Sunday, June 28, 2015

मजदूर के मर्ज पर मनमानी का मरहम ESIC SPECIAL

बीमा अस्पतालों में मरीजों के साथ धोखा
50 करोड़ की दवा खरीदी, जांची एक भी नहीं
इंदौर. विनोद शर्मा ।
जिन मजदूरों को मर्ज मुक्त जिंदगी देने के मकसद से बीमा अस्पतालों की नींव रखी गई थीं वहीं प्रबंधन की मनमानी आज मेहनतकशों के लिए जानलेवा साबित हो रही है। कंपनियों से करोड़ों की दवा तो खरीदी जा रही है लेकिन कमिशनखोरी के कारण यह देखना वाला कोई नहीं कि दवा कारगर है भी या नहीं। 2012-13 में जारी हुई स्वास्थ्य विभाग की रिपोर्ट भी इसकी पुष्टि करती है। रिपोर्ट की मानें तो 2006 से 2012 के बीच 45 करोड़ से ज्यादा की दवाइयां खरीदी लेकिन लैब टेस्ट में एक की भी गुणवत्ता नहीं परखी गई। वह भी उस स्थिति में जब पूरे मप्र में तीन लाख से ज्यादा बीमित और नौ लाख से ज्यादा उनके परिजनों के पास चिकित्सा के लिए बीमा अस्पताल के अलावा दूसरा विकल्प नहीं है।
रिपोर्ट के मुताबिक 1984 में लोक स्वास्थ्य तथा परिवार कल्याण विभाग द्वारा जारी चिकित्सा संस्थाओं हेतू औषधि अधिप्राप्त नीति के तहत औषधि-नियंत्रक के माध्यम से निरीक्षण और औषधि के हर बैच की गुणवत्ता की जांच अनिर्वाय की गई थी। कर्मचारी राज्य बीमा निगम, नई दिल्ली भी स्पष्ट कर चुका है कि आपूर्ति के समय किसी भी सरकारी या सरकार से अनुमोदित प्रयोगशालाओं से दवा की के कम से कम 10 प्रतिशत नमूनो की नियमित जांच होना चाहिए। इधर, जब संचालक, कर्मचारी राज्य बीमा के दस्तावेजों की जांच हुई तो पता चला कि 2006 से 2012 के बीच तकरीबन 50 करोड़ की दवा खरीदी गई। इन दवाओं की गुणवत्ता का कोई परीक्षण नहीं हुआ। इंदौर, भोपाल, ग्वालियर, उज्जैन स्थित बीमा अस्पतालों और टीबी अस्पताल, इंदौर के दस्तावेजों में नमूनों की जांच का कोई जिक्र जांच के दौरान नहीं मिला। नियमों के हिसाब से 5 करोड़ से ज्यादा की ऐसी दवा तो ऐसी ही निकलना थी जिसकी बतौर सेम्पल जांच कराई गई। रिपोर्ट कहती है कि बीमा अस्पतालों के लिए सालाना 8.25 से 9 करोड़ के बीच की दवा खरीदी जाती है। यदि इनमें 10 फीसदी नियमित के हिसाब से सालाना 80 से 90 लाख की दवा सेम्पल के रूप में प्रयोगशाला भेजी जाना चाहिए।
जून 2011 में दवा की जांच के संबंध में पूछने पर संचालक, कर्मचारी बीमा ने बताया था कि दवा की नियमित जांच होती है। जितने दस्तावेज जांचे गए वे संचालक के बयान की पुष्टि नहीं की। न संचालक बेच वाइज उन दवाओं के नाम बता सके जिनका लैब परीक्षण हुआ है। बाद में प्रभारी चिकित्सा अधीक्षक ने गलती स्वीकारते हुए कहा था कि भविष्य में गुणवत्ता की जांच कराएंगे।
जांच के नाम पर टाल-मटौल..
नंदानगर के अस्पताल को केंद्र सरकार ने लेकर मॉर्डन हॉस्पिटल बनाया था। इस अस्पताल पर मप्र सरकार का नियंत्रण नही रहा। इसीलिए यहां दवा खरीदी केंद्रीय नियमों के अनुसार होती है। यहां सालाना 4 करोड़ की छोटी-मोटी दवा खरीदी जाती है।
प्रबंधन कहता है नियमित जांच होती है लेकिन प्रयोगशाला का नाम पूछने पर जवाब मिला यहां खाद्य एवं औषधि प्रशासन के अधिकारी आते हैं। दवाई ले जाते हैं और जांच रिपोर्ट दे जाते हैं।
उधर, संचालनालय, कर्मचारी राज्य बीमा के अधिकारियों की मानें तो राज्य सरकार का काम सेवा (बिस्तर, बिल्डिंग,स्टाफ) मुहैया कराने का है। दवा उपलब्ध कराना केंद्र का काम है।
बीमा चिकित्सा की स्थिति मप्र में
मार्डन हॉस्टिल - 1 (इंदौर में)
सामान्य अस्पताल - 4
टीबी हॉस्पिटल - 1 (इंदौर में)
एनेक्सी वार्ड - 1
औषाधालय - 47 (इंदौर में 9)
मोबाइल यूनिट - 1
पेनल क्लीनिक - 3
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(जनवरी, 1955, में मध्य भारत क्षेत्र के चार मुख्य औद्योगिक केन्द्रों- इन्दौर, उज्जैन, ग्वालियर, तथा रतलाम-के लगभग 55,000 श्रमिकों के लिये प्रारंभ की गयी थी। आज प्रदेश के 20 जिलों में  20 केन्द्रों पर बीमित व्यक्तियों की संख्या 2,99,054 से ज्यादा है। वहीं नौ लाख से ज्यादा बीमित परिजन का ईलाज भी इन्हीं अस्पतालों में होता है।)

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