को पानी प्रदान करने की बात इंदौर नगर निगम द्वारा कहीं जा रही है लेकिन इस पर कब तक अमल किया जाएगा यह कोई कहने को तैयार नहीं है।
मांगते हैं पानी मिलता है आश्वासन
एआईएमपी के पूर्व अध्यक्ष अशोक जायसवाल ने बताया जब उद्योगों को निगम ने पानी सप्लाई नहीं किया तो उसका बिल कैसे भेज दिया। इस मामले में एसोसिएशन के प्रतिनिधियों ने नगर निगम के अपर आयुक्त से विस्तृत चर्चा भी करी है जिसमें निगम ने आश्वासन दिया की एक माह में यह समस्या दूर कर दी जाएगी।
पानी अच्छा गिरे या बूरा यहां हालात नहीं बदलते
गौरतलब है कि प्रदेश की औद्योगिक राजधानी इंदौर के आसपास स्थित औद्योगिक क्षेत्रों में उद्योगों को भारी जल संकट का सामना करना पड़ रहा है। इस साल बेहतर बारिश के चलते यह संकट थोड़ा कम जरूर हुआ है लेकिन कंपनियों को अभी भी रोजमर्रा के उपयोग व कर्मचारियों और मजदूरों के पीने के पानी की व्यवस्था प्राइवेट वॉटर सप्लायरों से पानी खरीद कर करना पड़ रही है।
पानी से यह है परेशानी
-- हर कंपनी ने बोरिंग करवाए।
-- कुछ के बोरिंग 12 महीने चलते हैं तो 90 फीसदी से ज्यादा बोरिंग गर्मी शुरू होने से पहले ही जवाब दे जाते हेैं।
-- एक कंपनी में एक वक्त में औसत 30 लोगों का स्टॉफ रहता है। 80 लीटर/प्रति व्यक्ति के हिसाब से इनकी जरूरत की पूर्ति ही की जाए तो 2400 लीटर पानी लगेगा। जिसकी बाजार कीमत 80 रुपए है।
-- कभी टेंकर वक्त पर मिल जाते हैं तो कभी समय लगता है।
-- पानी पर होने वाले खर्च उत्पादन लागत भी बढ़ा देता है।
यहां-यहां है सबसे ज्यादा परेशानी
पोलोग्राउंड : नल है पानी नहीं।
लक्ष्मीनगर : नल है पानी नहीं।
सांवेर रोड : 5 फीसदी हिस्से में है लाइन।
पालदा : नर्मदा नहीं है।
मांगलिया : बोरिंग-टैंकर सहारा।
देवास नाका : बोरिंग-टैंकर सहारा।
पीथमपुर : संजय जलाशय से मिलता है पानी। गर्मी में दिक्कत।
देवास - गर्मी में आती है दिक्कत।
राऊ - बोरिंग-टैंकर सहारा।
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