Monday, June 29, 2015

10 रुपए के स्टॉम्प पर 83 करोड़ का कर्जा ZOOM

2005 से 2009 के बीच चार बार लिया चौधरी ने पराई जमीन पर लिया लोन
इंदौर. विनोद शर्मा।
जूम डेवलपर्स प्रा.लि के डायरेक्टर विजय चौधरी ने मनोरमागंज की पराई जमीन पर फर्जी नोटराइज्ड दस्तावेजों से 2005 से 2009 के बीच चार बार में 83 करोड़ का कर्जा लिया। जमीन मालिक मणींद्र सेन और उसके परिवार के फर्जी दस्तखत के साथ जिस स्टॉम्प को चौधरी नोटराइज्ड डॉक्यूमेंट के रूप में प्रस्तूत करता रहा उसकी कीमत सिर्फ 10 रुपए है। उधर, दस्तावेजों, जमीन, मालिकाना हक और गाइडलाइन कीमत के साथ कर्ज के पुनर्भुगतान की समीक्षा किए बगैर यूनियन बैंक ऑफ इंडिया के अधिकारी मिलीभगत के चलते रेवड़ी की तरह पैसा बांटते रहे। सेन की शिकायत पर प्रकरण दर्ज होने के बाद कोर्ट से जमानत लेकर निकले बैंक अधिकारियों ने मामले से अपना नाम रफा-दफा कराने के प्रयास शुरू कर दिए हैं। इस संबंध में मंगलवार वे दिन में आईजी ऑफिस के चक्कर काटते नजर आए तो शाम को पलासिया थाने के। शाम को मद्रास कोर्ट से मिली एंटीसपेटरी जमानत के आधार पर उन्होंने पलासिया थाने में गिरफ्तारी दी और छूट गए। नियमित जमानत के लिए कोर्ट में आवेदन भी किया जिसकी सुनवाई संभवत: गुरुवार को होगी। हालांकि पुलिस ने दो टूक शब्दों में स्पष्ट कर दिया कि मामला प्रवर्तन निर्देशालय (ईडी) को सौंप रहे हैं।

मामला मणींद्रचंद्र सेन की 7 मनोरमागंज (पलासिया की सर्वे नं. 168-169) स्थित 1,0,9000 वर्गफीट जमीन का है। कुट रचित दस्तावेजों के आधार पर यूनियन बैंक ऑफ इंडिया के मुख्य प्रबंधक आर.रामनाथन और संजय सत्पथी ने मिलीभगत के चलते बगैर मौका मुआयन और बगैर संपत्ति की समीक्षा के चौधरी को करोड़ों का कर्ज दे डाला। 12 फरवरी 2011 को पत्र लिखकर कब्जा मांगने के बाद 6 अपै्रल 2011 को रामनाथन और सत्पथी ने ही जमीन पर पहुंचकर न सिर्फ कब्जा लेने के प्रयास किए बल्कि सेन के परिवार के साथ बदसलूकी भी की। जांच के बाद सेन की शिकायत पर 14 अगस्त 2011 को पलासिया पुलिस ने जूम डेवलपर्स प्रा.लि. और जूम वल्लभ स्टील लि. के डायरेक्टर विजय चौधरी, रजत इन्फ्रास्ट्रक्चर प्रा.लि. (आरआईपीएल) की डायरेक्टर मंजरी चौधरी, संचालक बी.बी.केजरीवाल के साथ यूबीआई के मुख्य प्रबंधक आर.रामनाथन और संजय सत्पथी के खिलाफ भी धारा 406, 420, 467, 468, 471 और 120बी के तहत प्रकरण दर्ज किया था। बाद में कोर्ट ने रामनाथन और सत्पथी को सशर्त दो महीने की जमानत दे दी। जमानत अवधि खत्म होने में 15 दिन बाकी है। सो गिरफ्तारी से बचने के लिए दोनों ने नए सिरे से जोड़तोड़ शुरू कर दिए हैं। इसी क्रम में मंगलवार को वे आईजी ऑफिस और पलासिया थाने भी पहुंचे। हालांकि पुलिस की सख्ती के कारण उन्हें निराश लौटना पड़ा।
सेन कैसे आए चौधरी के चुंगल में....
उधर, दबंग दुनिया के हाथ लगे दस्तावेजी प्रमाणों की मानें तो प्लॉट मालिक मणींद्र सेन, निर्मला देवी, शरदचंद्र सेन और चेतक कंस्ट्रक्शन प्रा.लि. के बीच डेवलपमेंट के लिए एग्रीमेंट हुआ था जो बाद में निरस्त हो गया। 14 अक्टूबर 1994 को आरआईपीएल (रजत इन्फ्रास्ट्रक्चर प्रा.लि. जिसकी डायरेक्टर विजय की पत्नी मंजरी चौधरी है।) और प्लॉट मालिकों के बीच नए सिरे से अनुबंध हुआ। अनुबंध के अनुसार आरआईपीएल ने 28,230 वर्गफीट के सुपर बिल्टअप निर्माण की सहमति दी। इसके लिए प्लॉट मालिकों ने अधिकार कंपनी को दिए। आरआईपीएल ने डेवलपमेंट नहीं किया।
50 करोड़ की जमीन पर 83 करोड़ का कर्जा...
मार्च 2005 में जूम डेवलपर्स प्रा.लि. (जिसके डायरेक्टर विजय चौधरी है।) ने यूनियन बैंक ऑफ इंडिया(यूबीआई) की अंधेरी शाखा से 20 करोड़ का लोन लिया। इस राशि के पुनर्भुगतान की ग्यारंटी के रूप में आरआईपीएल ने प्लॉट बैंक के पास गिरवी रख दिया। इधर, सेन परिवार को इसकी भनक तक नहीं लगी। उधर, चौधरी के आवेदन पर बैंक ने 2006 में कर्ज 20 से बढ़ाकर 35 करोड़ कर दिया। 2009 तक चौधरी ने इसी प्लॉट से 50 करोड़ का कर्ज लिया। 2009 में ही जूम डेवलपर्स प्रा.लि. की सहयोगी कंपनी जूम वल्लभ स्टील लि.बनी। कंपनी ने यूनियन बैंक से 25 करोड़ का लोन मांगा। इसके एवज में आरआईपीएल ने सेन परिवार के तीन सदस्यों के फर्जी दस्तखत से तैयार अनापत्ति बैंक में पेश करके जमीन नए सिरे से गिरवी रख दी। बाद में बैंक ने जूम वल्लभ को 25 के बजाय 33 करोड़ का लोन दिया। यानी एक ही जमीन पर यूबीआई के कर्ताधर्ताओं ने 83 करोड़ का कर्ज दिया। वह भी उस स्थिति में जब 2009 तक गाइडलाइन के आधार पर जमीन की कीमत बमुश्किल 50 करोड़ थी।
इसलिए फंसते हैं बैंक अधिकारी....
1- चौधरी ने जो नोटराइज्ड दस्तावेज पेश किया बैंक ने न उस दस्तावेज की तस्दीक की और न ही उस व्यक्ति से जानकारी ली जिनके फर्जी दस्तखत से अनापत्ति पेश की गई।
2- यदि चौधरी ने कर्ज नहीं चुकाया था तो बैंक को जमीन पर सांकेतिक कब्जा लेकर जमीन के असल मालिक को कहना था कि जब तक न्यायिक फैसला नहीं होता तब तक जमीन आपके कब्जे में है। ऐसा करना तो दूर बैंक अधिकारियों ने सरफेस एक्ट के नाम पर जमीन का जबरिया कब्जा लिया।
3- जिस जमीन पर लोन दे रहे हैं उसकी गाइडलाइन के आधार पर कीमत कितनी है इसका आंकलन भी बैंक ने नहीं किया।




No comments:

Post a Comment