काम किया सबलेट, दस्तावेजों में जिंदा रहेगा कंपनी का नाम
इंदौर. चीफ रिपोर्टर ।
इंदौर को साफ-स्वच्छ देखने वाले शहरवासियों के लिए बूरी खबर यह है कि कचरा प्रबंधन योजना का ठेका लेने वाली एटूजेड कंपनी इंदौर छोड़ चुकी है! कंपनी ने व्यवस्था अग्रवाल इन्फ्रास्ट्रक्चर नाम की एक फर्म को पेटी कॉन्ट्रेक्ट पर दे दी है। दोनों का समझौता पर्दे के पीछे हुआ ताकि नगर निगम को इसकी भनक न लगे और कंपनी के नाम से कामकाज चलता रहे। इसके लिए कंपनी का मैदानी अमला हटाकर सिर्फ प्रोजेक्ट मैनेजर विकास झा को यथावत रखा गया है ताकि वे एटूजेड के नाम पर बिल भुगतान लेते रहें। इसकी चर्चा नगर निगम में है लेकिन इसकी आधिकारिक पुष्टि करने को कोई तैयार ही नहीं।
एटूजेड इन दिनों आर्थिक रूप से लड़खड़ा रही है। रांची में कंपनी के खिलाफ एफआईआर तक हो चुकी है। कानपुर में आए दिन नोटिस मिल रहे हैं। इंदौर में भी कामकाज कमजोर है। 2008-09 में उपलब्ध कराए गए संसाधनों में 40 फीसदी कचरा हो चुके हैं। मौजूदा संसाधनों को कचरा करार देकर निलाम करने और निलामी की रकम से नए वाहन की खरीदी करवाने का गणित भी विफल रहा। इसके बाद से ही कंपनी ने इंदौर छोड़ने का मन बना लिया था। कंपनी चरणवार पलायन कर रही है। पहले चरण में मैदानी अमला कम किया। दूसरे चरण में व्यवस्था धीरे से अग्रवाल इन्फ्रास्ट्रक्चर को थमा दी। अनुबंध के मुताबिक फर्म एटूजेड के बैनर तले ही अपना काम काज करेगी। इसकी पुष्टि कंपनी के कर्मचारी ही कर रहे हैं।
सिर्फ अफवाह है ...
कंपनी इंदौर छोड़ चुकी है, नगर निगम में इस बात की चर्चा 15 दिन से जारी है। महापौर कृष्णमुरारी मोघे और निगमायुक्त राकेश सिंह तक भी बात पहुंच चुकी हैं। हालांकि दोनों के बीच हुई बातचीत में यही तथ्य सामने आया कि यह अफवाह है। निगमायुक्त ने कहा कि अब तक निगम को कोई अधिकृत जानकारी नहीं मिली है। हमारे दस्तावेजो में अब भी एटूजेड ही काम कर रही है। अब जबकि कंपनी के प्रोजेक्ट मैनेजर विकास झा भी यहां है और कंपनी का नाम भी यहीं है ऐसे में कंपनी की रवानगी को सिर्फ कोरी अफवाह ही कहा जा सकता है।
150 रुपए/टन का है घाटा
कंपनी के प्रोजेक्ट मैनेजर ने दबंग दुनिया को बताया कि देशभर में कचरा परिवहन का काम 500 से 700 रुपए/टन में हो रहा है जबकि इंदौर में 300 रुपए/ टन में। यदि हमारे फायदे को नजरअंदाज भी कर दें तो कंपनी को विशुद्ध रूप से 150 रुपए/टन का घाटा हो रहा है। पलायन की बात नकारते हुए उन्होंने कहा कि यदि ऐसा होता तो हम प्रोसेसिंग प्लांट पर 32 करोड़ रुपया खर्च नहीं करते। कानपुर व अन्य नगर निगमों से वाहन लाकर यहां नहीं चलाते।
इसलिए भागेगी कंपनी...
कंपनी ने जिस गति के साथ काम शुरू किया था। वह छह महीने पहले ही मंदी पड़ चुकी थी।
घाटे की भरपाई के लिए पहले कर्मचारियों की संख्या कम की।
वर्कशॉप और जीपीएस कंट्रोल रूम का खर्च बचाया।
कचरे में पानी डालकर तुलाई करवा दी। हिसाब-किताब से बचने के लिए अपने ही प्लांट में आग लगाई। कारण कचरे को बताया।
कंपनी की खाद अपेक्षाकृत नहीं बिक रही है। खाद कंपनियां भाव नहीं देती।
गाड़ियों का मेंटेनेंस 5 से 7 लाख रुपए महीने का है जो भारी पड़ रहा है।
मिट्टी तुलाई घोटाले के बाद से खुडेÞल थाने में खड़ी गाड़ी नहीं छूटी।
(नाम न छापने की शर्त पर जानकारी कर्मचारी ने दी। )
क्यों भागेगी कंपनी...
-- कंपनी ने निगम से 25 एकड़ जमीन लेकर प्रोसेसिंग प्लांट बनाया है 30 साल के अनुबंध के साथ। प्लांट 32 करोड़ का है।
-- कानपुर व अन्य शहरों से गाड़ियां लाकर यहां चला रही है।
-- डोर टू डोर के लिए टेंडर डाला।
-- निगम से की खाद खरीदने की गुजारिश।
(कंपनी के अनुसार)
पहले भी बाले-बाले जयहिंद बोल चुकी है कंपनीयां...
इंदौर नगर निगम ने 69 वार्डोँ में नई संपत्तियां खोजने और जीआईएस सर्वे के लिए हैदराबाद की स्पैक कंपनी को ठेका दिया था। पालिका प्लाजा में नगर निगम के आॅफिसों के बीच जगह भी दी। कंपनी ने दो-चार दस वार्डों में काम किया। कंपनी ने पहले चरण में तकनीकी स्टाफ को हटाया। दूसरे चरण में ऐसे नौसीखिए रखे जो काम के नाम पर सिर्फ आॅफिस खेलकर कम्प्यूटर पर गेम खेलते थे। उसके बाद अचानक आफिस पर ऐसा ताला लगा कि आज तक नहीं खुला। फर्म निगम को 25 लाख से ज्यादा की टोपी पहनाकर गई।
इंदौर. चीफ रिपोर्टर ।
इंदौर को साफ-स्वच्छ देखने वाले शहरवासियों के लिए बूरी खबर यह है कि कचरा प्रबंधन योजना का ठेका लेने वाली एटूजेड कंपनी इंदौर छोड़ चुकी है! कंपनी ने व्यवस्था अग्रवाल इन्फ्रास्ट्रक्चर नाम की एक फर्म को पेटी कॉन्ट्रेक्ट पर दे दी है। दोनों का समझौता पर्दे के पीछे हुआ ताकि नगर निगम को इसकी भनक न लगे और कंपनी के नाम से कामकाज चलता रहे। इसके लिए कंपनी का मैदानी अमला हटाकर सिर्फ प्रोजेक्ट मैनेजर विकास झा को यथावत रखा गया है ताकि वे एटूजेड के नाम पर बिल भुगतान लेते रहें। इसकी चर्चा नगर निगम में है लेकिन इसकी आधिकारिक पुष्टि करने को कोई तैयार ही नहीं।
एटूजेड इन दिनों आर्थिक रूप से लड़खड़ा रही है। रांची में कंपनी के खिलाफ एफआईआर तक हो चुकी है। कानपुर में आए दिन नोटिस मिल रहे हैं। इंदौर में भी कामकाज कमजोर है। 2008-09 में उपलब्ध कराए गए संसाधनों में 40 फीसदी कचरा हो चुके हैं। मौजूदा संसाधनों को कचरा करार देकर निलाम करने और निलामी की रकम से नए वाहन की खरीदी करवाने का गणित भी विफल रहा। इसके बाद से ही कंपनी ने इंदौर छोड़ने का मन बना लिया था। कंपनी चरणवार पलायन कर रही है। पहले चरण में मैदानी अमला कम किया। दूसरे चरण में व्यवस्था धीरे से अग्रवाल इन्फ्रास्ट्रक्चर को थमा दी। अनुबंध के मुताबिक फर्म एटूजेड के बैनर तले ही अपना काम काज करेगी। इसकी पुष्टि कंपनी के कर्मचारी ही कर रहे हैं।
सिर्फ अफवाह है ...
कंपनी इंदौर छोड़ चुकी है, नगर निगम में इस बात की चर्चा 15 दिन से जारी है। महापौर कृष्णमुरारी मोघे और निगमायुक्त राकेश सिंह तक भी बात पहुंच चुकी हैं। हालांकि दोनों के बीच हुई बातचीत में यही तथ्य सामने आया कि यह अफवाह है। निगमायुक्त ने कहा कि अब तक निगम को कोई अधिकृत जानकारी नहीं मिली है। हमारे दस्तावेजो में अब भी एटूजेड ही काम कर रही है। अब जबकि कंपनी के प्रोजेक्ट मैनेजर विकास झा भी यहां है और कंपनी का नाम भी यहीं है ऐसे में कंपनी की रवानगी को सिर्फ कोरी अफवाह ही कहा जा सकता है।
150 रुपए/टन का है घाटा
कंपनी के प्रोजेक्ट मैनेजर ने दबंग दुनिया को बताया कि देशभर में कचरा परिवहन का काम 500 से 700 रुपए/टन में हो रहा है जबकि इंदौर में 300 रुपए/ टन में। यदि हमारे फायदे को नजरअंदाज भी कर दें तो कंपनी को विशुद्ध रूप से 150 रुपए/टन का घाटा हो रहा है। पलायन की बात नकारते हुए उन्होंने कहा कि यदि ऐसा होता तो हम प्रोसेसिंग प्लांट पर 32 करोड़ रुपया खर्च नहीं करते। कानपुर व अन्य नगर निगमों से वाहन लाकर यहां नहीं चलाते।
इसलिए भागेगी कंपनी...
कंपनी ने जिस गति के साथ काम शुरू किया था। वह छह महीने पहले ही मंदी पड़ चुकी थी।
घाटे की भरपाई के लिए पहले कर्मचारियों की संख्या कम की।
वर्कशॉप और जीपीएस कंट्रोल रूम का खर्च बचाया।
कचरे में पानी डालकर तुलाई करवा दी। हिसाब-किताब से बचने के लिए अपने ही प्लांट में आग लगाई। कारण कचरे को बताया।
कंपनी की खाद अपेक्षाकृत नहीं बिक रही है। खाद कंपनियां भाव नहीं देती।
गाड़ियों का मेंटेनेंस 5 से 7 लाख रुपए महीने का है जो भारी पड़ रहा है।
मिट्टी तुलाई घोटाले के बाद से खुडेÞल थाने में खड़ी गाड़ी नहीं छूटी।
(नाम न छापने की शर्त पर जानकारी कर्मचारी ने दी। )
क्यों भागेगी कंपनी...
-- कंपनी ने निगम से 25 एकड़ जमीन लेकर प्रोसेसिंग प्लांट बनाया है 30 साल के अनुबंध के साथ। प्लांट 32 करोड़ का है।
-- कानपुर व अन्य शहरों से गाड़ियां लाकर यहां चला रही है।
-- डोर टू डोर के लिए टेंडर डाला।
-- निगम से की खाद खरीदने की गुजारिश।
(कंपनी के अनुसार)
पहले भी बाले-बाले जयहिंद बोल चुकी है कंपनीयां...
इंदौर नगर निगम ने 69 वार्डोँ में नई संपत्तियां खोजने और जीआईएस सर्वे के लिए हैदराबाद की स्पैक कंपनी को ठेका दिया था। पालिका प्लाजा में नगर निगम के आॅफिसों के बीच जगह भी दी। कंपनी ने दो-चार दस वार्डों में काम किया। कंपनी ने पहले चरण में तकनीकी स्टाफ को हटाया। दूसरे चरण में ऐसे नौसीखिए रखे जो काम के नाम पर सिर्फ आॅफिस खेलकर कम्प्यूटर पर गेम खेलते थे। उसके बाद अचानक आफिस पर ऐसा ताला लगा कि आज तक नहीं खुला। फर्म निगम को 25 लाख से ज्यादा की टोपी पहनाकर गई।
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