इंदौर, सिटी रिपोर्टर।
महत्वकांक्षी दिल्ली-मुंबई इंडस्ट्रियल कॉरिडोर (डीएमआईसी) की कल्पना को आकार देने के लिए सरकार ने जमीन जुटाना शुरू कर दिया है। इंदौर-देवास-पीथमपुर सहित पूरे मालवा-निमाड़ की तस्वीर बदलने का माद्दा रखने वाली इस परियोजना के लिए 1750 हेक्टेयर से ज्यादा जमीन की जरूरत जताई जा रही है। इसे पूरा करने के लिए एक तरफ संबंधित जिलों के कलेक्टरों को सरकारी जमीनें चिह्नित करने का फरमान जारी करने के साथ सरकार ने निजी जमीनों के अधिग्रहण की फाइलें भी दौड़ाना शुरू कर दी है।
डीएमआईसी को लेकर डेढ़ साल से जद्दोजहद जारी है। अब मुद्दा अटका है जमीन में। इसीलिए कॉरीडोर के महत्व और उससे होने वाले प्रभाव से वाकीफ सरकार ने ताबड़तोड़ जमीनें जुटाना शुरू कर दी। पहले चरण में कॉरीडोर के अंतर्गत आने वाले अर्ली बर्ड प्रोजेक्ट (भविष्य की संभावनाओं के मद्देनजर तैयार परियोजना) के लिए ही 1750 हेक्टेयर से 'यादा जमीन की जरूरत जताई गई।
नॉलेज सिटी
इसमें 419 हेक्टेयर जमीन इंदौर-उ'जैन के बीच प्रस्तावित नॉलेज सिटी के लिए चिह्नित की गई हैं। 233 हेक्टेयर जमीन सरकारी है जबकि 186 हेक्टेयर निजी। 101 हेक्टेयर सरकारी जमीन अधिग्रहित भी की जा चुकी है। इसकी अनुमानित लागत 350 करोड़ बताई जा रही है।
इसी तरह इंदौर से पीथमपुर के बीच प्रस्तावित मल्टी मॉडल लॉजेस्टिक हब के लिए 175 हेक्टेयर जमीन का एस्टीमेट बनाया गया है। इसमें 157 हेक्टेयर जमीन निजी बताई जा रही है। हब में रेलवे साइड, ट्रक टर्मिनल, पार्किंग एरिया, वेअर हाउस, कंटेनर स्टेशन जैसी सुविधाएं जुटाई जाएंगी। इसकी लागत 660 करोड़ से 'यादा आंकी जा रही है। वहीं 12,975 करोड़ की लागत से प्रस्तावित इकोनॉमिक कॉरीडोर के लिए 1164.2 एकड़ जमीन की जरूरत जताई गई है। इंदौर एअरपोर्ट से पीथमपुर के बीच प्रस्तावित इस परियोजना के तहत कमर्शियल सिटी सेंटर, सब सिटी सेंटर, आवासीय परिसर, आईटी सेक्टर, होटल, एम्यूजमेंट पार्क, थीम पार्क, ट्रेनिंग इंस्टीट्यूट और बीआरटीएस जैसी सुविधाएं जुटाई जाना है। अर्ली बर्ड प्रोजेक्ट में पीथमपुर औद्योगिक क्षेत्र में जल प्रदाय और दूषित जल का प्रबंधन, राजगढ़ जिले में पॉवर इक्यूपमेंट मेन्यूफेक्चरिंग हब की स्थापना।
क्या है डीएमआईसी
भारत सरकार दिल्ली से मुंबई के बीच 1483 किलोमीटर लंबी एक मल्टी मॉडल हाई एक्सल लोड डेडिकेटेड फ्रेट कॉरीडोर (डीएफसी) रेलवे लाइन डालने जा रही है। इस कॉरीडोर का एक छोर दादरी राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र दिल्ली में है तो दूसरा जवाहरलाल नेहरू बंदरगाह मुंबई में। इसी डीएफसी के समानांतर दिल्ली-मुंबई इंडस्ट्रीयल कॉरीडोर बनाया जाना है। मप्र डीएफसी से 300 किलोमीटर दूर है। बावजूद इसके भौगोलिक स्थिति को देखते हुए मप्र को लॉजेस्टिक हब के लिए चुना गया है। चार डेवलपमेंट क्षेत्र चिह्नित किए गए गए हैं। पीथमपुर-धार-महू इन्वेस्टमेंट रीजन, शाजापुर-देवास इंडस्ट्रीयल एरिया, रतलाम-नागदा इन्वेस्टमेंट रीजन और नीमच-नागदा इंडटस्ट्रीय एरिया।
लाभान्वित क्षेत्र-
इंदौर, उजैन, देवास, धार, झाबुआ, रतलाम, नीमच, मंदसौर, शाजापुर और राजगढ़ इसके विस्तार क्षेत्र हैं।
नॉलेज सिटी, उज्जैन :- कुल 448 हेक्टेयर जमीन चिह्नित की गई है योजना के लिए। 218 हेक्टेयर जमीन शासकीय है जबकि 230 हेक्टेयर निजी। 172 हेक्टेयर सरकारी जमीन का नामांतरण हो चुका है। 46 हेक्टेयर का नामांतरण होना है। उधर, निजी जमीनों को लेकर जारी अधिग्रहण का किसानों द्वारा विरोध जारी है। जमीन की अनुमानित कीमत 350 करोड़ से ज्यादा बताई जा रही है।
मल्टीमॉडल लॉजिस्टिक हब(एमएमएलएच) पीथमपुर := एबी रोड और इंदौर-दाहोद रेल लाइन के समानांतर बनना है हब। कुल 178 हेक्टेयर जमीन की जरूरत है। इसमें 162 हेक्टेयर जमीन निजी है। अधिगृहण की प्रक्रिया शुरू होते ही लोगों ने विरोध शुरू कर दिया था। सरकारी जमीन के नामांतरण की प्रक्रिया अंतिम चरण में है। यहां रेलवे सिडिंग, कंटेनर स्टेशन, वेअर हाउस, ट्रक टर्मिनल जैसी सहुलियतें विकसित होंगी।
इकोनॉमिक कॉरिडोर (इंदौर एअरपोर्ट से पीथमपुर ) :- कॉरिडोर 20.3 किलोमीटर लंबे हिस्से में विकसित होगा। कॉरिडोर के दोनों तरफ इन्फार्मेशन टेक्नोलॉजी (आईटी) कंपनियों, प्रदूषण रहित औद्योगिक इकाइयों, पर्यटन और उससे जुड़ी व्यावसायिक सहुलियतें विकसित की जाना है। कुल 1164 हेक्टेयर जमीन पर विकसित होगा कॉरिडोर। 222 हेक्टेयर में रिजनल पार्क बनेंगे। 159 हेक्टेयर में प्रदूषण मुक्त इकाइयां, 152 हेक्टेयर में होगी आईटी कंपनियां। 138 में सड़कें। बाकी में आवास, पर्यटन, एक्जीबिशन एंड ट्रेड सेंटर, बीआरटी टर्मिनल।
बेटमा-पीथमपुर इंडस्ट्रियल क्लस्टर :- डीएमआईसी के पहले ही चरण में पीथमपुर-धार-महु निवेश क्षेत्रों के लिए सर्वसुविधायुक्त टाउनशिप विकसित की जाएगी। टाउनशिप पीथमपुर इंडस्ट्रियल ग्रोथ सेंटर के पास बनेगी। कुल 1043 हेक्टेयर जमीन की जरूरत है। 238 हेक्टेयर जमीन का नामांतरण प्रक्रिया में है जबकि 805 हेक्टेयर जमीन की अधिग्रहण प्रक्रिया जारी है। यहां भी किसानों के विरोध का सामना करना पड़ रहा है।
महत्वकांक्षी दिल्ली-मुंबई इंडस्ट्रियल कॉरिडोर (डीएमआईसी) की कल्पना को आकार देने के लिए सरकार ने जमीन जुटाना शुरू कर दिया है। इंदौर-देवास-पीथमपुर सहित पूरे मालवा-निमाड़ की तस्वीर बदलने का माद्दा रखने वाली इस परियोजना के लिए 1750 हेक्टेयर से ज्यादा जमीन की जरूरत जताई जा रही है। इसे पूरा करने के लिए एक तरफ संबंधित जिलों के कलेक्टरों को सरकारी जमीनें चिह्नित करने का फरमान जारी करने के साथ सरकार ने निजी जमीनों के अधिग्रहण की फाइलें भी दौड़ाना शुरू कर दी है।
डीएमआईसी को लेकर डेढ़ साल से जद्दोजहद जारी है। अब मुद्दा अटका है जमीन में। इसीलिए कॉरीडोर के महत्व और उससे होने वाले प्रभाव से वाकीफ सरकार ने ताबड़तोड़ जमीनें जुटाना शुरू कर दी। पहले चरण में कॉरीडोर के अंतर्गत आने वाले अर्ली बर्ड प्रोजेक्ट (भविष्य की संभावनाओं के मद्देनजर तैयार परियोजना) के लिए ही 1750 हेक्टेयर से 'यादा जमीन की जरूरत जताई गई।
नॉलेज सिटी
इसमें 419 हेक्टेयर जमीन इंदौर-उ'जैन के बीच प्रस्तावित नॉलेज सिटी के लिए चिह्नित की गई हैं। 233 हेक्टेयर जमीन सरकारी है जबकि 186 हेक्टेयर निजी। 101 हेक्टेयर सरकारी जमीन अधिग्रहित भी की जा चुकी है। इसकी अनुमानित लागत 350 करोड़ बताई जा रही है।
इसी तरह इंदौर से पीथमपुर के बीच प्रस्तावित मल्टी मॉडल लॉजेस्टिक हब के लिए 175 हेक्टेयर जमीन का एस्टीमेट बनाया गया है। इसमें 157 हेक्टेयर जमीन निजी बताई जा रही है। हब में रेलवे साइड, ट्रक टर्मिनल, पार्किंग एरिया, वेअर हाउस, कंटेनर स्टेशन जैसी सुविधाएं जुटाई जाएंगी। इसकी लागत 660 करोड़ से 'यादा आंकी जा रही है। वहीं 12,975 करोड़ की लागत से प्रस्तावित इकोनॉमिक कॉरीडोर के लिए 1164.2 एकड़ जमीन की जरूरत जताई गई है। इंदौर एअरपोर्ट से पीथमपुर के बीच प्रस्तावित इस परियोजना के तहत कमर्शियल सिटी सेंटर, सब सिटी सेंटर, आवासीय परिसर, आईटी सेक्टर, होटल, एम्यूजमेंट पार्क, थीम पार्क, ट्रेनिंग इंस्टीट्यूट और बीआरटीएस जैसी सुविधाएं जुटाई जाना है। अर्ली बर्ड प्रोजेक्ट में पीथमपुर औद्योगिक क्षेत्र में जल प्रदाय और दूषित जल का प्रबंधन, राजगढ़ जिले में पॉवर इक्यूपमेंट मेन्यूफेक्चरिंग हब की स्थापना।
क्या है डीएमआईसी
भारत सरकार दिल्ली से मुंबई के बीच 1483 किलोमीटर लंबी एक मल्टी मॉडल हाई एक्सल लोड डेडिकेटेड फ्रेट कॉरीडोर (डीएफसी) रेलवे लाइन डालने जा रही है। इस कॉरीडोर का एक छोर दादरी राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र दिल्ली में है तो दूसरा जवाहरलाल नेहरू बंदरगाह मुंबई में। इसी डीएफसी के समानांतर दिल्ली-मुंबई इंडस्ट्रीयल कॉरीडोर बनाया जाना है। मप्र डीएफसी से 300 किलोमीटर दूर है। बावजूद इसके भौगोलिक स्थिति को देखते हुए मप्र को लॉजेस्टिक हब के लिए चुना गया है। चार डेवलपमेंट क्षेत्र चिह्नित किए गए गए हैं। पीथमपुर-धार-महू इन्वेस्टमेंट रीजन, शाजापुर-देवास इंडस्ट्रीयल एरिया, रतलाम-नागदा इन्वेस्टमेंट रीजन और नीमच-नागदा इंडटस्ट्रीय एरिया।
लाभान्वित क्षेत्र-
इंदौर, उजैन, देवास, धार, झाबुआ, रतलाम, नीमच, मंदसौर, शाजापुर और राजगढ़ इसके विस्तार क्षेत्र हैं।
नॉलेज सिटी, उज्जैन :- कुल 448 हेक्टेयर जमीन चिह्नित की गई है योजना के लिए। 218 हेक्टेयर जमीन शासकीय है जबकि 230 हेक्टेयर निजी। 172 हेक्टेयर सरकारी जमीन का नामांतरण हो चुका है। 46 हेक्टेयर का नामांतरण होना है। उधर, निजी जमीनों को लेकर जारी अधिग्रहण का किसानों द्वारा विरोध जारी है। जमीन की अनुमानित कीमत 350 करोड़ से ज्यादा बताई जा रही है।
मल्टीमॉडल लॉजिस्टिक हब(एमएमएलएच) पीथमपुर := एबी रोड और इंदौर-दाहोद रेल लाइन के समानांतर बनना है हब। कुल 178 हेक्टेयर जमीन की जरूरत है। इसमें 162 हेक्टेयर जमीन निजी है। अधिगृहण की प्रक्रिया शुरू होते ही लोगों ने विरोध शुरू कर दिया था। सरकारी जमीन के नामांतरण की प्रक्रिया अंतिम चरण में है। यहां रेलवे सिडिंग, कंटेनर स्टेशन, वेअर हाउस, ट्रक टर्मिनल जैसी सहुलियतें विकसित होंगी।
इकोनॉमिक कॉरिडोर (इंदौर एअरपोर्ट से पीथमपुर ) :- कॉरिडोर 20.3 किलोमीटर लंबे हिस्से में विकसित होगा। कॉरिडोर के दोनों तरफ इन्फार्मेशन टेक्नोलॉजी (आईटी) कंपनियों, प्रदूषण रहित औद्योगिक इकाइयों, पर्यटन और उससे जुड़ी व्यावसायिक सहुलियतें विकसित की जाना है। कुल 1164 हेक्टेयर जमीन पर विकसित होगा कॉरिडोर। 222 हेक्टेयर में रिजनल पार्क बनेंगे। 159 हेक्टेयर में प्रदूषण मुक्त इकाइयां, 152 हेक्टेयर में होगी आईटी कंपनियां। 138 में सड़कें। बाकी में आवास, पर्यटन, एक्जीबिशन एंड ट्रेड सेंटर, बीआरटी टर्मिनल।
बेटमा-पीथमपुर इंडस्ट्रियल क्लस्टर :- डीएमआईसी के पहले ही चरण में पीथमपुर-धार-महु निवेश क्षेत्रों के लिए सर्वसुविधायुक्त टाउनशिप विकसित की जाएगी। टाउनशिप पीथमपुर इंडस्ट्रियल ग्रोथ सेंटर के पास बनेगी। कुल 1043 हेक्टेयर जमीन की जरूरत है। 238 हेक्टेयर जमीन का नामांतरण प्रक्रिया में है जबकि 805 हेक्टेयर जमीन की अधिग्रहण प्रक्रिया जारी है। यहां भी किसानों के विरोध का सामना करना पड़ रहा है।
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