- निपानिया के किसानों का आरोप, डराने के लिए फर्जी पुलिस सहायता केंद्र बनाकर बैठा दिए बंदुकधारी चौकीदार
- सिक्कों की चमक से अधिकारियों की आंख बंद
- पहले बहु और बाद में बेटियों के नाम पर किया खेल
इंदौर. विनोद शर्मा ।
अपने पैसों के दम पर जैन समाज की राजनीति में हलचल मचाते आ रहे तथाकथित समाजसेवी भरत मोदी निपानिया के गरीब किसानों की जमीन पर अपनी बेटियों के नाम की तख्ती ठोके बैठे हैं। तहसील न्यायालय, हाईकोर्ट की इंदौर खण्डपीठ और राजस्व मंडल ग्वालियर से फैसला होने के बाद प्रशासन नामांतरण रद्द करके भी किसानों को कब्जा नहीं दिला पाया। उधर, किसानों पर मनोवैज्ञानिक दबाव डालने के लिए मोदी ने विवादित जमीन पर पुलिस सहायता केंद्र बना दिया जो उनके सुरक्षाकर्मियों की आरामगाह बनकर ही रह गया है। मोदी की मनमानी को किसानों ने चुनौती दी लेकिन सिक्कों की खनक के बीच कोई कार्रवाई की हिम्मत अधिकारी नहीं जुटा पाए। हालांकि मोदी का कहना है कि जमीन मेरी और मालिकाना हक के सभी दस्तावेज है मेरे पास।
मामला बायपास से लगी ग्राम निपानिया की पौने तीन एकड़ जमीन (खसरा नं. 192/1/1, 192/1/2, 192/1/2/1, 192/2) का है जो कि राजस्व दस्तावेजों में किसान बजेसिंह, छतरसिंह, रामसिंह, मोहतमबाई पिता भेरूसिंह , तेजूबाई पति भेरूसिंह, योगेश, रवि पिता मेहताबसिंह और सावित्री पति मेहताबसिंह के नाम दर्ज है। संशोधन न्यायालय तहसीलदार, तहसील इन्दौर के राजस्व प्रकरण क्रमांक 54/अ 6 अ/13-14 मामले में 28 जनवरी 2014 को दिए आदेश के बाद हुआ। इसका राजस्व दस्तावेजों में स्पष्ट उल्लेख है। चार महीने बीत चुके है लेकिन किसान को उसकी जमीन का कब्जा न तहसीलदार दिला सके। न ही प्रशासन के आला अधिकारी। जमीन 10 करोड़ की है।
बड़े-बड़े अधिकारियों को अपने पैसों की चमक से अंधा करने वाले मोदी ने किसानों के पक्ष में फैसला होने के बाद जमीन पर पहले तार फैंसिंग की और फिर बंदूकधारी चौकीदार बैठा दिए ताकि किसान परिवार जमीन के आसपास भी न भटक सके। कोई किसानों की आवाज बुलंद न कर सके इसके लिए मोदी ने विवादित जमीन पर पुलिस सहायता केंद्र तान दिया जहां आज दिन तक पुलिसकर्मी नजर नहीं आए। हां, दिनभर जमीन की रखवाली करने वाले चौकीदार जरूर इस सहायता केंद्र की शोभा बढ़ाते देखे जा सकते हैं। मोदी की मनमानी से उपजे पुलिस सहायता केद्र को लसूड़िया पुलिस सिरे से खारिज कर रही है।
यह है कब्जे की कहानी...
1950 में सर्वे नं. 192 रकबा 1.457 हेक्टेयर की कृषि भूमि कुअरजी की मौत के बाद उनके बेटे भेरूसिंह के नाम से अंकित की गई थी। इसके बाद बिना किसी सरकारी आदेश और बिना रजिस्टर्ड दस्तावेजों और पटवारी की मदद के बल पर 24 जनवरी 1979 को खजराना के रुस्तम पिता नबीबक्ष नायता पटेल के नाम पर हो गई। 1995 में पटेल के पारिवारिक बटवारे के बाद जमीन उनके भाई याकुब और उस्मान के बीच बराबर बट गई। 26 नवंबर 1996 को दो रजिस्टर्ड सेल डीड के माध्यम से याकुब और उस्मान ने जमीन एसीए डेवलपर्स प्रावइवेट लिमिटेड तर्फे डायरेक्टर बायपास मोदी पति आशीष मोदी ‘जो कि भरतकुमार मोदी के बेटे हैं’, के नाम कर दी गई। वर्ष 2000 में पायल पति आशीष मोदी ने जमीन अपनी ननंद और मोदी की बेटी रूपाली खेमा पति रश्मिकांत खेमा और रचना पति संजय गोयल को बेच दी। 2003 में जमीन का एक हिस्सा रितू पति नीरज सिंगल को दान दे दिया गया जो कि रुपाली और रचना की तीसरी बहन है। सारा खेल फर्जी दस्तावेजों के दम पर हुआ।
कैसे हुआ खुलासा...
18 फरवरी 2013 को भेरूसिंह पिता कुअरजी के सभी वारिसों ने तहसीलदार के सामने मोदी के मालिकाना हक को चुनौती दी और संशोधन की मांग की। प्रकरण को वापस लेने के लिए मोदी परिवार ने हर तरह के हथकण्डे आजमाए लेकिन बात नहीं बनी। वे और पटेल परिवार 24 जनवरी 1979 को किसानों से खरीदी के ओरिजनल दस्तावेज पेश नहीं कर सके। इस प्रकरण में मोदी राजस्व बोर्ड ग्वालियर और हाईकोर्ट, इंदौर भी जा चुके हैं। हर बार वे समयसीमा बढ़वाने की बात करते रहे। कामयाब नहीं हुए।
बेची थी 0.344 और कब्जा ली 1.457 हेक्टेयर...
हमारे पूर्वज ने साल 1976 में गांव की 1.457 हेक्टयेर जमीन में से 0.344 हेक्टेयर रुस्तम को बेची थी, लेकिन उन्होंने धोखे से पूरी जमीन ही नामांतरित करा ली जो 1996 में भरत मोदी की कंपनी एबी डवलपर्स को बेच दी गई। मोदी ने जमीन पहले बहु, फिर दो बेटी और दोनों बेटियों के हिस्से में से कुछ तीसरी बेटी को दान करवा दी। अब तक फैसले हमारे पक्ष में हुए हैं इसके बाद से ही मोदी ने वहां कई बदमाशों को बसा दिया और हम जमीन पर कब्जा लेने जाते हैं तो वहां हमें धमकाया जाता है।
बजेसिंह, छतरसिंह, रामसिंह, मोहतमबाई पिता भेरूसिंह , तेजूबाई पति भेरूसिंह, योगेश, रवि पिता मेहताबसिंह, सावित्री पति मेहताबसिंह
यह जमीन है मोदी के पास...
निपानिया की पौने तीन एकड़ जमीन पर आपने कब्जा किया है?
नहीं, जमीन मेरी है। मेरे पास उसके दस्तावेज है।
फिर जमीन किसानों के नाम कैसे चढ़ गई?
तहसीलदार ने गलत किया। 38 साल बाद किसानों को अपनी जमीन याद आई और तहसीलदार ने एक ही रात में नामांतरण कर दिया।
आपने तहसीलदार के खिलाफ शिकायत क्यों नहीं की?
उसने गलत किया है, वह तो यूं ही निपट जाएगा।
Ñजमीन पर पुलिस सहायता केंद्र आपने बनवाया है?
नहीं, मैं क्यों बनवाऊंगा। पुलिस ने ही बनवाया होगा।
वहां पुलिसकर्मी तो बैठते ही नहीं है?
वह तो घुमते रहते हैं। उनके पास एक काम थोड़ी है।
आज तो वहां आपके चौकीदार सोये थे।
अब खाली रहती है तो कोई भी सो सकता है।
भरत मोदी, उद्योगपति
कोई पुलिस सहायता केंद्र नहीं है थाना क्षेत्र में...
क्या बायपास पर लसूÞिड़या पुलिस का कोई सहायता केंद्र है?
नहीं, अभी नहीं है।
सहायता केंद्र की जरूरत है?
हां, बाज घुमता रहता है वहां। थोड़ी बैठने की व्यवस्था हो जाए तो बढ़िया।
अब तक किसी ने बनाकर तो नहीं दे दिया?
अभी नहीं दिया कोशिश है कि सौजन्य से कोई बनाकर दे दे।
क्या किसी विवादित जमीन पर केंद्र बन सकता है?
बिल्कुल नहीं।
भरत मोदी और किसान विवाद की जानकारी है आपको?
नहीं, सूना है मामला कोर्ट में है।
नरेंद्र गेहवार, थाना प्रभारी
लसूड़िया पुलिस
मेरे समय में केस रजिस्टर्ड हुआ था, आदेश नहीं...
मेरे समय में केस रजिस्टर्ड हुआ था। मैंने सुनवाई का दोनों पक्षों को पूरा मौका दिया। मामला रेवेन्यू बोर्ड ग्वालियर भी गया लेकिन मैंने कोई आदेश नहीं किया। आदेश मेरे बाद वाले तहसीलदार ने किया होगा।
बिहारी सिंह, पूर्व तहसीलदार
- सिक्कों की चमक से अधिकारियों की आंख बंद
- पहले बहु और बाद में बेटियों के नाम पर किया खेल
इंदौर. विनोद शर्मा ।
अपने पैसों के दम पर जैन समाज की राजनीति में हलचल मचाते आ रहे तथाकथित समाजसेवी भरत मोदी निपानिया के गरीब किसानों की जमीन पर अपनी बेटियों के नाम की तख्ती ठोके बैठे हैं। तहसील न्यायालय, हाईकोर्ट की इंदौर खण्डपीठ और राजस्व मंडल ग्वालियर से फैसला होने के बाद प्रशासन नामांतरण रद्द करके भी किसानों को कब्जा नहीं दिला पाया। उधर, किसानों पर मनोवैज्ञानिक दबाव डालने के लिए मोदी ने विवादित जमीन पर पुलिस सहायता केंद्र बना दिया जो उनके सुरक्षाकर्मियों की आरामगाह बनकर ही रह गया है। मोदी की मनमानी को किसानों ने चुनौती दी लेकिन सिक्कों की खनक के बीच कोई कार्रवाई की हिम्मत अधिकारी नहीं जुटा पाए। हालांकि मोदी का कहना है कि जमीन मेरी और मालिकाना हक के सभी दस्तावेज है मेरे पास।
मामला बायपास से लगी ग्राम निपानिया की पौने तीन एकड़ जमीन (खसरा नं. 192/1/1, 192/1/2, 192/1/2/1, 192/2) का है जो कि राजस्व दस्तावेजों में किसान बजेसिंह, छतरसिंह, रामसिंह, मोहतमबाई पिता भेरूसिंह , तेजूबाई पति भेरूसिंह, योगेश, रवि पिता मेहताबसिंह और सावित्री पति मेहताबसिंह के नाम दर्ज है। संशोधन न्यायालय तहसीलदार, तहसील इन्दौर के राजस्व प्रकरण क्रमांक 54/अ 6 अ/13-14 मामले में 28 जनवरी 2014 को दिए आदेश के बाद हुआ। इसका राजस्व दस्तावेजों में स्पष्ट उल्लेख है। चार महीने बीत चुके है लेकिन किसान को उसकी जमीन का कब्जा न तहसीलदार दिला सके। न ही प्रशासन के आला अधिकारी। जमीन 10 करोड़ की है।
बड़े-बड़े अधिकारियों को अपने पैसों की चमक से अंधा करने वाले मोदी ने किसानों के पक्ष में फैसला होने के बाद जमीन पर पहले तार फैंसिंग की और फिर बंदूकधारी चौकीदार बैठा दिए ताकि किसान परिवार जमीन के आसपास भी न भटक सके। कोई किसानों की आवाज बुलंद न कर सके इसके लिए मोदी ने विवादित जमीन पर पुलिस सहायता केंद्र तान दिया जहां आज दिन तक पुलिसकर्मी नजर नहीं आए। हां, दिनभर जमीन की रखवाली करने वाले चौकीदार जरूर इस सहायता केंद्र की शोभा बढ़ाते देखे जा सकते हैं। मोदी की मनमानी से उपजे पुलिस सहायता केद्र को लसूड़िया पुलिस सिरे से खारिज कर रही है।
यह है कब्जे की कहानी...
1950 में सर्वे नं. 192 रकबा 1.457 हेक्टेयर की कृषि भूमि कुअरजी की मौत के बाद उनके बेटे भेरूसिंह के नाम से अंकित की गई थी। इसके बाद बिना किसी सरकारी आदेश और बिना रजिस्टर्ड दस्तावेजों और पटवारी की मदद के बल पर 24 जनवरी 1979 को खजराना के रुस्तम पिता नबीबक्ष नायता पटेल के नाम पर हो गई। 1995 में पटेल के पारिवारिक बटवारे के बाद जमीन उनके भाई याकुब और उस्मान के बीच बराबर बट गई। 26 नवंबर 1996 को दो रजिस्टर्ड सेल डीड के माध्यम से याकुब और उस्मान ने जमीन एसीए डेवलपर्स प्रावइवेट लिमिटेड तर्फे डायरेक्टर बायपास मोदी पति आशीष मोदी ‘जो कि भरतकुमार मोदी के बेटे हैं’, के नाम कर दी गई। वर्ष 2000 में पायल पति आशीष मोदी ने जमीन अपनी ननंद और मोदी की बेटी रूपाली खेमा पति रश्मिकांत खेमा और रचना पति संजय गोयल को बेच दी। 2003 में जमीन का एक हिस्सा रितू पति नीरज सिंगल को दान दे दिया गया जो कि रुपाली और रचना की तीसरी बहन है। सारा खेल फर्जी दस्तावेजों के दम पर हुआ।
कैसे हुआ खुलासा...
18 फरवरी 2013 को भेरूसिंह पिता कुअरजी के सभी वारिसों ने तहसीलदार के सामने मोदी के मालिकाना हक को चुनौती दी और संशोधन की मांग की। प्रकरण को वापस लेने के लिए मोदी परिवार ने हर तरह के हथकण्डे आजमाए लेकिन बात नहीं बनी। वे और पटेल परिवार 24 जनवरी 1979 को किसानों से खरीदी के ओरिजनल दस्तावेज पेश नहीं कर सके। इस प्रकरण में मोदी राजस्व बोर्ड ग्वालियर और हाईकोर्ट, इंदौर भी जा चुके हैं। हर बार वे समयसीमा बढ़वाने की बात करते रहे। कामयाब नहीं हुए।
बेची थी 0.344 और कब्जा ली 1.457 हेक्टेयर...
हमारे पूर्वज ने साल 1976 में गांव की 1.457 हेक्टयेर जमीन में से 0.344 हेक्टेयर रुस्तम को बेची थी, लेकिन उन्होंने धोखे से पूरी जमीन ही नामांतरित करा ली जो 1996 में भरत मोदी की कंपनी एबी डवलपर्स को बेच दी गई। मोदी ने जमीन पहले बहु, फिर दो बेटी और दोनों बेटियों के हिस्से में से कुछ तीसरी बेटी को दान करवा दी। अब तक फैसले हमारे पक्ष में हुए हैं इसके बाद से ही मोदी ने वहां कई बदमाशों को बसा दिया और हम जमीन पर कब्जा लेने जाते हैं तो वहां हमें धमकाया जाता है।
बजेसिंह, छतरसिंह, रामसिंह, मोहतमबाई पिता भेरूसिंह , तेजूबाई पति भेरूसिंह, योगेश, रवि पिता मेहताबसिंह, सावित्री पति मेहताबसिंह
यह जमीन है मोदी के पास...
निपानिया की पौने तीन एकड़ जमीन पर आपने कब्जा किया है?
नहीं, जमीन मेरी है। मेरे पास उसके दस्तावेज है।
फिर जमीन किसानों के नाम कैसे चढ़ गई?
तहसीलदार ने गलत किया। 38 साल बाद किसानों को अपनी जमीन याद आई और तहसीलदार ने एक ही रात में नामांतरण कर दिया।
आपने तहसीलदार के खिलाफ शिकायत क्यों नहीं की?
उसने गलत किया है, वह तो यूं ही निपट जाएगा।
Ñजमीन पर पुलिस सहायता केंद्र आपने बनवाया है?
नहीं, मैं क्यों बनवाऊंगा। पुलिस ने ही बनवाया होगा।
वहां पुलिसकर्मी तो बैठते ही नहीं है?
वह तो घुमते रहते हैं। उनके पास एक काम थोड़ी है।
आज तो वहां आपके चौकीदार सोये थे।
अब खाली रहती है तो कोई भी सो सकता है।
भरत मोदी, उद्योगपति
कोई पुलिस सहायता केंद्र नहीं है थाना क्षेत्र में...
क्या बायपास पर लसूÞिड़या पुलिस का कोई सहायता केंद्र है?
नहीं, अभी नहीं है।
सहायता केंद्र की जरूरत है?
हां, बाज घुमता रहता है वहां। थोड़ी बैठने की व्यवस्था हो जाए तो बढ़िया।
अब तक किसी ने बनाकर तो नहीं दे दिया?
अभी नहीं दिया कोशिश है कि सौजन्य से कोई बनाकर दे दे।
क्या किसी विवादित जमीन पर केंद्र बन सकता है?
बिल्कुल नहीं।
भरत मोदी और किसान विवाद की जानकारी है आपको?
नहीं, सूना है मामला कोर्ट में है।
नरेंद्र गेहवार, थाना प्रभारी
लसूड़िया पुलिस
मेरे समय में केस रजिस्टर्ड हुआ था, आदेश नहीं...
मेरे समय में केस रजिस्टर्ड हुआ था। मैंने सुनवाई का दोनों पक्षों को पूरा मौका दिया। मामला रेवेन्यू बोर्ड ग्वालियर भी गया लेकिन मैंने कोई आदेश नहीं किया। आदेश मेरे बाद वाले तहसीलदार ने किया होगा।
बिहारी सिंह, पूर्व तहसीलदार
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