बल, नीति, सामर्थ और स्वत संपन्न हो समाज
इंदौर. चीफ रिपोर्टर ।
देश में जारी सामाजिक बिखराव को एकता के सूत्र में बांधना जरूरी है। नेता, नारा, पार्टी, सरकार, अवतार, की प्राथना करने से काम नहीं होगा। संघ को भी ठेका मत दो उद्धार का। संघ अपना नाम बढ़ाने के लिए नहीं है। संपूर्ण समाज को संगठित करने के लिए है संघ। क्योंकि समाज ही देश का भाग्य विधाता है। अपने देश के समाज को न सिर्फ एकता का सूत्र खोजना होगा बल्कि उस पर कायम भी रहना होगा। समाज को व्यंगहीन, दोष हीन बनाना पड़ेगा। एक बल संपन्न, नीति संपन्न, सामर्थय संपन्न, स्वत्व संपन्न होकर वैभव संपन्न होते हुए दुनिया के सामने खड़ा होना पड़ेगा। रविवार को संघ एकत्रीकरण के दौरान स्वयं सेवकों को बौद्धिक देते हुए यह बात राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के प्रमुख मोहन भागवत ने कही। रविवार को सुपर कॉरीडोर पर संपन्न हुए एकत्रीकरण में 1.40 लाख से अधिक स्वयं सेवकों ने शामिल होकर एकत्रीकरण की सफलता के पीछले तमाम रिकार्ड भी तोड़ दिए। गौरतलब है कि इससे पहले बेंगलोर में संपन्न हुए एकत्रीकरण में 90 हजार स्वयं सेवक शामिल हुए थे।
सुपर कॉरीडोर स्थित विवेकानंदपुरम में भागवत बोले संघ को ऊपर से देखने से काम नहीं चलेगे। गहरे पानी बैठना पड़ेगा। अन्यथा संघ कहेगा कि यह स्वयं सेवकों का एकत्रीकरण है और लोग कहेंगे कि शक्ति प्रदर्शन है। भीड़भाड़ देखकर कुछ इसे राजनीतिक दल कहेंगे तो कुछ व्यायाम देखकर अखिल भारतीय व्यायामशाला कहेंगे। संघ लाठी-काठी सीखाने के लिए नहीं हैं। कुछ इसे अखिल भारतीय संगीत शाला मान बैठेंगे, जहां सबसे गीत गवाया जाता है। संघ में गीत है, गीत के लिए संघ नहीं है। सब वर्तमान में बदलाव चाहते हैं। चाहे भी क्यों न देश और दुनिया की परिस्थिति ही कुछ ऐसी है। यह समस्याएं सिर्फ दिखाई नहीं देती, उनसे अपना जीवन भी कठिन हो जाता है। देश के बारे में विचार न करने वाले भी परिस्थिति की मार पढऩे पर वर्तमान का परिवेष बदलना चाहते हैं। सरकार के भरौसे कुछ नहीं होगा। हम बदलाव चाहने वालों को ही आगे आना होगा। जब तक भक्त तैयार नहीं होते तब तक उनके उद्धार के लिए भगवान भी नहीं आते। जिस सीता का हरण रावण ने किया था वह राम की पत्नी थी लेकिन लडऩा सबको पड़ा। क्योंकि यह एक पत्नी के अपहरण का मामला नहीं था। देश में संस्कृति रहेगी या दानवता? इसका सवाल था। जो अपने या अपनों के लिए प्रयास नहीं करते उनके लिए भगवान नहीं आते। जब भगवान नहीं आते तो हम सरकार को याद करते हैं। सरकार नहीं आती तो हम गाली देते हैं। आजादी के बाद से ही यही सिलसिला जारी है। दिनबदिन इस खेल का रंग बदल रहा है। सामान्य आदमी अपने सेवक के रूप में सरकार चुने और ध्यान रखें कहीं कोई गड़बड़ तो नहीं हो रही है। हमने ध्यान नहीं रखा, इसीलिए आज गड़बड़ हुई।
आज परिस्थिति डरावनी है। देश की सीमा असुरक्षित है। अरक्षित है। सक्षिद्र है। अपना देश शत्रुता करता नहीं लेकिन अपने देश से शत्रुता रखने वालों ने अपने देश के चारो ओर जाल बिछाने का प्रयास किया है। तस्करी हो रही है। घुसपैठिए घुसे आ रहे हैं। स्वार्थ की राजनीति के चलते इसका बंदोबस्त तो दूर रहा, कभी-कभी इनकी सुरक्षा में ही अपने देश के लोग खड़े नजर आते हैं। आज मनुष्य का जीवन भी कठिन हो गया। हर चीज के दाम आसमान पर हैं। नए रोजगार मुश्किल में हैं। रिटेल में एफडीआई से लाखों रोजगार अलग संकट में है। देश में समस्याएं इतनी है कि उन्हें बताने के लिए ही दो दिन चाहिए। समस्याओं की चर्चा से कुछ नहीं होगा, चर्चा उपाय की होना चाहिए। समस्याएं पुरानी है लेकिन उनका हल एक ही है, एकता। अलग-अलग विचाराधाराओं और कार्यक्षेत्र से जुड़े लोगों ने भी यही हल सोचा।
एकता राजनीति से नहीं आएगी। समाज के विकार को निकालकर उन्हें संगठित बनाना होगा। इसके लिए विवेकानंद और रवींद्रनाथ टैगोर जैसे नायकों की जरूरत है जिन पर समाज विश्वास कर सके। बिना नायकों के बदलाव नहीं आएगा। जिन विवेकानंद की 150वीं जयंति मनाई जाना है उन्होंने तीन मंत्र दिए थे। प्रामाणिक रहो। निर्भय बनो। अपने स्व गौरव पर पक्के रहो। इन्हीं सूत्रों के दम पर आजादी मिली। लोगों में देशात्म बोध 'पूरा देश मेरा हैÓ, की भावना जरूरी। बिना देश में भला काम नहीं होगा। यह लंबा रास्ता है। यदि रास्ता यही है तो यही सबसे छोड़ा रास्ता है।
हमने शक्ति की उपासना छोड़ दी। इसीलिए हम परतंत्र हुए। शक्ति सेना, पुलिस, या हथियारों की नहीं होती यह लोक शक्ति की होती है। इसके लिए प्राचीन संस्कृति के संस्कारों को पुनर्जीवित करना है। जिन लोगों ने यह सूत्र दिए हैं वे संघ के नहीं थे। कुछ संघ की स्थापना के पहले के थे तो कुछ बाद के।
हिंदुत्व के आधार पर संपूर्ण समाज को जोडऩा। संर्पूण समाज में जो जानते हैं, मानते हैं कि हम हिंदु हैं उनको हम संगठित करेंगे। उनका एक बल संपन्न, वैभव संपन्न, नीति संपन्न संगठन खड़ा करेंगे। जानते हैं लेकिन स्वार्थ के कारण मानते नहीं हैं, ऐसे हिंदु आज अपने देश में है। वह मानने लगेंगे। उनको लगता है हिंदु कहने से अपना स्वार्थ मार खाएगा। अपना नाम खराब होगा। हिंदु बल संपन्न है, नीति संपन्न है, बैभव संपन्न है। जो भूल गए हैं या याद नहीं करना चाहते, उन्हें भी तभी याद आएगा जब इस सत्य के पीछे संगठित हिंदु समाज की शक्ति खड़ी होगी।
सबका निष्कर्ष लेकर संघ चला है। किसी का विरोध संघ नहीं करता। संघ शक्ति के बढऩे का विरोध करने वाले भी मानते हैं कि संघ अच्छा है। आजादी के बाद 65 साल के अनुभव लोग जिस निष्कर्ष तक पहुंचे हैं वह है समाज में एकता स्थापित करना। उनको बल संपन्न, शील संपन्न बनाना। अपने भविष्य का स्वयं मालिक उनको बनाना। यह किए बिना देश का उद्धार नहीं होगा। नेता, नारा, पार्टी, सरकार, अवतार, की प्राथना करने से काम नहीं होगा। जैसा समाज होगा, यह भी वैसे ही होंगे। उस समाज के संगठन को साधने वाला कोई नहीं है। सबने अपना-अपना काम चुन लिया है। किसी के पास वक्त नहीं है। जिसके पास वक्त है उसे जानकारी नहीं है कैसे करना है। इसके उपाय की तलाशना के रूप में ही 1925 में संघ की स्थापना हुई। 1.30 लाख से ऊपर सेवाकार्य। संपूर्ण जनता को एक दृष्टि से देखते हुए बिना किसी भेदभाव के। अपनी चमड़ी घीसकर, अपनी दमड़ी खर्चाकर संघ के स्वयं सेवक सारे देश में चला रहे हैं। सरकार की मदद नहीं लेते। समाज का काम है, समाज से मांगते हैं, समाज देता है। पैसे के रूकते नहीं। धन पीछे-पीछे आता है। राष्ट्र जीवन के हर क्षेत्र में स्वयं सेवक है। वहां उन्होंन हर समाज के विश्वास और स्नेह के पात्र ऐसे काम खड़े किए जो उस क्षेत्र के अग्रणी काम बन गए है। आरएसएस की शाखा में मनुष्य के बल की, शील की, ज्ञान की जो निर्मिति होती है, उसके मन में धेय, निष्ठा, श्रृद्धा भक्ति देश, समाज के प्रति जो भरी जाती है उसका परिणाम है।
तो आज की दर-दर भटकती, अपनी समस्या के उत्तर मांगती दुनिया 'जो भारत से अपेक्षा करती हैÓ, उस अपेक्षा को पूरी करने वाला समाज दुनिया को मिलेगा। जिसे विश्वगुरु कहा जाता है। संघ का काम इसके लिए चलता है। कोई अलग दल, अलग गुट नहीं है। इसीलिए संघ के काम को अपना समझकर उसके सहयोगी कार्यकर्ता बनना यह आवश्यक है। यह किसी के विरोध में नहीं है। किसी के लिए इसके मन में प्रतिक्रिया नहीं है। यह अपने समाज, अपने देश, अपने धर्म के लिए है जो दु़निया की भलाई के लिए काम करते हैं। अपने स्वयं का विकास, अपने देश की उन्नति, दुनिया के जीवन की उन्नती विकास, एक पंथ में तीन-तीन काज साधने वाले इस पवित्र काम के सहयोगी कार्यकर्ता बनने का आह्वान में आपसे करता हूं। इसमें जाकर स्वयं योग्य बनना। रोज एक घंटे का काम है। अपनी कमाई में से एक तिहाई हिस्सा जहां आपको अच्छा लगे लगाना। असली मनुष्य बनने के लिए आरएसएस का स्वयं सेवक बनने का आह्वान करता हूं।
तीन महापुरुष, तीन सूत्र, मकसद एक.. एकता
विवेकानंद : जो व्यक्ति स्व.गौरव को नहीं मानता उसकी उन्नति नहीं होती। यह व्यक्ति, समाज, देश सब पर लागू। भारत के पास समाज को देने के लिए बहुत कुछ है।
बाबा साहेब अंबेडकर : हमने आपसी झगड़ों की वजह से देश को बेच दिया। अब स्वतंत्र देश के लिए संविधान बना है। पुराने झगड़ों की पुनरावृत्ति नहीं होना चाहिए। संपूर्ण समाज में भाईचारा विकसित हो। नहीं तो समाज विघटित हो जाता है।
डॉ. अब्दुल कलाम : हमने शक्ति की उपासना छोड़ दी इसलिए हम गुलाम बने। शक्ति पुलिस, सेना या हथियारों की नहीं बल्कि समाज को एक-दूसर से जोडऩे वाली लोक शक्ति रही। प्राचीन संस्कृति के संस्कारों के पुर्नजीवन की आवश्यकता है।
मूल मंत्र...
समर्थ बनों, निर्बलों की रक्षा करो, धन कमाओं और गरीबों की मदद करों। यही मान्यताओं को जोड़ती है और इसीलिए भारत जगत जननीश् है।
देश में गाली.गलौज का माहौल। हम सरकार को गाली देते हैंए खुद प्रयास नहीं करते।
हम सेवक चुनें और उनका ध्यान भी रखें। यह हमारी जिम्मेदारी है।
कुछ ऐसा रहा एकत्रीकरण
-- कार्यक्रम में 1 लाख 12 हजार से ज्यादा लोग उपस्थित।
-- भागवत ने कहा, मालवा प्रांत का बड़ा कार्यक्रम।
-- 1.55 बजे पहुंचे संघ प्रमुख।
-- 50 मिनट दिया बौद्धिक।
-- 3.30 बजे संपन्न हुआ बौद्धिक।
-- स्वयंसेवकों ने किया डेढ़ मिनट का व्यायाम।
-- मंच पर थे परमानंद स्वामी, भय्यू महाराज, लक्ष्मणदास महाराज, राधे-राधे बाबा, रामचंद्र शर्मा वैदिक, बाबा फरीद, कालूराम पंडा, तिलकदास महाराज, शिवानंदजी, स्वामी विनोदजी नागर, साधवी वर्षा नागर, रामस्वरूप महाराज, दिग्विजयदासजी, अभयदान गुरुजी, श्रीकृष्ण महाराज सहित तकरीबन 150 संत और फकीर।
-- उद्योगमंत्री कैलाश विजयवर्गीय, विधायक रमेश मेंदोला, जीतू जिराती के साथ पार्षद सुधीर देडग़े, अजयसिंह नरूका, वरिष्ठ भाजपा नेता गोपीकृष्ण नेमा भी दिखे गणवेश में।
-- सांसद सुमित्रा महाजन, विधायक मालिनी गौड़, मंत्री रंजना बघेल, पार्षद अर्चना चितले भी थे मौजूद।
-- उज्जैन, नीमच, मंदसौर, रतलाम, आलोट, जावरा, देवास, शाजापुर, इंदौर, खंडवा, खरगोन, धार के कार्यकर्ता शामिल।
-- संघ ने गीता, गंगा, गौमाता, हिन्दू धर्मस्थल की रक्षा, हिंदुओं का मानसम्मान, छुआछूत जैसे सूत्र वाक्य दशा और दिशा के लिए तय किए।
-- 1 लाख स्वयंसेवक, 50 हजार दर्शक, 11 एलईडी स्क्रीन, 125 स्पीकर।
-- 2200 बसें, 5500 कारें, 15000 दोपहिया थे।
-- हर प्रवेश मार्ग पर तैनात थी एंबुलेंस व क्रेन।
-- डेढ़ लाख भोजन के पैकेट बंटे।
-- जिलावार ब्लॉक बनाकर अलग रंग की झंडियों से पहचान दी गई।
-- 2009 में इंदौर में नेहरू स्टेडियम में यह आयोजन हुआ था।
-- कड़ी सुरक्षा व्यवस्था के बीच सुबह 9 बजे से शुरू हुआ स्वयंसेवकों का आना।
इंदौर. चीफ रिपोर्टर ।
देश में जारी सामाजिक बिखराव को एकता के सूत्र में बांधना जरूरी है। नेता, नारा, पार्टी, सरकार, अवतार, की प्राथना करने से काम नहीं होगा। संघ को भी ठेका मत दो उद्धार का। संघ अपना नाम बढ़ाने के लिए नहीं है। संपूर्ण समाज को संगठित करने के लिए है संघ। क्योंकि समाज ही देश का भाग्य विधाता है। अपने देश के समाज को न सिर्फ एकता का सूत्र खोजना होगा बल्कि उस पर कायम भी रहना होगा। समाज को व्यंगहीन, दोष हीन बनाना पड़ेगा। एक बल संपन्न, नीति संपन्न, सामर्थय संपन्न, स्वत्व संपन्न होकर वैभव संपन्न होते हुए दुनिया के सामने खड़ा होना पड़ेगा। रविवार को संघ एकत्रीकरण के दौरान स्वयं सेवकों को बौद्धिक देते हुए यह बात राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के प्रमुख मोहन भागवत ने कही। रविवार को सुपर कॉरीडोर पर संपन्न हुए एकत्रीकरण में 1.40 लाख से अधिक स्वयं सेवकों ने शामिल होकर एकत्रीकरण की सफलता के पीछले तमाम रिकार्ड भी तोड़ दिए। गौरतलब है कि इससे पहले बेंगलोर में संपन्न हुए एकत्रीकरण में 90 हजार स्वयं सेवक शामिल हुए थे।
सुपर कॉरीडोर स्थित विवेकानंदपुरम में भागवत बोले संघ को ऊपर से देखने से काम नहीं चलेगे। गहरे पानी बैठना पड़ेगा। अन्यथा संघ कहेगा कि यह स्वयं सेवकों का एकत्रीकरण है और लोग कहेंगे कि शक्ति प्रदर्शन है। भीड़भाड़ देखकर कुछ इसे राजनीतिक दल कहेंगे तो कुछ व्यायाम देखकर अखिल भारतीय व्यायामशाला कहेंगे। संघ लाठी-काठी सीखाने के लिए नहीं हैं। कुछ इसे अखिल भारतीय संगीत शाला मान बैठेंगे, जहां सबसे गीत गवाया जाता है। संघ में गीत है, गीत के लिए संघ नहीं है। सब वर्तमान में बदलाव चाहते हैं। चाहे भी क्यों न देश और दुनिया की परिस्थिति ही कुछ ऐसी है। यह समस्याएं सिर्फ दिखाई नहीं देती, उनसे अपना जीवन भी कठिन हो जाता है। देश के बारे में विचार न करने वाले भी परिस्थिति की मार पढऩे पर वर्तमान का परिवेष बदलना चाहते हैं। सरकार के भरौसे कुछ नहीं होगा। हम बदलाव चाहने वालों को ही आगे आना होगा। जब तक भक्त तैयार नहीं होते तब तक उनके उद्धार के लिए भगवान भी नहीं आते। जिस सीता का हरण रावण ने किया था वह राम की पत्नी थी लेकिन लडऩा सबको पड़ा। क्योंकि यह एक पत्नी के अपहरण का मामला नहीं था। देश में संस्कृति रहेगी या दानवता? इसका सवाल था। जो अपने या अपनों के लिए प्रयास नहीं करते उनके लिए भगवान नहीं आते। जब भगवान नहीं आते तो हम सरकार को याद करते हैं। सरकार नहीं आती तो हम गाली देते हैं। आजादी के बाद से ही यही सिलसिला जारी है। दिनबदिन इस खेल का रंग बदल रहा है। सामान्य आदमी अपने सेवक के रूप में सरकार चुने और ध्यान रखें कहीं कोई गड़बड़ तो नहीं हो रही है। हमने ध्यान नहीं रखा, इसीलिए आज गड़बड़ हुई।
आज परिस्थिति डरावनी है। देश की सीमा असुरक्षित है। अरक्षित है। सक्षिद्र है। अपना देश शत्रुता करता नहीं लेकिन अपने देश से शत्रुता रखने वालों ने अपने देश के चारो ओर जाल बिछाने का प्रयास किया है। तस्करी हो रही है। घुसपैठिए घुसे आ रहे हैं। स्वार्थ की राजनीति के चलते इसका बंदोबस्त तो दूर रहा, कभी-कभी इनकी सुरक्षा में ही अपने देश के लोग खड़े नजर आते हैं। आज मनुष्य का जीवन भी कठिन हो गया। हर चीज के दाम आसमान पर हैं। नए रोजगार मुश्किल में हैं। रिटेल में एफडीआई से लाखों रोजगार अलग संकट में है। देश में समस्याएं इतनी है कि उन्हें बताने के लिए ही दो दिन चाहिए। समस्याओं की चर्चा से कुछ नहीं होगा, चर्चा उपाय की होना चाहिए। समस्याएं पुरानी है लेकिन उनका हल एक ही है, एकता। अलग-अलग विचाराधाराओं और कार्यक्षेत्र से जुड़े लोगों ने भी यही हल सोचा।
एकता राजनीति से नहीं आएगी। समाज के विकार को निकालकर उन्हें संगठित बनाना होगा। इसके लिए विवेकानंद और रवींद्रनाथ टैगोर जैसे नायकों की जरूरत है जिन पर समाज विश्वास कर सके। बिना नायकों के बदलाव नहीं आएगा। जिन विवेकानंद की 150वीं जयंति मनाई जाना है उन्होंने तीन मंत्र दिए थे। प्रामाणिक रहो। निर्भय बनो। अपने स्व गौरव पर पक्के रहो। इन्हीं सूत्रों के दम पर आजादी मिली। लोगों में देशात्म बोध 'पूरा देश मेरा हैÓ, की भावना जरूरी। बिना देश में भला काम नहीं होगा। यह लंबा रास्ता है। यदि रास्ता यही है तो यही सबसे छोड़ा रास्ता है।
हमने शक्ति की उपासना छोड़ दी। इसीलिए हम परतंत्र हुए। शक्ति सेना, पुलिस, या हथियारों की नहीं होती यह लोक शक्ति की होती है। इसके लिए प्राचीन संस्कृति के संस्कारों को पुनर्जीवित करना है। जिन लोगों ने यह सूत्र दिए हैं वे संघ के नहीं थे। कुछ संघ की स्थापना के पहले के थे तो कुछ बाद के।
हिंदुत्व के आधार पर संपूर्ण समाज को जोडऩा। संर्पूण समाज में जो जानते हैं, मानते हैं कि हम हिंदु हैं उनको हम संगठित करेंगे। उनका एक बल संपन्न, वैभव संपन्न, नीति संपन्न संगठन खड़ा करेंगे। जानते हैं लेकिन स्वार्थ के कारण मानते नहीं हैं, ऐसे हिंदु आज अपने देश में है। वह मानने लगेंगे। उनको लगता है हिंदु कहने से अपना स्वार्थ मार खाएगा। अपना नाम खराब होगा। हिंदु बल संपन्न है, नीति संपन्न है, बैभव संपन्न है। जो भूल गए हैं या याद नहीं करना चाहते, उन्हें भी तभी याद आएगा जब इस सत्य के पीछे संगठित हिंदु समाज की शक्ति खड़ी होगी।
सबका निष्कर्ष लेकर संघ चला है। किसी का विरोध संघ नहीं करता। संघ शक्ति के बढऩे का विरोध करने वाले भी मानते हैं कि संघ अच्छा है। आजादी के बाद 65 साल के अनुभव लोग जिस निष्कर्ष तक पहुंचे हैं वह है समाज में एकता स्थापित करना। उनको बल संपन्न, शील संपन्न बनाना। अपने भविष्य का स्वयं मालिक उनको बनाना। यह किए बिना देश का उद्धार नहीं होगा। नेता, नारा, पार्टी, सरकार, अवतार, की प्राथना करने से काम नहीं होगा। जैसा समाज होगा, यह भी वैसे ही होंगे। उस समाज के संगठन को साधने वाला कोई नहीं है। सबने अपना-अपना काम चुन लिया है। किसी के पास वक्त नहीं है। जिसके पास वक्त है उसे जानकारी नहीं है कैसे करना है। इसके उपाय की तलाशना के रूप में ही 1925 में संघ की स्थापना हुई। 1.30 लाख से ऊपर सेवाकार्य। संपूर्ण जनता को एक दृष्टि से देखते हुए बिना किसी भेदभाव के। अपनी चमड़ी घीसकर, अपनी दमड़ी खर्चाकर संघ के स्वयं सेवक सारे देश में चला रहे हैं। सरकार की मदद नहीं लेते। समाज का काम है, समाज से मांगते हैं, समाज देता है। पैसे के रूकते नहीं। धन पीछे-पीछे आता है। राष्ट्र जीवन के हर क्षेत्र में स्वयं सेवक है। वहां उन्होंन हर समाज के विश्वास और स्नेह के पात्र ऐसे काम खड़े किए जो उस क्षेत्र के अग्रणी काम बन गए है। आरएसएस की शाखा में मनुष्य के बल की, शील की, ज्ञान की जो निर्मिति होती है, उसके मन में धेय, निष्ठा, श्रृद्धा भक्ति देश, समाज के प्रति जो भरी जाती है उसका परिणाम है।
तो आज की दर-दर भटकती, अपनी समस्या के उत्तर मांगती दुनिया 'जो भारत से अपेक्षा करती हैÓ, उस अपेक्षा को पूरी करने वाला समाज दुनिया को मिलेगा। जिसे विश्वगुरु कहा जाता है। संघ का काम इसके लिए चलता है। कोई अलग दल, अलग गुट नहीं है। इसीलिए संघ के काम को अपना समझकर उसके सहयोगी कार्यकर्ता बनना यह आवश्यक है। यह किसी के विरोध में नहीं है। किसी के लिए इसके मन में प्रतिक्रिया नहीं है। यह अपने समाज, अपने देश, अपने धर्म के लिए है जो दु़निया की भलाई के लिए काम करते हैं। अपने स्वयं का विकास, अपने देश की उन्नति, दुनिया के जीवन की उन्नती विकास, एक पंथ में तीन-तीन काज साधने वाले इस पवित्र काम के सहयोगी कार्यकर्ता बनने का आह्वान में आपसे करता हूं। इसमें जाकर स्वयं योग्य बनना। रोज एक घंटे का काम है। अपनी कमाई में से एक तिहाई हिस्सा जहां आपको अच्छा लगे लगाना। असली मनुष्य बनने के लिए आरएसएस का स्वयं सेवक बनने का आह्वान करता हूं।
तीन महापुरुष, तीन सूत्र, मकसद एक.. एकता
विवेकानंद : जो व्यक्ति स्व.गौरव को नहीं मानता उसकी उन्नति नहीं होती। यह व्यक्ति, समाज, देश सब पर लागू। भारत के पास समाज को देने के लिए बहुत कुछ है।
बाबा साहेब अंबेडकर : हमने आपसी झगड़ों की वजह से देश को बेच दिया। अब स्वतंत्र देश के लिए संविधान बना है। पुराने झगड़ों की पुनरावृत्ति नहीं होना चाहिए। संपूर्ण समाज में भाईचारा विकसित हो। नहीं तो समाज विघटित हो जाता है।
डॉ. अब्दुल कलाम : हमने शक्ति की उपासना छोड़ दी इसलिए हम गुलाम बने। शक्ति पुलिस, सेना या हथियारों की नहीं बल्कि समाज को एक-दूसर से जोडऩे वाली लोक शक्ति रही। प्राचीन संस्कृति के संस्कारों के पुर्नजीवन की आवश्यकता है।
मूल मंत्र...
समर्थ बनों, निर्बलों की रक्षा करो, धन कमाओं और गरीबों की मदद करों। यही मान्यताओं को जोड़ती है और इसीलिए भारत जगत जननीश् है।
देश में गाली.गलौज का माहौल। हम सरकार को गाली देते हैंए खुद प्रयास नहीं करते।
हम सेवक चुनें और उनका ध्यान भी रखें। यह हमारी जिम्मेदारी है।
कुछ ऐसा रहा एकत्रीकरण
-- कार्यक्रम में 1 लाख 12 हजार से ज्यादा लोग उपस्थित।
-- भागवत ने कहा, मालवा प्रांत का बड़ा कार्यक्रम।
-- 1.55 बजे पहुंचे संघ प्रमुख।
-- 50 मिनट दिया बौद्धिक।
-- 3.30 बजे संपन्न हुआ बौद्धिक।
-- स्वयंसेवकों ने किया डेढ़ मिनट का व्यायाम।
-- मंच पर थे परमानंद स्वामी, भय्यू महाराज, लक्ष्मणदास महाराज, राधे-राधे बाबा, रामचंद्र शर्मा वैदिक, बाबा फरीद, कालूराम पंडा, तिलकदास महाराज, शिवानंदजी, स्वामी विनोदजी नागर, साधवी वर्षा नागर, रामस्वरूप महाराज, दिग्विजयदासजी, अभयदान गुरुजी, श्रीकृष्ण महाराज सहित तकरीबन 150 संत और फकीर।
-- उद्योगमंत्री कैलाश विजयवर्गीय, विधायक रमेश मेंदोला, जीतू जिराती के साथ पार्षद सुधीर देडग़े, अजयसिंह नरूका, वरिष्ठ भाजपा नेता गोपीकृष्ण नेमा भी दिखे गणवेश में।
-- सांसद सुमित्रा महाजन, विधायक मालिनी गौड़, मंत्री रंजना बघेल, पार्षद अर्चना चितले भी थे मौजूद।
-- उज्जैन, नीमच, मंदसौर, रतलाम, आलोट, जावरा, देवास, शाजापुर, इंदौर, खंडवा, खरगोन, धार के कार्यकर्ता शामिल।
-- संघ ने गीता, गंगा, गौमाता, हिन्दू धर्मस्थल की रक्षा, हिंदुओं का मानसम्मान, छुआछूत जैसे सूत्र वाक्य दशा और दिशा के लिए तय किए।
-- 1 लाख स्वयंसेवक, 50 हजार दर्शक, 11 एलईडी स्क्रीन, 125 स्पीकर।
-- 2200 बसें, 5500 कारें, 15000 दोपहिया थे।
-- हर प्रवेश मार्ग पर तैनात थी एंबुलेंस व क्रेन।
-- डेढ़ लाख भोजन के पैकेट बंटे।
-- जिलावार ब्लॉक बनाकर अलग रंग की झंडियों से पहचान दी गई।
-- 2009 में इंदौर में नेहरू स्टेडियम में यह आयोजन हुआ था।
-- कड़ी सुरक्षा व्यवस्था के बीच सुबह 9 बजे से शुरू हुआ स्वयंसेवकों का आना।
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