Monday, June 29, 2015

कुपोषण... और महू के भील...

विनोद शर्मा
मप्र की औद्योगिक और आर्थिक राजधानी है इंदौर। इसी इंदौर की तहसील है महू। महू विविधताओं से परिपूर्ण क्षेत्र है। यहां कुछ गांवों में आर्थिक संपन्नता नजर आती है तो कुछ इतने पिछड़े हुए हैं कि उनकी गिनती झाबुआ-अलीराजपुर जैसे आदिवासी जिलों के गांवों की तरह होती है। इन गांवों में कुपोषण की स्थिति ज्यादा खराब न सही लेकिन बहुत ज्यादा अच्छी भी नहीं है। खासकर मानपुर और चोरल से लगे उन  गांवों में जहां भील जाति के लोग रहते हैं। इन लोगों की प्राथमिकताएं अलग है। प्राथमिकता का बच्चों के पोषण आहार से कम ही लेना-देना है।
आंकड़ों के अनुसार महू तीन हिस्सों में बंटा है। एक हिस्सा शहरी है। बाकी दो हिस्से ग्रामीण, मानपुर और चोरल-सिमरोल। शहरी हिस्से में ९० आंगनबाड़ी और उपपोषण केंद्र है। मानपुर में 114 केंद्र है जबकि चोरल-सिमरोल में 107 केंद्र।  इनमें 81 गांव आदिवासी क्षेत्र हैं जहां भील के लोग रहते हैं। प्री-स्कूल में सांझा चुल्हा परियोजना के तहत सामजिक संस्थाएं मध्यान्ह भोजन बनाकर देती है। वहीं इससे बड़ी कक्षाओं में टेक होम राशन के पैकेट दिए जाते हैं। पैकेट की गुणवत्ता तय है। दिक्कत आती है मध्यान्ह भोजन में। जैसा समूह या संस्था की इच्छा, वैसा वहां के बच्चों का मध्यान्ह भोजन। कुछ में अच्छा। कुछ में खराब। नाहरखेड़ी, चोरल और बाईगांव में अच्छे काम हुए।
बाकी में कहीं भोजन 20 बच्चों का बनता है जबकि कक्षा में बैठ 30 बच्चे रहे हैं। बाद में 20 के भोजन को 30 बच्चों में बांट दिया जाता है। इससे बच्चों को पर्याप्त मात्रा में पोषण नहीं मिल पाता। बीच में ऐसी विसंगतियां शिकायत के रूप में इंदौर कलेक्टर के सामने आई थी। कुछ केंद्रों पर लगाम कसी भी गई। हालांकि सख्ती थोड़े दिन का ही सुकुन दे पाई।
बड़ी दिक्कत है पलायन...
क्षेत्र के बाशिंदों की मानें तो भील बाहुल्य क्षेत्रों में कुपोषण पर काबू पाने की राह का सबसे बड़ा रोड़ा लोगों का काम की तलाश में पलायन है। बच्चों के पेट या आहार की चिंता किए बिना यहां के लोग नौकरी की तलाश में इंदौर चले जाते हैं। वहां महीनों तक काम करने के बाद लौट आते हैं। पलायन अवधि में बच्चों को न तो पालकों की ओर से न नियमित रूप से सही आहार मिल पाता है न ही सरकार की ओर से। ऐसे में यह भी देखने में आया है कि पलायन के बाद जब लोग गांव लौटते हैं तो उनमें से कई के बच्चे कुपोषित हो जाते हैं।
न स्टाफ न संसाधन..
मानपुर परिक्षेत्र से लगे गांवों में स्वास्थ्य सेवाओं की स्थिति गड़बड़ है। यहां स्वास्थ्य सेवाओं के लिए न तो पर्याप्त ग्रांट मिल पाती है न ही स्टाफ। ग्रांट और स्टाफ की कमी के कारण यहां कई आंगनबाडिय़ां सिर्फ सरकारी औपचारिकता बनकर ही रह गई हैं। जब आंगनबाड़ी ही पोषित नहीं है तो बच्चों को पोषण कैसे मिले?
पहुंच से दूर व्यवस्था...
बडग़ौंदा और चोरल के पास पहाड़ी से लगे कई ऐसे गांव है जहां बरसात के चार महीनों में पहुंच मुश्किल हो जाती है। इनमें पीपल्या, डमाली, कुशलगढ़, रामपलाश घाट प्रमुख रूप से शामिल है। एक बार की बरसात के बाद यहां आना-जाना बंद सा हो जाता है। आंगनबाडिय़ों तक पोषण आहार तक नहीं पहुंच पाता। चोरल के राजपुरा, रेखा, कमाटपुरा की हालत भी यही थी लेकिन अब यहां रोड बनने से बदलाव साफ नजर आता है।
भील-आदिवासी मेंज्यादा
जैसे शिवपुर व अन्य शहरिया जाति में कुपोषण ज्यादा पाया जाता है। वैसे ही महू में भील जाति के बच्चे ज्यादा कुपोषित हैं। इसका अंदाजा महिला एवं बाल विकास विभाग द्वारा कराए सर्वे में सामने आए आंकड़ों से भी लगाया जा सकता है। सर्वे के मुताबिक महू में जितने बच्चों में कुपोषण सामने आया उनमें से 60 फीसदी भील जाति से ताल्लुक रखते हैं।
आर्थिक और शैक्षणिक पहलु भी जिम्मेदार
भील बाहुल्य इलाके आर्थिक और शैक्षणिक दोनों पहलुओं से पिछड़े नजर आते हैं। यहां लोगों के पास अपने बच्चों को पर्याप्त मात्रा में पोषण आहार उपलब्ध कराने के लिए न तो पर्याप्त पैसा है न उतना ज्ञान की वे कैलोरी जैसे कुपोषण के व्याकरण को समझ सके। यह भी देखने में आया है कि ज्यादातर लोग कुपोषण को सुखामेली बोलते हैं। यदि उनसे कोई जाकर कुपोषण की बात करता भी है तो वे सुखामेली और कुपोषण में अंतर नहीं कर पाते। ऐसे में 'क्या आपके घर में कोई कुपोषित बच्चा हैÓ जैसे सवाल के जवाब में ज्यादातर लोग मना कर देते हैं।
यह हो सकती है रणनीति...
- ऐसे गांव चिह्नित किए जाएं जहां आगनबाडिय़ों की स्थिति खराब है? इस बिंदु को लेकर यदि स्टोरी की जाए तो प्रशासन की नींद खुलेगी। ज्यादा न सही, थोड़ा-बहुत सुधार तो आएगा ही।
- ऐसी सामाजिक समूहों के नाम भी उजागर किए जा सकते हैं जो बच्चों को पर्याप्त पोषण आहार उपलब्ध नहीं करा रहे हैं?
- जिन गांवों में बरसात के दौरान पहुंच मुश्किल होती है वहां इस बात के विकल्प पर जोर दिया जाना जरूरी है कि वहां बरसात से पहले ही पोषण आहार पर्याप््त मात्रा में पहुंच सके।
- ऐसे अभियान भी चलाए जा सकते हैं जिनसे प्रेरित होकर प्रशासन इन गांवों में कुपोषण के प्रति जनजागृति लाए।
- पलायन से लौटे बच्चों को ज्यादा खुराक मिले। या वे जिस जगह जाकर रहते हैं उनके आसपास ही आंगनबाड़ी केंद्रों पर उन्हें पोषण मिल जाए।



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