- इतने भोजन से मिट सकती है तीन लाख लोगों की भूख
- खाने की बर्बादी पर्यावरण को प्रदुषित करने के साथ बीमारी भी फैला रही है
कॉमन इंट्रो..
्रबचपन में हम सभी को सिखाया गया है कि अन्न का अनादर ना करो। बड़ा अफसोस होता है जब शादियों के सीजन में करोड़ों का फूड कचरे के डिब्बे में डाल दिया जाए। हम सजावट से लेकर खाने तक पर लाखों-करोड़ों रुपए खर्च कर देते हैं, लेकिन भोजन डस्टबिन में ना जाए इसे बचाने की कोई कोशिश नहीं होती। अपनी सिटी में शादियों में वेस्ट होने वाला फूड आंकड़ों के लिहाज से काफी गंभीर हो चला है। एक अनुमान के मुताबिक साल में हमारे यहां तीन करोड़ रुपए से अधिक का भोजन डस्टबिन में चला जाता है। ये हाल तब है जब देश में बच्चों की एक बड़ी आबादी कुपोषण का शिकार है।
इंदौर. विनोद शर्मा ।
शादी-समारोह हो या रेस्त्रां की दावत, प्लेट में आधा खाना छोड़ देना लोगों की आदत बन चुका है। ब्रिटेन जैसे संपन्न देश में प्लेट में खाना छोडऩे पर 20 पाउंड का जुर्माना चुकाना पड़ता है, वहीं भारत जैसे विकासशील देश के इंदौर जैसे विकासशील शहर में ही हर दिन 900 क्विंटल से ज्यादा खाना (अनाज व अन्य) वेस्ट हो रहा है। सैकड़ों लोगों को दो वक्त का खाना भी ठीक से नसीब नहीं होता। आंकड़ों के लिहाज से बात करें तो 300 ग्राम के औसत आहार से इतने भोजन में 3 लाख से ज्यादा लोगों (हरदा, अलीराजपुर, श्योपुर, उमरिया की शहरी आबादी से ज्यादा) की भूख मिटाई जा सकती है। भोजन की इस बर्बादी का प्रामाणिक आंकड़ा फिलहाल उपलब्ध नहीं है। यह चिंता और चर्चाओं का आधार अनुमान है। बहरहाल, पानी, प्रकृति और पर्यावरण की तरह भोजन बचाने के लिए भी दुनियाभर में अलग-अलग उपाय खोजे जा रहे हैं। यह बात अलग है कि इंदौर में अब तक ऐसे उपायों का संकट है।
बात इंदौर की तो यहां शादी-समारोह जैसे आयोजनों में 20-25 प्रतिशत खाना बेकार चला जाता है। कैटरर्स बिरादरी इस बर्बादी को कहीं ज्यादा मानती है और आयोजनों में व्यंजनों की अधिकता-विविधता के साथ खाने की आजादी को इसकी एक बड़ी वजह बताती है। जाहिर है जितना ज्यादा बड़ा आयोजन, उतनी ज्यादा बर्बादी। गांव-देहात की अपेक्षा महानगरों और छोटे-बड़े शहरों में बर्बादी ज्यादा है। न सिर्फ इंदौर बल्कि खाना बर्बाद करने की परम्परा दुनियाभर में जोर पकड़ रही है। स्वयं केंद्र सरकार मानती है कि देश में 160 लाख टन अनाज सड़ जाता हो, 22 करोड़ लोग भूखे पेट सोने को मजबूर हों और हर साल हजारों लोग भूख के कारण मौत का शिकार हो रहे हों, वहां खाने की बर्बादी को काबू कर लाखों का पेट भरा जा सकता है।
आमतौर पर खाने की प्लेट में छोड़ दिया गया आहार बेकार हो जाता है, लेकिन जरूरत से ज्यादा बना खाना इसकी एक दूसरी परिभाषा है। भोजन की बर्बादी से आमतौर पर लोग इत्तेफाक नहीं रखते। उनकी मानें तो यदि आयोजन में शामिल हुए सौ लोगों के ऑर्डर में खाना बच गया किंतु वह किसी और के काम आ गया तो इसे बर्बादी कैसे माना जा सकता है।
हर दिन तीन लाख से ज्यादा लोगों का भोजन फिकता है...
-- इंदौर में साढ़े तीन लाख मकान और पांच लाख परिवार हैं। इनमें चार लाख परिवार ऐसे हैं जो जरूरत से ज्यादा खाना बनाते हैं। जरूरत चार की, खाना बना पांच का। 25-50 ही परिवार ऐसे हैं जो सदस्यों की संख्या और उनकी जरूरत के हिसाब से खाना नापतौल कर बनाते हैं। बाकी साढ़े चार लाख में ढ़ाई लाख बासी खाने से परहेज नहीं करते जबकि दो लाख को ताजा खाना पसंद है। ऐसे परिवार बचा खाना पशुओं के आगे डाल देते हैं या डस्टबिन में।
-- इंदौर में 1000 से ज्यादा होटल, रेस्टोरेंट और ढाबें हैं। यहां नाश्ते से लेकर खाना तक सब मिलता है। यहां औसत 25 लोगों का खाना हर दिन बचता है जबकि इतना ही वेस्ट हो जाता है। यहां बासी खाना नहीं चलता। इसीलिए बचा खाना कचरा पेटियों में या मैदान में पॉलिथीन भरकर फेंक दिया जाता है। नगर निगम ने बड़ी होटलों से अनुबंध करके कचरा गाडिय़ां लगा रखी है कचरा उठाने के लिए।
- शादियों में दो तरह से खाना वेस्ट होता है। पहला थालियों में बचे खाने को सीधा डस्टबिन का रुख दिखा दिया जाता है जबकि आर्डर के अनुसार बनवाया खाना भी दस से बीस फीसदी तक बच जाता है जो नुकसान ही जाता है। इस तरह एक शादी में एक हजार लोगों का खाना बना है, तो करीब 100 लोगों का खाना कूड़ेदान में चला जाता है। इंदौर में हर वैवाहिक सत्र में 5,000 से ज्यादा शादियां और 25 हजार से ज्यादा अन्य मांगलिक कार्यक्रम होते हैं। यानी हर साल 30 लाख लोगों के पेट में जा सकने वाला खाना डस्टबिन में चला जाता है।
ऐसे वेस्ट होता है खाना...
- व्यंजनों की अधिकता-विविधता
- खाने की आजादी
- ग्रामीण क्षेत्रों, कस्बों और छोटे शहरों में पंगत के दौरान जबरिया परौगारी।
- घरों में बच्चों को जरूरत से ज्यादा खाना परौसना।
- रूचि के विपरीत भोजन।
- स्वाद का संकट।
वेस्ट रोकने के पारम्परिक तरीके...
- खाना बचे तो फेंकने के बजाय एयर टाइट डिब्बों में रखकर फ्रिज में रख दे ताकि अगले दिन भी गर्म करके खा सकें।
- बड़ी प्लेट में भरकर खाना लेने के बजाय थोड़ी मात्रा में लो। भूख होने पर जरूरत के हिसाब से दुबारा ले लो।
- शादी, पार्टी जैसे मौकों पर भी मन-पसंद खाने के बावजूद अपनी जरूरत के हिसाब से खाना लें।
- अपनी प्लेट में इक_ा खाना न डालकर थोड़ा-थोड़ा टेस्ट लेते हुए खाने की वैराइटी का मजा लें।
- बचा खाना खाने से कतराते वाले इससे नई डिश बनाकर खा सकते हैं। जैसे बचे चावल में तुम सब्जियां मिलवाकर फ्राइड राइस बना सकते हैं। बटर खिचड़ी बना सकते हैं। स्टफ्ड परांठा बनवा सकते हैं।
- खाने के कचरे को रीसाइकल कर खाद बना सकते हो। अगर खाने की चीजें खराब हो भी जाती हैं तो उन्हें डस्टबिन में न फेंककर अपने घर के पास मिट्टी में गढ्ढा खोद कर खाना उसमें डाल सकते हो।
- सूखी रोटियों को पोहे की तरह बना लें जिसे कुस्करा कहते हैं।
- जितने सदस्य हैं उनकी डाइट के हिसाब से बने खाना।
- यदि आटा बच गया है तो उसे गिला कपड़े से ढंक दें ताकि सुबह या शाम ताजा रोटी खा सकें।
- दावत में विविधता कम हो।
- पार्टियों में उतना ही लें, जितना आप खा सकेँ।
- खाने वालों की रूचि के हिसाब से बने खाना
- ज्यादा मसालों का प्रयोग न हो।
- दावत में बचा खाना अनाथालय या अस्पतालों में भर्ती मरीजों के परिजन को खिलाया जा सकता है। इसके लिए शहर में कुछ एनजीओ काम कर रहे हैं जिनकी मदद से खाना जरूरतमंदों तक पहुंचा सकते हैं।
- गौशाला या अन्य पशुओं को खिला दें।
खाना कैसे खराब कर रहा है पर्यावरण
-- होटल, रेस्टोरेट और मैरेज गार्डन बचा खाना आसपास के खाली मैदान में फेंक देते हैं। या सड़क किनारे।
-- ज्यादातर खाना रात में फेंका जाता है जिस सुबह तक मक्खियां भिनभिनाने लगती हैं।
-- निगम जब तक उठाती है तब तक कचरा उड़ जाता है या कचरा बिनने वाले और मवैशी फैला जाते हैं।
-- कई ऐसे स्पॉट है जहां कचरा दो-दो दिन तक नहीं उठता। ऐसे में यही कचरा बदबू तो मारता ही है, बीमारी का घर भी बन जाता है।
पहल...
भारतीय लोक प्रशासन संस्थान (आईआईपीए) महानगरों में सर्वेक्षण का काम शुरू करने वाला है। जहाँ तक बर्बादी की परिभाषा में अंतर का सवाल है इसे लेकर प्रशासनए मंत्रालय और सिविल सोसायटी के बीच चर्चाओं का दौर शुरू हो गया है।
पाठ्यक्रम में शामिल हो खाने के सलीके...
खाद्य मंत्रालय ने मानव संसाधन विकास मंत्री और राज्य के शिक्षा मंत्रियों को चि_ी लिखी है। इसमें कहा गया है कि खाने की बर्बादी को बतौर अध्याय पाठ्यक्रम में शामिल किया जाना चाहिए ताकि बच्चों को इस बारे में जागरूक किया जा सके। गरज यह भी है कि भविष्य में यह जागरूकता सीख का काम करेगी।
प्लेट में खाना, 20 पाउंट का जुर्माना
ब्रिटेन स्थित चीन का एक रेस्तरां लोगों को ऐसा बुफे परोस रहा है जिसमें उन्हें वो सभी व्यंजन परोसे जाते हैं जिन्हें वे खा सकते हैंए लेकिन इसके साथ ही प्लेट में छोडऩे पर 20 पाउंड का जुर्माना भी लगाया जाता है।
'ऑपरेशन एम्पटी प्लेटÓ
चीन में प्लेट में खाना छोडऩे जैसी हिमाकत करने वालों को शर्मिंदा होना पड़ता है। इसके लिए शु चीचुन बीड़ा उठाकर 'ऑपरेशन एम्पटी प्लेटÓ मुहिम छेड़ चुके हैं। इस ऑनलाइन मुहिम के जरिए चीचुन खाना छोडऩे वालों की फोटो सोशल साइट्स पर पोस्ट कर देते हैं। शुरुआत में ऑपरेशन विफल रहा बाद में लोगों ने जबरदस्त तवज्जो दी। अब समर्थकों की संख्या सैकड़ों में पहुंच चुकी है।
कहते हैं आंकड़े...
स्थानीय
नगर निगम के सफाईकर्मियों के अनुसार कचरा पेटियों तक पहुंचने वाले कचरे में 50 फीसदी खाना या खाने से संबंधित होता है। यदि एक दिन में ट्रेंचिंग ग्राउंड तक 700 टन कचरा पहुंच रहा है तो इसमें से 350 टन खाना या खाने से संबंधित है।
- हर दिन 50 से 60 क्विंटल फल-सब्जी बर्बाद होती है। ज्यादातर खराब फल-सब्जी मंडियों के बाहर ही मवैशियों को खिला देते हैं। बाकी वहीं सड़कर खत्म हो जाता है या आने-जाने वालों के टायर-पैरों में चिपककर आगे बढ़ जाता है।
- इंदौर में फल-सब्जी के वेस्ट से 5-7 स्थानों पर ऑर्गेनिक खाद बनने लगी है लेकिन अभी लोग पूरी तरह इसे लेकर जागरूक नहीं है।
- यदि एक व्यक्ति के 300 ग्राम खाने की औसत कीमत 30 रुपए मानें तो एक दिन में बर्बाद होने वाले 900 क्विंटल खाने की कीमत 90 लाख रुपए होगी। यानी हम 32.85 करोड़ रुपए का खाना हर साल कचरे की तरह फेंक देते हैं।
- एक सफाईकर्मी 50 किलोग्राम कचरा उठाता है यानी 90 हजार किलोग्राम खाद्य कचरे को उठाने के लिए 1800 सफाईकर्मी लगते हैं जिनका वार्षिक वेतन 11.80 करोड़ रुपए है। खाने की बर्बादी रोककर इनसे दूसरा काम ले सकते हैं या फिर 11.80 करोड़ रुपए शहर के लिए बचा सकते हैं।
-- एक शहरी मिडिल क्लास फैमिली खाने-पीने की चीजों पर एक महीने में 15 हजार रुपये खर्च करती है तो इसमें से 750 रुपये/प्रतिमाह और ९००० रुपए/साल का सामान किसी न किसी तरह वेस्ट हो जाता है। अगर हर महीने 500 रुपये की सेविंग करके उसे किसी ऐसे प्लान में इन्वेस्ट किया जाएए जिसमें 12 फीसदी का सालाना रिटर्न मिले तो 40 साल में 48 लाख रुपये की मोटी रकम बचेगी।
राष्ट्रीय-अंतरराष्ट्रीय
-- एक साल में करीब 130 करोड़ टन खाद्य सामग्री या तो बेकार चली जाती है या फिर उसे फेंक दिया जाता है। यह कुल उत्पादन का एक-तिहाई है।
-- विकासशील देशों में 63 करोड़ टन और औद्योगिक देशों में 67 करोड़ टन खाने की बर्बादी होती है।
-- अफ्रीका महाद्वीप में हर साल करीब 23 करोड़ टन भोजन का उत्पादन होता है, जबकि अमीर देशों में 22.2 करोड़ टन खाना बर्बाद हो जाता है। यानी, जितना खाना एक महाद्वीप में रहने वाले लोगों की सालभर की भूख मिटाता है उतना तो अमीर मुल्क बर्बाद कर देते हैं।
-- एक अन्य अध्ययन के अनुसार अमेरिका और ब्रिटेन में संपन्न लोग जितना भोजन बेकार करते हैं उससे 1.5 अरब लोगों की भूख मिटाई जा सकती है।
-- गांव-देहात की अपेक्षा महानगरों और छोट-बड़े शहरों में बर्बादी अधिक है।
अलग-अलग रिपोर्ट्स....
''दुनियाभर में एक साल में करीब 130 करोड़ टन खाद्य सामग्री या तो बेकार चली जाती है या फिर उसे फेंक दिया जाता है। यह कुल उत्पादन का एक तिहाई है।ÓÓ
फूड एंड एग्रीकल्चर ऑर्गेनाइजेशन (एफएओ) की रिपोर्ट
''खाने की बर्बादी एक शहरी आदत है जो धीरे-धीरे ग्रामीण इलाकों में भी फैलती जा रही है। शादी में शो ऑफ बढ़ा है, इस वजह से खाने की बर्बादी भी बढ़ी है। सर्वे में 93.4 फीसदी लोगों ने कहा कि सोशल गैदरिंग में खाना बर्बाद होता है। 72.6 फीसदी लोगों ने कहा कि सबसे ज्यादा खाना तब बर्बाद होता है जब डिश ज्यादा होती हैं। 67.9 फीसदी ने कहा कि लोग ज्यादा खाना ले लेते हैं लेकिन उतना खा नहीं पाते, जिस वजह से बर्बादी होती है। 67.3 फीसदी ने कहा कि लोग इसके प्रति लापरवाह होते हैं उन्हें फर्क नहीं पड़ता कि खाना बर्बाद हो रहा है। 83.2 फीसदी लोगों का मानना है कि शो ऑफ के चक्कर में ज्यादा खाना बर्बाद हो रहा है। जिस तरह फूड सर्व होता है वह भी बर्बादी की वजह है। 75 फीसदी लोगों ने कहा कि बुफै सिस्टम की वजह से ज्यादा खाना बर्बाद होता है। 44.1 फीसदी लोगों ने कहा कि जहां फैमिली मेंबर खाना बनाते और सर्व करते हैं वहां खाना बर्बाद नहीं होता है। मिडल क्लास के फंक्शन में मेन कोर्स में 10.12 डिश होती हैं जबकि हाई.फाई फंक्शन में मेन्यू में 100.150 चीजें होती हैं।ÓÓ
इंडियन इंस्टिट्यूट ऑफ पब्लिक एडमिनिस्ट्रेशन (आईआईपीए) की रिपोर्ट
- खाने की बर्बादी पर्यावरण को प्रदुषित करने के साथ बीमारी भी फैला रही है
कॉमन इंट्रो..
्रबचपन में हम सभी को सिखाया गया है कि अन्न का अनादर ना करो। बड़ा अफसोस होता है जब शादियों के सीजन में करोड़ों का फूड कचरे के डिब्बे में डाल दिया जाए। हम सजावट से लेकर खाने तक पर लाखों-करोड़ों रुपए खर्च कर देते हैं, लेकिन भोजन डस्टबिन में ना जाए इसे बचाने की कोई कोशिश नहीं होती। अपनी सिटी में शादियों में वेस्ट होने वाला फूड आंकड़ों के लिहाज से काफी गंभीर हो चला है। एक अनुमान के मुताबिक साल में हमारे यहां तीन करोड़ रुपए से अधिक का भोजन डस्टबिन में चला जाता है। ये हाल तब है जब देश में बच्चों की एक बड़ी आबादी कुपोषण का शिकार है।
इंदौर. विनोद शर्मा ।
शादी-समारोह हो या रेस्त्रां की दावत, प्लेट में आधा खाना छोड़ देना लोगों की आदत बन चुका है। ब्रिटेन जैसे संपन्न देश में प्लेट में खाना छोडऩे पर 20 पाउंड का जुर्माना चुकाना पड़ता है, वहीं भारत जैसे विकासशील देश के इंदौर जैसे विकासशील शहर में ही हर दिन 900 क्विंटल से ज्यादा खाना (अनाज व अन्य) वेस्ट हो रहा है। सैकड़ों लोगों को दो वक्त का खाना भी ठीक से नसीब नहीं होता। आंकड़ों के लिहाज से बात करें तो 300 ग्राम के औसत आहार से इतने भोजन में 3 लाख से ज्यादा लोगों (हरदा, अलीराजपुर, श्योपुर, उमरिया की शहरी आबादी से ज्यादा) की भूख मिटाई जा सकती है। भोजन की इस बर्बादी का प्रामाणिक आंकड़ा फिलहाल उपलब्ध नहीं है। यह चिंता और चर्चाओं का आधार अनुमान है। बहरहाल, पानी, प्रकृति और पर्यावरण की तरह भोजन बचाने के लिए भी दुनियाभर में अलग-अलग उपाय खोजे जा रहे हैं। यह बात अलग है कि इंदौर में अब तक ऐसे उपायों का संकट है।
बात इंदौर की तो यहां शादी-समारोह जैसे आयोजनों में 20-25 प्रतिशत खाना बेकार चला जाता है। कैटरर्स बिरादरी इस बर्बादी को कहीं ज्यादा मानती है और आयोजनों में व्यंजनों की अधिकता-विविधता के साथ खाने की आजादी को इसकी एक बड़ी वजह बताती है। जाहिर है जितना ज्यादा बड़ा आयोजन, उतनी ज्यादा बर्बादी। गांव-देहात की अपेक्षा महानगरों और छोटे-बड़े शहरों में बर्बादी ज्यादा है। न सिर्फ इंदौर बल्कि खाना बर्बाद करने की परम्परा दुनियाभर में जोर पकड़ रही है। स्वयं केंद्र सरकार मानती है कि देश में 160 लाख टन अनाज सड़ जाता हो, 22 करोड़ लोग भूखे पेट सोने को मजबूर हों और हर साल हजारों लोग भूख के कारण मौत का शिकार हो रहे हों, वहां खाने की बर्बादी को काबू कर लाखों का पेट भरा जा सकता है।
आमतौर पर खाने की प्लेट में छोड़ दिया गया आहार बेकार हो जाता है, लेकिन जरूरत से ज्यादा बना खाना इसकी एक दूसरी परिभाषा है। भोजन की बर्बादी से आमतौर पर लोग इत्तेफाक नहीं रखते। उनकी मानें तो यदि आयोजन में शामिल हुए सौ लोगों के ऑर्डर में खाना बच गया किंतु वह किसी और के काम आ गया तो इसे बर्बादी कैसे माना जा सकता है।
हर दिन तीन लाख से ज्यादा लोगों का भोजन फिकता है...
-- इंदौर में साढ़े तीन लाख मकान और पांच लाख परिवार हैं। इनमें चार लाख परिवार ऐसे हैं जो जरूरत से ज्यादा खाना बनाते हैं। जरूरत चार की, खाना बना पांच का। 25-50 ही परिवार ऐसे हैं जो सदस्यों की संख्या और उनकी जरूरत के हिसाब से खाना नापतौल कर बनाते हैं। बाकी साढ़े चार लाख में ढ़ाई लाख बासी खाने से परहेज नहीं करते जबकि दो लाख को ताजा खाना पसंद है। ऐसे परिवार बचा खाना पशुओं के आगे डाल देते हैं या डस्टबिन में।
-- इंदौर में 1000 से ज्यादा होटल, रेस्टोरेंट और ढाबें हैं। यहां नाश्ते से लेकर खाना तक सब मिलता है। यहां औसत 25 लोगों का खाना हर दिन बचता है जबकि इतना ही वेस्ट हो जाता है। यहां बासी खाना नहीं चलता। इसीलिए बचा खाना कचरा पेटियों में या मैदान में पॉलिथीन भरकर फेंक दिया जाता है। नगर निगम ने बड़ी होटलों से अनुबंध करके कचरा गाडिय़ां लगा रखी है कचरा उठाने के लिए।
- शादियों में दो तरह से खाना वेस्ट होता है। पहला थालियों में बचे खाने को सीधा डस्टबिन का रुख दिखा दिया जाता है जबकि आर्डर के अनुसार बनवाया खाना भी दस से बीस फीसदी तक बच जाता है जो नुकसान ही जाता है। इस तरह एक शादी में एक हजार लोगों का खाना बना है, तो करीब 100 लोगों का खाना कूड़ेदान में चला जाता है। इंदौर में हर वैवाहिक सत्र में 5,000 से ज्यादा शादियां और 25 हजार से ज्यादा अन्य मांगलिक कार्यक्रम होते हैं। यानी हर साल 30 लाख लोगों के पेट में जा सकने वाला खाना डस्टबिन में चला जाता है।
ऐसे वेस्ट होता है खाना...
- व्यंजनों की अधिकता-विविधता
- खाने की आजादी
- ग्रामीण क्षेत्रों, कस्बों और छोटे शहरों में पंगत के दौरान जबरिया परौगारी।
- घरों में बच्चों को जरूरत से ज्यादा खाना परौसना।
- रूचि के विपरीत भोजन।
- स्वाद का संकट।
वेस्ट रोकने के पारम्परिक तरीके...
- खाना बचे तो फेंकने के बजाय एयर टाइट डिब्बों में रखकर फ्रिज में रख दे ताकि अगले दिन भी गर्म करके खा सकें।
- बड़ी प्लेट में भरकर खाना लेने के बजाय थोड़ी मात्रा में लो। भूख होने पर जरूरत के हिसाब से दुबारा ले लो।
- शादी, पार्टी जैसे मौकों पर भी मन-पसंद खाने के बावजूद अपनी जरूरत के हिसाब से खाना लें।
- अपनी प्लेट में इक_ा खाना न डालकर थोड़ा-थोड़ा टेस्ट लेते हुए खाने की वैराइटी का मजा लें।
- बचा खाना खाने से कतराते वाले इससे नई डिश बनाकर खा सकते हैं। जैसे बचे चावल में तुम सब्जियां मिलवाकर फ्राइड राइस बना सकते हैं। बटर खिचड़ी बना सकते हैं। स्टफ्ड परांठा बनवा सकते हैं।
- खाने के कचरे को रीसाइकल कर खाद बना सकते हो। अगर खाने की चीजें खराब हो भी जाती हैं तो उन्हें डस्टबिन में न फेंककर अपने घर के पास मिट्टी में गढ्ढा खोद कर खाना उसमें डाल सकते हो।
- सूखी रोटियों को पोहे की तरह बना लें जिसे कुस्करा कहते हैं।
- जितने सदस्य हैं उनकी डाइट के हिसाब से बने खाना।
- यदि आटा बच गया है तो उसे गिला कपड़े से ढंक दें ताकि सुबह या शाम ताजा रोटी खा सकें।
- दावत में विविधता कम हो।
- पार्टियों में उतना ही लें, जितना आप खा सकेँ।
- खाने वालों की रूचि के हिसाब से बने खाना
- ज्यादा मसालों का प्रयोग न हो।
- दावत में बचा खाना अनाथालय या अस्पतालों में भर्ती मरीजों के परिजन को खिलाया जा सकता है। इसके लिए शहर में कुछ एनजीओ काम कर रहे हैं जिनकी मदद से खाना जरूरतमंदों तक पहुंचा सकते हैं।
- गौशाला या अन्य पशुओं को खिला दें।
खाना कैसे खराब कर रहा है पर्यावरण
-- होटल, रेस्टोरेट और मैरेज गार्डन बचा खाना आसपास के खाली मैदान में फेंक देते हैं। या सड़क किनारे।
-- ज्यादातर खाना रात में फेंका जाता है जिस सुबह तक मक्खियां भिनभिनाने लगती हैं।
-- निगम जब तक उठाती है तब तक कचरा उड़ जाता है या कचरा बिनने वाले और मवैशी फैला जाते हैं।
-- कई ऐसे स्पॉट है जहां कचरा दो-दो दिन तक नहीं उठता। ऐसे में यही कचरा बदबू तो मारता ही है, बीमारी का घर भी बन जाता है।
पहल...
भारतीय लोक प्रशासन संस्थान (आईआईपीए) महानगरों में सर्वेक्षण का काम शुरू करने वाला है। जहाँ तक बर्बादी की परिभाषा में अंतर का सवाल है इसे लेकर प्रशासनए मंत्रालय और सिविल सोसायटी के बीच चर्चाओं का दौर शुरू हो गया है।
पाठ्यक्रम में शामिल हो खाने के सलीके...
खाद्य मंत्रालय ने मानव संसाधन विकास मंत्री और राज्य के शिक्षा मंत्रियों को चि_ी लिखी है। इसमें कहा गया है कि खाने की बर्बादी को बतौर अध्याय पाठ्यक्रम में शामिल किया जाना चाहिए ताकि बच्चों को इस बारे में जागरूक किया जा सके। गरज यह भी है कि भविष्य में यह जागरूकता सीख का काम करेगी।
प्लेट में खाना, 20 पाउंट का जुर्माना
ब्रिटेन स्थित चीन का एक रेस्तरां लोगों को ऐसा बुफे परोस रहा है जिसमें उन्हें वो सभी व्यंजन परोसे जाते हैं जिन्हें वे खा सकते हैंए लेकिन इसके साथ ही प्लेट में छोडऩे पर 20 पाउंड का जुर्माना भी लगाया जाता है।
'ऑपरेशन एम्पटी प्लेटÓ
चीन में प्लेट में खाना छोडऩे जैसी हिमाकत करने वालों को शर्मिंदा होना पड़ता है। इसके लिए शु चीचुन बीड़ा उठाकर 'ऑपरेशन एम्पटी प्लेटÓ मुहिम छेड़ चुके हैं। इस ऑनलाइन मुहिम के जरिए चीचुन खाना छोडऩे वालों की फोटो सोशल साइट्स पर पोस्ट कर देते हैं। शुरुआत में ऑपरेशन विफल रहा बाद में लोगों ने जबरदस्त तवज्जो दी। अब समर्थकों की संख्या सैकड़ों में पहुंच चुकी है।
कहते हैं आंकड़े...
स्थानीय
नगर निगम के सफाईकर्मियों के अनुसार कचरा पेटियों तक पहुंचने वाले कचरे में 50 फीसदी खाना या खाने से संबंधित होता है। यदि एक दिन में ट्रेंचिंग ग्राउंड तक 700 टन कचरा पहुंच रहा है तो इसमें से 350 टन खाना या खाने से संबंधित है।
- हर दिन 50 से 60 क्विंटल फल-सब्जी बर्बाद होती है। ज्यादातर खराब फल-सब्जी मंडियों के बाहर ही मवैशियों को खिला देते हैं। बाकी वहीं सड़कर खत्म हो जाता है या आने-जाने वालों के टायर-पैरों में चिपककर आगे बढ़ जाता है।
- इंदौर में फल-सब्जी के वेस्ट से 5-7 स्थानों पर ऑर्गेनिक खाद बनने लगी है लेकिन अभी लोग पूरी तरह इसे लेकर जागरूक नहीं है।
- यदि एक व्यक्ति के 300 ग्राम खाने की औसत कीमत 30 रुपए मानें तो एक दिन में बर्बाद होने वाले 900 क्विंटल खाने की कीमत 90 लाख रुपए होगी। यानी हम 32.85 करोड़ रुपए का खाना हर साल कचरे की तरह फेंक देते हैं।
- एक सफाईकर्मी 50 किलोग्राम कचरा उठाता है यानी 90 हजार किलोग्राम खाद्य कचरे को उठाने के लिए 1800 सफाईकर्मी लगते हैं जिनका वार्षिक वेतन 11.80 करोड़ रुपए है। खाने की बर्बादी रोककर इनसे दूसरा काम ले सकते हैं या फिर 11.80 करोड़ रुपए शहर के लिए बचा सकते हैं।
-- एक शहरी मिडिल क्लास फैमिली खाने-पीने की चीजों पर एक महीने में 15 हजार रुपये खर्च करती है तो इसमें से 750 रुपये/प्रतिमाह और ९००० रुपए/साल का सामान किसी न किसी तरह वेस्ट हो जाता है। अगर हर महीने 500 रुपये की सेविंग करके उसे किसी ऐसे प्लान में इन्वेस्ट किया जाएए जिसमें 12 फीसदी का सालाना रिटर्न मिले तो 40 साल में 48 लाख रुपये की मोटी रकम बचेगी।
राष्ट्रीय-अंतरराष्ट्रीय
-- एक साल में करीब 130 करोड़ टन खाद्य सामग्री या तो बेकार चली जाती है या फिर उसे फेंक दिया जाता है। यह कुल उत्पादन का एक-तिहाई है।
-- विकासशील देशों में 63 करोड़ टन और औद्योगिक देशों में 67 करोड़ टन खाने की बर्बादी होती है।
-- अफ्रीका महाद्वीप में हर साल करीब 23 करोड़ टन भोजन का उत्पादन होता है, जबकि अमीर देशों में 22.2 करोड़ टन खाना बर्बाद हो जाता है। यानी, जितना खाना एक महाद्वीप में रहने वाले लोगों की सालभर की भूख मिटाता है उतना तो अमीर मुल्क बर्बाद कर देते हैं।
-- एक अन्य अध्ययन के अनुसार अमेरिका और ब्रिटेन में संपन्न लोग जितना भोजन बेकार करते हैं उससे 1.5 अरब लोगों की भूख मिटाई जा सकती है।
-- गांव-देहात की अपेक्षा महानगरों और छोट-बड़े शहरों में बर्बादी अधिक है।
अलग-अलग रिपोर्ट्स....
''दुनियाभर में एक साल में करीब 130 करोड़ टन खाद्य सामग्री या तो बेकार चली जाती है या फिर उसे फेंक दिया जाता है। यह कुल उत्पादन का एक तिहाई है।ÓÓ
फूड एंड एग्रीकल्चर ऑर्गेनाइजेशन (एफएओ) की रिपोर्ट
''खाने की बर्बादी एक शहरी आदत है जो धीरे-धीरे ग्रामीण इलाकों में भी फैलती जा रही है। शादी में शो ऑफ बढ़ा है, इस वजह से खाने की बर्बादी भी बढ़ी है। सर्वे में 93.4 फीसदी लोगों ने कहा कि सोशल गैदरिंग में खाना बर्बाद होता है। 72.6 फीसदी लोगों ने कहा कि सबसे ज्यादा खाना तब बर्बाद होता है जब डिश ज्यादा होती हैं। 67.9 फीसदी ने कहा कि लोग ज्यादा खाना ले लेते हैं लेकिन उतना खा नहीं पाते, जिस वजह से बर्बादी होती है। 67.3 फीसदी ने कहा कि लोग इसके प्रति लापरवाह होते हैं उन्हें फर्क नहीं पड़ता कि खाना बर्बाद हो रहा है। 83.2 फीसदी लोगों का मानना है कि शो ऑफ के चक्कर में ज्यादा खाना बर्बाद हो रहा है। जिस तरह फूड सर्व होता है वह भी बर्बादी की वजह है। 75 फीसदी लोगों ने कहा कि बुफै सिस्टम की वजह से ज्यादा खाना बर्बाद होता है। 44.1 फीसदी लोगों ने कहा कि जहां फैमिली मेंबर खाना बनाते और सर्व करते हैं वहां खाना बर्बाद नहीं होता है। मिडल क्लास के फंक्शन में मेन कोर्स में 10.12 डिश होती हैं जबकि हाई.फाई फंक्शन में मेन्यू में 100.150 चीजें होती हैं।ÓÓ
इंडियन इंस्टिट्यूट ऑफ पब्लिक एडमिनिस्ट्रेशन (आईआईपीए) की रिपोर्ट
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