Sunday, June 28, 2015

एटूजेड का कर्ज घोटाला

बारक्लेज बैंक को 14 करोड़ की टोपी
- कर्ज चुकाने के बजाए लगाया खाता बदलने का आवेदन
इंदौर. विनोद शर्मा । 
कचरा प्रबंधन के नाम पर 10 करोड़ के संसाधनों को कचरा करने वाली एटूजेड मैंटेनेंस एंड इंजीनियरिंग प्रा.लि. ने 14 करोड़ लोन लेकर अदायगी के नाम पर बारक्लेज बैंक को पीठ दिखा दी है। कंपनी नगर निगम पर बैंक खाता बदलने का दबाव बना रही है। वहीं बारक्लेज बैंक प्रबंधन ने भी दो टूक शब्दों में स्पष्ट कर दिया है कि उसने निगम को देखकर कर्ज दिया था। इसीलिए निगम खाता नहीं बदल सकता। कंपनी और बैंक की नुराकुश्ती का खामियाजा जहां शहर की आवाम को चुकाना पड़ रहा है वहीं जानकार कहते हैं कि घाटे की वजह से कंपनी कर्जा चुका नहीं पा रही है। उधर, कंपनी की बकायादारी को देखते हुए दूसरी बैंकों ने भी हाथ खड़े कर दिए हैं।
जेएनएनयूआरएम के तहत केंद्र और राज्य सरकार से 30 करोड़ की वित्तीय मदद मिलने के बावजूद इंदौर नगर निगम शहर की सफाई में पूरी तरह नाकाम है। झूठे आंकड़ों, फर्जी दस्तावेजों और निगम के तथाकथित नीतिनिर्धारकों के सहारे से खड़ी कंपनी की एम्पायर भरभराकर बिखर चुकी है। तीन दिन से कंपनी और कर्मचारियों के बीच ठनाठनी जारी है। इसका बड़ा कारण बारक्लेज बैंक और कंपनी के बीच का विवाद बताया जा रहा है। सूत्रों की मानें तो कंपनी ने प्रोसेसिंग प्लांट के लिए बारक्लेज बैंक से 19 करोड़ रुपए का कर्ज मांगा था। मिला 14 करोड़ रुपए। अनुबंध के मुताबिक अब तक नगर निगम एटूजेड के काम का भुगतान सीधे बैंक के खाते में कर देता था। इलेक्ट्रॉनिक क्लीयरेंस सिस्टम (ईसीएस) की तरह बैंक इक्वेटेड मंथली इंस्टॉलमेंट (ईएमआई) काट लेती थी। बाकी पैसा कंपनी अपने खर्च के लिए निकाल लेती थी। आर्थिक स्थिति डांवाडोल होने और इंदौर से अनौपचारिक रुखस्ती लेने के कारण कंपनी की नीयत बदल गई। कंपनी ने निगम को दूसरा खाता नंबर दिया, कहा कि पैसा अब इसमें जमा करें। निगम ने कारण पूछते हुए दूसरा खाता नंबर व अन्य जानकारी मांगी। कंपनी की जल्दबाजी के बीच निगम ने कहा प्रक्रिया में थोड़ा वक्त लगेगा। इसकी जानकारी लगते ही बैंक ने खाता परिवर्तन पर लिखित आपत्ति ले ली।
क्यों बिगड़े हालात...
एटूजेड ने ही बारक्लेज बैंक का लोन प्रस्ताव देकर निगम से कहा था कि पैसा इस बैंक के खाते में जमा हो। दो साल तक पैसा बैंक के खाते में पहुंचा भी। बीच में काम में कोताही या अन्य कारणों से भुगतान में देर हुई। जब भुगतान हुआ तो बैंक ने अपनी ईएमआई रूप में पूरा पैसा काट लिया। कंपनी के हाथ कुछ लगा नहीं। इससे कंपनी का दिमाग ठनका और उन्होंने खाता बदलने का आवेदन कर दिया।
उप्र में भी पहनाई बैंकों को टोपी...
कंपनी को कानपुर-लखनऊ स्थित उप्र की 12 से 13 नगर निगमों में संयुक्त रूप से काम मिला। प्रशासन ने एकमुश्त राशि देकर कंपनी को संसाधन जुटाने की जिम्मेदारी दे दी। कंपनी ने अपने नाम से न सिर्फ संसाधन जुटाए बल्कि उन पर बैंकों से तकरीबन 200 करोड़ रुपए लोन भी ले लिया। आॅडिट हुआ तो पता चला कि एक भी संसाधन सरकारी नहीं है। इस पर कंपनी के खिलाफ कार्रवाई करते हुए नगर निगमों के नाम से संसाधन खरीदवाए गए। कंपनी के नाम वाले संसाधन हटा दिए गए। यही संसाधन अन्य शहरों में काम आ रहे हैं जैसे इंदौर में कानपुर और मेरठ की गाड़ियां चल रही है।
बिना पैसा लगाए खड़ा हो गया प्रोसेसिंग प्लांट..
बैंक और कंपनी के झगड़े के बाद यह बात सामने आई है कि ट्रेंचिंग ग्राउंड स्थित प्रोसेसिंग प्लांट में कंपनी ने अपनी पूंजी न के बराबर लगाई। कंपनी को प्रोसेसिंग प्लांट के लिए 25 एकड़ जमीन नगर निगम ने मुफ्त दी। जमीन पर प्लांट खड़ा करने के लिए बारक्लेज बैंक ने 14 करोड़ का लोन दे दिया। इसमें दो-चार करोड़ रुपए ही ऐसे थे जो कंपनी ने लगाए।
अनुबंध के अनुसार कंपनी को 25 साल तक प्लांट चलाना है। 25 साल बाद संपत्ति निगम की होगी। यदि कंपनी बीच में भागती है तो भी संपत्ति निगम की होगी। ऐसी स्थिति में यदि कंपनी पैसा जमा नहीं करती तो भी बारक्लेज बैंक प्लांट पर ताला नहीं ठोक सकती।
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Ñकंपनी और कर्मचारियों की अनबन के कारण जो कचरा नहीं उठ रहा है उससे निगम का कोई लेनादेना नहीं है। यदि कंपनी जल्द अपना काम शुरू नहीं करती तो उसके खिलाफ अनुशासनात्मक कार्रवाई की जा सकती है। रहा बैंक खाता बदलने का मामला तो इस संबंध में विधिक राय लेकर ही निर्णय लेंगे।
मुन्नालाल यादव, प्रभारी
स्वास्थ्य समिति




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