Sunday, June 28, 2015

चुनाव अधिकारी का चमत्कार है 'आकाशÓ aakaash

- वरिष्ठ अधिकारियों के मार्गदर्शन में की धांधली
इंदौर. चीफ रिपोर्टर ।
चुनाव के लिए प्रभारी अधिकारी नियुक्त हुए। प्रभारी अधिकारी ने ही मतदाता के रूप में संस्था के सदस्यों की सूची का अंतिम प्रकाशन किया। उन्हीं की मौजूदगी में चुनाव हुए। संचालक मंडल निर्वाचित हुआ। बाद में पता चला जिन सदस्यों की सदस्यता समाप्त की जाना है उन्हीं के दम पर चुनाव हुए और उन्हीं में से संचालक निर्वाचित हुए। अवैधानिक सदस्यों के दम पर चुनाव कराने का चमत्कार दिखाया है सहकारिता विभाग के सहकारिता निरीक्षक संजय कुचनकर ने। उन्होंने यह कारनामा 2011 में हुए आकाश गृह निर्माण सहकारी संस्था के चुनाव के दौरान दिखाया। चुनाव कराने के सालभर बाद जब उनसे इस 'उपलब्धिÓ के बारे में पूछा गया तो उन्होंने कहा अवैध सदस्यों को हटाने की कार्रवाई जारी है।
'आकाशÓ की उपविधि में सदस्यों की संख्या 350 है जबकि सदस्य हैं 787 । 2009 में इनमें से 437 अवैधानिक मानते हुए इन्हें संस्था से बेखल करने के आदेश जारी करने वाले सहकारिता विभाग ने इन्हीं की मौजूदगी में 2011 में संथा के चुनाव करा दिए। चुनाव अधिकारी थे सहकारिता निरीक्षक कुचनकर। कायदे से उन्हें चुनाव कराने से पहले संस्था के वाजिब सदस्यों की सूची बनाना थी लेकिन उन्होंने ऐसा करने के बजाय वैध-अवैध सदस्यों के दम पर ही चुनाव करा दिए। शिकवा-शिकायत के बाद अब जबकि कुचनकर फंसते नजर आ रहे हैं तो वे बहानेबाजी करते नजर आते हैं। कभी कहते हैं जो अवैध सदस्य हैं उन्हें विभाग हटा रहा है। कभी इतना सब कहने के बाद वे कहते हैं मैंने कुछ कहा ही नहीं।
कैसे हो गए चुनाव...
-- 22 दिसंबर 2009 को जब सहकारिता निरीक्षक जी.डी.परिहार ने 437 सदस्यों को संस्था से बेदखल करने की जब विज्ञप्ति निकाल दी थी तो दिसंबर 2011 में कुचनकर ने चुनाव से पहले उन सदस्यों की पात्रता पर आपत्ति क्यों नहीं ली।
-- 15 फरवरी 2012 को उपायुक्त द्वारा आयुक्त सहकारिता को लिखे गए पत्र में लिखा था कि विभाग के पास सदस्यों की संख्या तय करने के लिए सदस्यता सूची नहीं है यानी 2011 में विभाग ने सदस्यता सूची को प्रमाणित किए बिना ही चुनाव कराए।
-- वह भी उस स्थिति में जब विभाग संस्था का सालाना ऑडिट करता है। ऑडिट के दौरान सदस्यों की सूची भी साथ होती है। यदि 2011 में कुचनकर को सूची नहीं मिली तो उन्हें 2008, 09 या 10 की सूची से सदस्यों की संख्या का मिलान कर लेना था जो उन्होंने मिलीभगत के कारण नहीं किया।
-- यदि दिसंबर 2011 में चुनाव के दौरान चुनाव अधिकारी कुचनकर के पास सदस्यों की प्रमाणित सूची थी तो 2012 में उन्हें बेदखल करते वक्त उपायुक्त को वह सूची क्यों नहीं मिली। बार-बार पत्र लिखकर शिकायतकर्ता से ही सूची क्यों मांगी गई।
छूट्टी पर चले गए थे उपायुक्त
विभागीय सूत्रों की मानें तो जिस दिन संस्था के चुनाव हुए उससे एक दिन पहले ही सहकारिता निरीक्षक महेंद्र दीक्षित छूट्टी पर चले गए थे। उनकी गैरमौजूदगी में उन्हीं के निर्देश पर चुनाव की कमान कुचनकर और श्री वर्मा ने संभाली। चुनाव की तारीख तय किए जाने के बाद जब शिकवा-शिकायत का दौर शुरू हुआ तो उपायुक्त ने चुनाव रद्द करने आदेश जारी कर दिया।

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