बिग बे्रकिंग
इंदौर. विनोद शर्मा ।
गृह निर्माण संस्थाओं की मनमानी के खिलाफ जारी अभियान, थोकबंद तबादलों, सतत समीक्षा, निगरानी के बाद मुख्यमंत्री सहकारिता विभाग से ईमानदारी की अपेक्षा रखते हैं जबकि विभाग में धांधलियों का दौर बदस्तूर जारी है। विभागीय मनमानी का नायाब नमूना है आरटीओ के सामने सच्चिदानंदनगर कॉलोनी काटने वाली आकाश गृह निर्माण सहकारी संस्था। 2009 में सदस्यता अवैध करार देते हुए जिन 450 सदस्यों को संस्था से बेदखल करने का विज्ञापन जारी किया गया था 2011 में न सिर्फ उन्हीं की भागीदारी से चुनाव हुए बल्कि उन्हीं में से 10 संचालक भी चुने गए। संचालक मंडल का अध्यक्ष सतबीरसिंह छाबड़ा है जो कि भू-माफिया रणवीरसिंह उर्फ बॉबी छाबड़ा का भाई है। शिकवा-शिकायत के बाद भू-माफियाओं और अधिकरियों की मनमानी का कॉकटेल जब ढूला तो संचालकों से इल्तजा की गई कि आप भी बर्खास्त हो जाओ और आपके साथियों को भी बर्खास्त कर लो।
2009 में 25 दागी संस्थाओं की जो सूची जारी की गई थी 'आकाशÓ उनमें से एक थी। संस्था के खिलाफ प्राप्त शिकायत और आला अधिकारियों द्वारा दिए गए निर्देश के बाद 22 दिसंबर 2009 को उपायुक्त महेंद्र दीक्षित के मार्गदर्शन में वरिष्ठ सहकारिता निरीक्षक और 'आकाशÓ के प्रभारी जी.डी.परिहार ने प्रमुख अखबारों में विज्ञप्ति जारी की। विज्ञप्ति में लिखा था संस्था की पंजीकृत उपविधि क्र. 7(4) के अनुसार स्वीकृत सदस्य संख्या 350 है जबकि बर्हिगामी अध्यक्षों और संचालक मंडलों द्वारा उपविधियों का उल्लंघन करते हुए 787 सदस्य बनाए गए। स्पष्ट है कि क्र. 350 के बाद के सदस्यों की सदस्यता वैध न होने के कारण समाप्त करने का निर्णय लिया गया है। सात दिन में कोई भी व्यक्ति अपनी आपत्ति सहकारिता विभाग में दर्ज करा सकता है। सात दिन की मियाद के साथ विज्ञप्ति जारी हुए 35 महीने (1077 दिन) से ज्यादा हो चुका है लेकिन आज दिन तक 437 तो दूर एक सदस्य की सदस्यता भी समाप्त नहीं हुई। उलटा, इन्हीं फर्जी सदस्यों के मताधिकार को बरकरार रखते हुए 2011 में संस्था के चुनाव कराए गए। अध्यक्ष सहित जो नौ लोग संचालक के रूप में निर्वाचित हुए वे भी इन्हीं 437 में शामिल हैं। इस बात की शिकायत जब भोपाल तक पहुंची तो 11 जून 2012 को 'आकाशÓ के आकाओं (अध्यक्ष व संचालक) पत्र जारी करते हुए कहा कि प्रावधानों के विपरीत बनाए गए सदस्यों के निष्कासन की कार्रवाई 15 दिन में करके कार्यालय को अवगत कराएं। पत्र में यह भी लिखा कि निर्धारित अवधि में कार्रवाई न होने की दशा में यह मान लिया जाएगा कि आप कार्रवाई करना नहीं चाहते, अत: आपके विरुद्ध सहकारी अधिनियम के प्रावधानों के तहत कार्रवाई की जाएगी।
26 महीने बंद रही फाइल...
22 दिसंबर 2009 को फर्जी सदस्यता समाप्त किए जाने की विज्ञप्ति निकालने के बाद भू-माफियाओं के ईशारे पर अधिकारियों ने फाइल 26 महीने बंद रखी। लगातार शिकायतों के बाद फाइल खुली 15 फरवरी 2009 को जब 2009 में जारी विभिन्न पत्रों का हवाला देकर उपायुक्त महेंद्र दीक्षित ने सहकारिता आयुक्त को पत्र लिखकर कहा कि विज्ञप्ति तो जारी कर दी थी लेकिन संस्था की सदस्यता पंजी प्राप्त न होने, ऑडिट रिपोर्ट में सदस्यों की सूची के आगे पंजीयन क्रमांक, पता व सदस्यता दिए जाने की दिनांक उपलब्ध न होने के कारण फर्जी सदस्यों की शिनाख्त नहीं हो पाई। जब तक शिनाख्ती नहीं होती तब तक सदस्यों की समाप्त किया जाना संभव नहीं है। संस्था सदस्य देवेंद्र तोतला शिकायतों के आधार पर लगातार दबाव बना रहे है इसीलिए वांछित कार्रवाई के लिए मागदर्शन दें।
हाईकोर्ट ने 1994 में ही तय कर दी सदस्य संख्या
सहकारिता उपायुक्त की मांग पर 21 मई 2012 को मार्गदर्शन देते हुए सहकारिता आयुक्त ने स्पष्ट कर दिया कि 13 मई 1994 को एक याचिका (५/९४) के परिपालन में हाईकोर्ट की जबलपुर खण्डपीठ सदस्यों की संख्या तय करते हुए निर्देशित कर चुकी है कि उपविधि के विरुद्ध बने सदस्यों की सदस्यता समाप्त की जाए। इसी आदेश का पालन करते हुए सदस्यता समाप्ति की जार्रवाई की जा सकती है।
मार्गदर्शन मिलने के बाद भी मौन
13 मई 2012 को सहकारिता आयुक्त द्वारा दिए गए स्पष्ट आदेश के बावजूद सदस्यता समाप्त नहीं हुई। उलटा, 5 सितंबर 2009 (ठिक 115 दिन बाद) को सहकारिता उपायुक्त ने 'आकाशÓ के अध्यक्ष को पत्र लिखा और कहा कि सदस्यता समाप्ति से पहले सदस्यों का पक्ष सुना जाएगा। आपत्ति निराकृत होने के बाद अवैध रूप से बने 437 सदस्यों को निष्काशित करने की कार्रवाई पत्र प्राप्ति के बाद 15 दिन में की जाना है। निर्धारित अवधि में कार्रवाई न होने पर आपके खिलाफ कार्रवाई होगी।
15 दिन की सीमा 92 दिन बाद भी अधूरी
5 सितंबर को 15 दिन की मोहलत देकर पत्र जारी किए 92 दिन हो चुके हैं लेकिन अब तक न संचालक मंडल ने सदस्यों की सदस्यता समाप्त की। न ही सहकारिता विभाग ने कार्रवाई न करने पर उनके खिलाफ किसी तरह की कार्रवाई की।
इंदौर. विनोद शर्मा ।
गृह निर्माण संस्थाओं की मनमानी के खिलाफ जारी अभियान, थोकबंद तबादलों, सतत समीक्षा, निगरानी के बाद मुख्यमंत्री सहकारिता विभाग से ईमानदारी की अपेक्षा रखते हैं जबकि विभाग में धांधलियों का दौर बदस्तूर जारी है। विभागीय मनमानी का नायाब नमूना है आरटीओ के सामने सच्चिदानंदनगर कॉलोनी काटने वाली आकाश गृह निर्माण सहकारी संस्था। 2009 में सदस्यता अवैध करार देते हुए जिन 450 सदस्यों को संस्था से बेदखल करने का विज्ञापन जारी किया गया था 2011 में न सिर्फ उन्हीं की भागीदारी से चुनाव हुए बल्कि उन्हीं में से 10 संचालक भी चुने गए। संचालक मंडल का अध्यक्ष सतबीरसिंह छाबड़ा है जो कि भू-माफिया रणवीरसिंह उर्फ बॉबी छाबड़ा का भाई है। शिकवा-शिकायत के बाद भू-माफियाओं और अधिकरियों की मनमानी का कॉकटेल जब ढूला तो संचालकों से इल्तजा की गई कि आप भी बर्खास्त हो जाओ और आपके साथियों को भी बर्खास्त कर लो।
2009 में 25 दागी संस्थाओं की जो सूची जारी की गई थी 'आकाशÓ उनमें से एक थी। संस्था के खिलाफ प्राप्त शिकायत और आला अधिकारियों द्वारा दिए गए निर्देश के बाद 22 दिसंबर 2009 को उपायुक्त महेंद्र दीक्षित के मार्गदर्शन में वरिष्ठ सहकारिता निरीक्षक और 'आकाशÓ के प्रभारी जी.डी.परिहार ने प्रमुख अखबारों में विज्ञप्ति जारी की। विज्ञप्ति में लिखा था संस्था की पंजीकृत उपविधि क्र. 7(4) के अनुसार स्वीकृत सदस्य संख्या 350 है जबकि बर्हिगामी अध्यक्षों और संचालक मंडलों द्वारा उपविधियों का उल्लंघन करते हुए 787 सदस्य बनाए गए। स्पष्ट है कि क्र. 350 के बाद के सदस्यों की सदस्यता वैध न होने के कारण समाप्त करने का निर्णय लिया गया है। सात दिन में कोई भी व्यक्ति अपनी आपत्ति सहकारिता विभाग में दर्ज करा सकता है। सात दिन की मियाद के साथ विज्ञप्ति जारी हुए 35 महीने (1077 दिन) से ज्यादा हो चुका है लेकिन आज दिन तक 437 तो दूर एक सदस्य की सदस्यता भी समाप्त नहीं हुई। उलटा, इन्हीं फर्जी सदस्यों के मताधिकार को बरकरार रखते हुए 2011 में संस्था के चुनाव कराए गए। अध्यक्ष सहित जो नौ लोग संचालक के रूप में निर्वाचित हुए वे भी इन्हीं 437 में शामिल हैं। इस बात की शिकायत जब भोपाल तक पहुंची तो 11 जून 2012 को 'आकाशÓ के आकाओं (अध्यक्ष व संचालक) पत्र जारी करते हुए कहा कि प्रावधानों के विपरीत बनाए गए सदस्यों के निष्कासन की कार्रवाई 15 दिन में करके कार्यालय को अवगत कराएं। पत्र में यह भी लिखा कि निर्धारित अवधि में कार्रवाई न होने की दशा में यह मान लिया जाएगा कि आप कार्रवाई करना नहीं चाहते, अत: आपके विरुद्ध सहकारी अधिनियम के प्रावधानों के तहत कार्रवाई की जाएगी।
26 महीने बंद रही फाइल...
22 दिसंबर 2009 को फर्जी सदस्यता समाप्त किए जाने की विज्ञप्ति निकालने के बाद भू-माफियाओं के ईशारे पर अधिकारियों ने फाइल 26 महीने बंद रखी। लगातार शिकायतों के बाद फाइल खुली 15 फरवरी 2009 को जब 2009 में जारी विभिन्न पत्रों का हवाला देकर उपायुक्त महेंद्र दीक्षित ने सहकारिता आयुक्त को पत्र लिखकर कहा कि विज्ञप्ति तो जारी कर दी थी लेकिन संस्था की सदस्यता पंजी प्राप्त न होने, ऑडिट रिपोर्ट में सदस्यों की सूची के आगे पंजीयन क्रमांक, पता व सदस्यता दिए जाने की दिनांक उपलब्ध न होने के कारण फर्जी सदस्यों की शिनाख्त नहीं हो पाई। जब तक शिनाख्ती नहीं होती तब तक सदस्यों की समाप्त किया जाना संभव नहीं है। संस्था सदस्य देवेंद्र तोतला शिकायतों के आधार पर लगातार दबाव बना रहे है इसीलिए वांछित कार्रवाई के लिए मागदर्शन दें।
हाईकोर्ट ने 1994 में ही तय कर दी सदस्य संख्या
सहकारिता उपायुक्त की मांग पर 21 मई 2012 को मार्गदर्शन देते हुए सहकारिता आयुक्त ने स्पष्ट कर दिया कि 13 मई 1994 को एक याचिका (५/९४) के परिपालन में हाईकोर्ट की जबलपुर खण्डपीठ सदस्यों की संख्या तय करते हुए निर्देशित कर चुकी है कि उपविधि के विरुद्ध बने सदस्यों की सदस्यता समाप्त की जाए। इसी आदेश का पालन करते हुए सदस्यता समाप्ति की जार्रवाई की जा सकती है।
मार्गदर्शन मिलने के बाद भी मौन
13 मई 2012 को सहकारिता आयुक्त द्वारा दिए गए स्पष्ट आदेश के बावजूद सदस्यता समाप्त नहीं हुई। उलटा, 5 सितंबर 2009 (ठिक 115 दिन बाद) को सहकारिता उपायुक्त ने 'आकाशÓ के अध्यक्ष को पत्र लिखा और कहा कि सदस्यता समाप्ति से पहले सदस्यों का पक्ष सुना जाएगा। आपत्ति निराकृत होने के बाद अवैध रूप से बने 437 सदस्यों को निष्काशित करने की कार्रवाई पत्र प्राप्ति के बाद 15 दिन में की जाना है। निर्धारित अवधि में कार्रवाई न होने पर आपके खिलाफ कार्रवाई होगी।
15 दिन की सीमा 92 दिन बाद भी अधूरी
5 सितंबर को 15 दिन की मोहलत देकर पत्र जारी किए 92 दिन हो चुके हैं लेकिन अब तक न संचालक मंडल ने सदस्यों की सदस्यता समाप्त की। न ही सहकारिता विभाग ने कार्रवाई न करने पर उनके खिलाफ किसी तरह की कार्रवाई की।
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