- 2 नवंबर को हुई कार्रवाई के खिलाफ सुप्रीमकोर्ट की शरण लेगा स्कूल प्रबंधन
- ली विधिक राय, सुप्रीमकोर्ट का आदेश और राज्य सरकार का सर्कुलर होगा बुनियाद
इंदौर. विनोद शर्मा ।
इंदौर में फलफूल रहे शिक्षा माफियाओं पर नकेल कसने में नाकाम रहा प्रशासन 90 साल पुराने सेंट रेफल्स स्कूल पर खीज उतार रहा है। शायद यही वजह थी कि सुप्रीमकोर्ट द्वारा जारी आदेश और राज्य सरकार द्वारा जिलावार जारी किए गए सर्कुलर को नजरअंदाज करते हुए संबंधितों ने न सिर्फ स्कूल में दबिश दी बल्कि मान्यता पर प्रश्नचिह्न लगाते हुए स्कूल की नौ दशक पुरानी साख को भी संकट में डाल दिया। स्कूल प्रशासन, प्राचार्य, टीचर और बच्चों से लेकर अभिभावकों तक हर कोई खौफजदा है। 'टीचर, क्या स्कूल बंद हो जाएगाÓ, जैसा भयावह सवाल इन दिनों हर मासूम की जुबान पर है। तंग आकर स्कूल प्रशासन कार्रवाई के खिलाफ सुप्रीमकोर्ट जाने की तैयारियां शुरू करना पड़ी। उधर, कार्रवाई को अंजाम देने वाले अधिकारियों की मानें तो पुरानी शिकायतों और अनियमितताओं के आधार पर हुई कार्रवाई। सुप्रीमकोर्ट के आदेश से नहीं ताल्लुक।
सोसायटी फॉर अन-एडेड प्राइवेट स्कूल्स ऑफ राजस्थान द्वारा यूनियन ऑफ इंडिया व अन्य के खिलाफ दायर याचिका (98/2010) सहित 31 अलग-अलग याचिकाओं की सुनवाई के बाद सुप्रीमकोर्ट की डबल बैंच (जस्टिस एस.एच.कपाडिय़ा और स्वतंत्र कुमार) ने 12 अपै्रल 2012 को एक आदेश जारी किया। आदेश में न्यायाधीश्द्वय ने स्पष्ट कर दिया कि अल्पसंख्यक समूदाय द्वारा संचालित गैर अनुदान प्राप्त स्कूल आरटीई एक्ट 2009 से मुक्त रखा गया है। आदेश 2012-13 के शिक्षा सत्र से लागू होगा। आदेश जारी होने से पहले आरटीई एक्ट के तहत दिए गए एडमिशन प्रभावित नहीं होंगे। सुप्रीमकोर्ट के इस आदेश को गंभीरता से लेते हुए शोभा इवनाती, उप सचिव मप्र शासन स्कूल शिक्षा विभाग ने 26 जुलाई 2012 को सभी जिला शिक्षा अधिकारियों को एक सर्कूलर जारी किया। सर्कूलर में उन्होंने सुप्रीमकोर्ट द्वारा अपै्रल 2012 को जारी आदेश का हवाला देते हुए स्पष्ट कर दिया कि जो शैक्षणिक संस्थाएं भाषाई एवं धार्मिक अल्पसंख्यक होने के सक्षम अधिकारी का प्रमाण प्रस्तुत करे, उन्हें शिक्षा का अधिकार अधिनियम से मुक्त रखा जाए। सुप्रीमकोर्ट के उक्त आदेश और शिक्षा विभाग के सर्कूलर को नजरअंदाज करते हुए 6 अक्टूबर 2012 को जिला शिक्षा अधिकारी संजय गोयल द्वारा लिखा गया आदेश 2 नवंबर को स्कूल की टीचरों को थमाते हुए कार्रवाई शुरू कर दी।
सिर्फ सेंट रेफल्स ही क्यों?
आरटीई के तहत स्कूलों द्वारा की जा रही अनियमितताएं जांचने के लिए बनाई गई चा सदस्यीय समिति ने सेंट रेफल के खिलाफ जैसी कार्रवाई की वैसी दूसरे स्कूलों के खिलाफ नहीं हुई। वह भी उस स्थिति में जब इंदौर में तीन हजार से ज्यादा निजी-शासकीय-अर्धशासकीय स्कूल हैं। कार्रवई के दौरान 90 साल पुराने स्कूल की मान्यता पर अंगुली उठाने वाले अधिकारियों को इंदौर की तंग गलियों में टीन शेड में चल रहे स्कूल क्यों नजर नहीं आते। यदि आते हैं तो वहां कार्रवाई क्यों नहीं होती? सुप्रीमकोर्ट द्वारा आदेश अपै्रल 2012 में जारी किया गया जबकि आरटीई एक्ट 2009 में बना। संबंधितों ने अब तक कार्रवाई क्यों नहीं की। अब जबकि सुप्रीमकोर्ट ऐसे स्कूलों को छूट दे चुका है तो कार्रवाई किस बुनियाद पर की गई?
एक नजर में स्कूल
शुरूआत :- 1928 से
स्टूडेंट्स :- 3400
स्टाफ :- हाईस्कूल शिक्षक-57 और प्राइमरी-मिडिल -53, 25 गैर शैक्षणिक
क्षेत्रफल :- करीब साढ़े सात एकड़
कारण :- जिनकी बुनियाद पर हुई थी कार्रवाई
- आरटीई के तहत कमजोर वर्ग के बच्चों को एडमिशन दिया जाना था। लॉटरी के वक्त कुछ पालकों ने पक्षपात का आरोप लगाया था। जिनकी जांच के दौरान उपलब्ध सीटों से कम दर्शाकर बच्चों के अधिकार छीनने की बात कही गई थी। नोटिस का भी स्कूल ने जवाब नहीं दिया। 15 मई को प्रमुख सचिव शिक्षा ने मान्यता समाप्ति का पत्र लिखा। 30 मई को राज्य शिक्षा केंद्र आयुक्त ने जिला शिक्षा अधिकारी को मान्यता समाप्ति संबंधित कार्रवाई के निर्देश दिए। स्कूल प्रबंधन ने जवाब में बताया था कि सुप्रीमकोर्ट एडमिशन में छूट दे चुकी है। इसके बाद आयुक्त ने कलेक्टर को बोलकर दल गठित करवाया जिसने 2 नवंबर को कार्रवाई की।
- कार्रवाई के बाद इंदौर के एक प्रमुख अखबार ने लिखा था स्कूल प्रबंधन पर सवा चार करोड़ का दंड लग सकता है। लिखा गया था कि मेंटेनेंस के नाम पर बच्चों से 1000-1000 रुपए लिए गए जबकि इस केपिटेशन फिस पर सुप्रीमकोर्ट की रोक है। इसी अखबार ने 20 अपै्रल को 'अल्प संख्यक स्कूलों को मिला फायदाÓशीर्षक से समाचार प्रकाशित कर चुका है। जिसमें अल्पसंख्यक समूदाय के गैर अनुदान प्राप्त स्कूलों को आरटीई से मुक्ति की बात प्रमुखता से प्रकाशित की गई थी जबकि सचिव ने मान्यता समाप्ति का पत्र 15 मई को लिखा था यानी आदेश के 28 दिन बाद।
कार्रवाई को कोर्ट में देंगे चुनौती
पहले यातायात पुलिस और बाद में तथाकथित जांच एजेंसी द्वारा की गई कार्रवाई किसी सोची समझी प्लानिंग का हिस्सा लगती है। इसके पीछे कौनसी शक्ति है? मैं यह तो नहीं कह सकती लेकिन इतना जरूर जानती हूं कि वे उस स्कूल की साख धूमिल करने पर आमादा है जो गुणवत्तायुक्त शिक्षा के मामले में इंदौर ही नहीं पूरे मप्र में विशिष्ट पहचान रखता है। कई चीजे ऐसी हैं जिन्हें हम अब तक अनदेखा करते आ रहे थे। चाहते नहीं थे कि पढऩा-पढ़ाना छोड़कर कोर्ट कचहरी में वक्त जाया करें लेकिन अब जबकि पानी सर से जाने लगा है तो लगता है कि मजबूती से अपना पक्ष रखने के लिए हमें कोर्ट की शरण लेना ही चाहिए।
सिस्टर विमला जेकब
प्रिंसिपल
ऐसे दी दबिश जैसे यहां स्कूल नहीं जुआंघर हो
- हम क्लास ले रहे थे। वे अपना परिचय दिए बिना क्लासरूप में आए। कभी टेबल कुर्सी चेक करते तो कभी कमरे की लंबाई-चौड़ाई नापते। कभी बच्चे का बस्ता चेक करते तो कभी कम्पॉस। मैं और बच्चे हक्काबक्का थे। ऐसा लगा मानों हम स्कूल में नहीं, किसी आपराधिक अड्डे में खड़े हों।
मनीषा पॉल, टीचर
- बच्चों के बेग चेक किए। जिस बच्चे का बस्ता ज्यादा भारी दिखा था उसका ही वजन तोला। कार्रवाई से पहले नोटिस या अन्य पत्राचार की बात कही। तब उन्होंने जो आदेश हमारे सामने टीचर के हाथ में थमाया वह 6 अक्टूबर को लिखा गया था।
रीता बिष्ट, टीचर
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- बेटी तीसरी क्लास में है। यहां एडमिशन मुश्किल से होते हैं यह सच है लेकिन उसी का परिणाम ही है यहां की गुणवत्तायुक्त शिक्षा। होना भी चाहिए, जितनी सीट हो, उतने ही बच्चे हों। अब जिनके बच्चों को एडमिशन नहीं मिल पाते वे तो बुराई भी करेंगे और शिकायतें भी।
सुमति कौशल, पालक
- इंदौर में ऐसे कई शिक्षा माफिया हैं जो सरकारी अधिकारियों की सहायता से ही पनप रहे हैं। इंदौर में कई डमी स्कूल भी है जो मोटी रकम लेकर बच्चे पास करवाते हैं, पढ़ाई से उनका वास्ता तक नहीं। उन पर कार्रवाई क्यों नहीं होती।
अनुपमा शर्मा, पालक
पुरानी तारीख का दोषी है स्कूल
स्कूल प्रबंधन किसी भी फॉरम पर अपनी बात रख सकता है लेकिन यह कहना गलत है कि कार्रवाई सुप्रीमकोर्ट के आदेश का उल्लंघन है। असल में जिस अनियमितता को लेकर स्कूल प्रबंधन के खिलाफ जांच की जा रही है वह सुप्रीमकोर्ट के आदेश से पहले की हैं। इसीलिए कार्रवाई का सुप्रीमकोर्ट के आदेश से कोई लेना-देना नहीं है।
एस.बी.सिंह, संयुक्त संचालक
शिक्ष विभाग
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