Monday, June 29, 2015

कचरे में 'घोटालेÓ की खाद

9.72 करोड़ की खाद बनाने के बाद भी नहीं दी निगम को जानकारी
2.16 लाख बोरी का हिसाब नहीं दे रही ए-टू-जेड
नगर निगम ने दिया नोटिस, कंपनी बोली ट्रायल पर चल रहा था उत्पादन
इंदौर. विनोद शर्मा ।
कचरे के नाम पर मिट्टी तोलकर लाखों रुपए कमाने का खुलासा होने और नगर निगम द्वारा चेताए जाने के बाद भी ए-टू-जेड आदत से बाज नहीं आई। इसका बड़ा उदाहरण ट्रेंचिंग ग्राउंड पर बना वह प्रोसेसिंग प्लांट है जिसमें कचरे से खाद यूं तो सितंबर से बनाई जा रही है लेकिन निगम को जानकारी दी गई 20 दिसंबर को। वह भी अपर आयुक्त की फटकार के बाद। चोरीछिपे चार महीनों तक चांदी काटने के बाद निगम के नोटिस के जवाब में कंपनी ने कहा अब तक टेस्टिंग हो रही थी...। व्यावसायिक उत्पादन अब शुरू हुआ...।  आंकड़ों के लिहाज से बात करें तो चार महीनों में कंपनी ने 72 हजार टन कचरा प्रोसेस करके 9.72 करोड़ की खाद और प्लास्टिक कार्डिएक बनाई जिसका हिसाब कंपनी देने को तैयार नहीं। इसमें 6.48 करोड़ की खाद है जबकि 3.24 करोड़ के प्लास्टिक पार्ट।
जेएनएनयूआरएम के तहत स्वीकृत 58.64 करोड़ की कचरा प्रबंधन योजना के तहत नगर निगम ने पीपीपी के तहत ट्रेंचिंग ग्राउंड पर प्रोसेसिंग प्लांट(जहां कचरे से खाद बनाई जाती है) बनाने की मंजूरी ए-टू-जेड को दी थी। प्लांट यूं तो मई 2011 में बनकर तैयार हो चुका था। हालांकि उत्पादन शुरू हुआ सितंबर महीने में। बड़ी बात यह है कि खाद का उत्पादन शुरू हो चुका है इसकी जानकारी नगर निगम को कंपनी ने नहीं दी। खुलासा उस वक्त हुआ जब बीते दिनों यकायक निगम के आला अधिकारी प्लांट पहुंच गए। खुलासे के बाद निगम ने कंपनी को कारण बताओ नोटिस थमा दिया। बीते सप्ताह कंपनी ने नोटिस के जवाब में कहा कि उत्पादन सितंबर में नहीं, 25 नवंबर के बाद शुरू किया था। वह भी बतौर टेस्टिंग। व्यावसायिक उत्पादन 20 दिसंबर के बाद शुरू हुआ है।
जोर का झटका धीरे से....
-- आंकड़ों के लिहाज से बात करें तो इंदौर से हर दिन 600 मेट्रिक टन कचरा टे्रंचिंग ग्राउंड पहुंचता है। अनुबंध में निगम ने 80 प्रतिशत कचरे के उपयोग की बात की थी तब कंपनी ने दावे के साथ कहा था कि 90 फीसदी कचरा उपयोग होगा। 10 प्रतिशत ही लैंडफील में जाएगा।
-- 600 टन कचरा प्रोसेस करने के बाद कायदे से 20 प्रतिशत 120 टन खाद रोज बनती है। 15 प्रतिशत प्लांट की न्यूंनतम क्षमता है जबकि कंपनी कहती है 7 प्रतिशत के हिसाब से सिर्फ 40 टन ही बन रही है।
-- खाद बनाने के लिए कंपनी जो 600 टन कचरा रोज लेगी उसके बदले उसे 21 रुपए/टन के हिसाब से निगम को चुकाना होंगे।
-- सितंबर से दिसंबर के बीच 120 दिनों में कंपनी ने 72,000 टन कचरा उठाया। प्रोसेसिंग शुरू कर दी। इसकी जानकारी न देकर कंपनी ने 21 रुपए/टन के हिसाब से 15.12 लाख रुपए बचाए जबकि इसी 72,000 टन कचरे को शहर से उठाने के लिए 270 रुपए/टन के हिसाब से कंपनी ने निगम को 1.94 करोड़ के बिल थमा दिए।
'ए-टू-जेडÓ खिलाड़ी
--- यदि कंपनी के कहे अनुसार यह मान भी लें कि अब तक ट्रायल पीरियड पर खाद बनी। इस पीरियड के दौरान 72 हजार टन कचरे का निस्तारण करके कंपनी ने न्यूतनम क्षमता के हिसाब से 10,800 टन खाद भी बनाई तो 50 किलो के हिसाब से कुल 2.16 लाख बोरी खाद बनी। एक बोरी की कीमत 300 रुपए है। यानी कुल कीमत हुई 6.48 लाख रुपए।
--- यदि यह मान भी लें कि कंपनी ने 20 नवंबर के बाद 20 दिसंबर के बीच ट्रायल पीरियड पर खाद बनाई। बेची भी नहीं। परिसर में 150 से 200 बोरी खाद है। तो सवाल यह उठता है कि बाकी 53,500 से अधिक खाद की बोरियां गई कहां? वह भी उस स्थिति में जब उत्पादन चार महीनों से जारी था। स्पष्ट है कि खाद की 2.16 लाख बोरियां ऐसी हैं जिनका कंपनी निगम को हिसाब नहीं देना चाहती जिनकी कीमत 6.48 करोड़ रुपए है।
--- सूत्रों की मानें तो 600 टन कचरे को प्रोसेस करके कंपनी 15 प्रतिशत खाद बनाती है जबकि 15 प्रतिशत के प्लास्टिक पदार्थ। बाजार में यह प्लास्टिक पदार्थ 3 रुपए/किलो यानी 3000 रुपए/टन के हिसाब से बिकते हैं। कुल 10,800 टन प्लास्टिक पदार्थों की कीमत 3.24 करोड़ रुपए बैठती है।
....ब्रांड....
-- गोदावरी
-- कृभको
-- ए-टू-जेड
50 किलोग्राम की एक खाद बोरी की कीमत औसत 300 रुपए है।
उत्पादन......
गर्मी में : 25 से 30 प्रतिशत तक
बरसात : 15 प्रतिशत
सर्दी में : 15 से 25 प्रतिशत
निगम को क्या नुकसान.....
-- खाद बनाने के लिए इस्तेमाल होने वाले कुल कचरे से 15.12 लाख रुपए मिलना थे जो नहीं मिले।
-- जितना खाद बनेगा उसकी मात्रा को क्लैम करके नगर निगम कार्बन क्रेडिट के लिए अप्लाय करेगी। जो कार्बन क्रेडिट मिलेगा उसका 50 प्रतिशत कंपनी को जाएगा। 50 फीसदी निगम को।
-- वैसे भी प्रोसेसिंग प्लांट में कंपनी को जमीन देकर निगम बराबर का भागीदार है। इसीलिए कंपनी कितना उत्पादन कर रही है और कितना माल बेच रही है इसकी जानकारी भागीदार को देना ही होगी।
एक्सपर्ट व्यू....
जानकार कहते हैं कि कंपनी ने सबसे एडवांस मशीने लगाई हैं। बावजूद इसके कंपनी यदि कहती है कि वह सिर्फ 7 प्रतिशत या 15 प्रतिशत ही खाद बना पा रही है तो यह बात हजम नहीं होती क्योंकि खाद 25 प्रतिशत तक बनना चाहिए। इसके दो ही अर्थ हो सकते हैं। एक तो यह कि कंपनी की मशीनें उतनी क्षमतावान नहीं है जितनी का अनुबंध में उल्लेख किया गया था। या मशीनें तो क्षमतावान है लेकिन कंपनी क्षमता के हिसाब से काम नहीं कर पा रही है। शायद इसीलिए ट्रेंचिंग ग्राउंड पर आज भी कचरा जलता नजर आता है। न ही कंपनी ने निगम को कभी यह बताया कि ट्रायल पीरियड कितना है।
ट्रायल पीरियड अभी भी जारी...
कंपनी के अधिकारी कहते हैं प्लांट में मशीनों की सेटिंग अब तक जारी है। कचरे से 15 प्रतिशत तक खाद बनता है लेकिन जिस क्वालिटी का कचरा चाहिए वह इंदौर में मिल नहीं पा रहा है। दूसरे शहरों में 70 प्रतिशत कंपोज्ड वेस्ट होता है जबकि 30 प्रतिशत दूसरी तरह का कचरा। यहां 50 फीसदी कचरा ऐसा है जिसेे कंपोज नहीं किया जा सकता। यानी दूसरे शहरों में 20 प्रतिशत ज्यादा। एक दिक्कत यह भी रही कि बरसात में ट्रायल शुरू कर दिया था उस दौरान मशीन में कुछ खराबी भी आई। इसी वजह से जो खाद बनी उसकी गुणवत्ता मानकों के अनुसार नहीं रही। जब तक मानक स्तर की खाद नहीं बन जाती खरीदेगा कौन?

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