Monday, June 15, 2015

सीबीआई के निशाने पर सहकारिता विभाग!

- 800 करोड़ की हेराफेरी में उलझी को-आॅपरेटिव बैंकों का संचालक मंडल भंग करके फसे अफसर
- कार्रवाई पर आपत्ति के साथ आयकर अधिकारियों ने की सीबीआई जांच की मांग
इंदौर. विनोद शर्मा ।
करोड़ों की हेराफेरी करने वाली क्रेडिट को-आॅपरेटिव बैंकों का संचालक मंडल भंग करने के सहकारिता विभाग के फैसले पर आपत्ति लेने वाले आयकर ने मामला सीबीआई को सौंपने का मन बना लिया है। नौ महीने से पूरे मामले की जांच में जूटे आयकर अधिकारियों का कहना है कि सहकारिता विभाग के अधिकारियों ने संचालक मंडल को भंग करके एक तरह से दोषियों को क्लीन चिट दे दी है। मौजूदा परिस्थितियां प्रथम दृष्टया यह सिद्ध करती हैं कि अफसरों ने अपने हितों को साधते हुए फैसला दिया।
इनकम टैक्स की इंटेलीजेंस विंग ने इंदौर की गुरुशरण और कान्हां, धार की राजेंद्र सूरी और उज्जैन की श्री वर्धमान के्रेडिट को-आॅपरेटिव बैंक पर छापामार कार्रवाई करते हुए 1000 करोड़ रुपए की हेराफेरी उजागर की थी। अक्टूबर 2014 के बाद से ही जांच जारी है। चूंकि एक हजार करोड़ की जो रकम सामने आई थी वह किसी एक व्यक्ति न होकर 1000 से ज्यादा व्यापारियों की थी इसीलिए जैसे-जैसे व्यापारियों के नाम इंटेलीजेंस विंग के सामने आ रहे हैं वैसे-वैसे समन देकर उनसे पूछताछ की जा रही है। इसी बीच सहकारिता उपायुक्त इंदौर ने गुरुशरण और कान्हां क्रेडिट को-आॅपरेटिव बैंक का संचालक मंडल भंग करके उनका चार्ज प्रभारी अधिकारी को सौंप दिया था। उधर, जनवरी में उज्जैन में भी श्रीवर्धमान संस्था भंग कर दी गई। सहकारिता विभाग के इस फैसले पर इनकम टैक्स इंटेलीजेंस विंग ने कड़ी आपत्ति ली। उन्होंने अपने आला अधिकारियों को मामले की जानकारी दी साथ इस बात की अनुसंशा भी की कि मामले की गंभीरता को देखते हुए इस बात की जांच सीबीआई स्तर प कराई जाना चाहिए कि आखिर सहकारिता विभाग ने यह कार्रवाई कैसे कर दी?
आयकर इंटेलीजेंस विंग के अधिकारियों का साफ कहना है कि मामले में सीबीआई की जांच होना जरूरी है। वरना हमारी करी कराई मेहनत पर पानी फिर जाएगा। बेहिसाब मिले 1000 करोड़ का हिसाब ही नहीं मिल पाएगा। संस्था भंग करने से पहले विभाग के अधिकारियों ने हमारी जानकारी में लाना तक वाजिब नहीं समझा। हमने अधिकारियों को अपनी आपत्ति भेजकर सीबीआई जांच की मांग की है।
बढ़ जाएगी दिक्कतें सहकारिता विभाग की...
जमीनी हेराफेरी में सहयोग को लेकर आए दिन सुर्खियों में रहे सहकारिता विभाग के अधिकारियों का इस तरह का फैसला नया नहीं है। यह बात अलग है कि अब तक किसी अन्य विभाग ने आपत्ति नहीं ली। यह पहला मौका है जब सहकारिता विभाग के सामने अपने ही फैसले के खिलाफ आयकर जैसा विभाग खड़ा है जो विभाग की नाक के नीचे बिना अनुमति के चल रही बैंकों का भांडा फोड़ चुका था। चूंकि आयकर केंद्र सरकार का उपक्रम है इसीलिए इस मामले की जांच के लिए वह सीबीआई की मदद ले सकता है। यदि ऐसा होता है तो सहकारिता विभाग के अफसरों की दिक्कत बढ़ जाएगी।
एक तरह से क्लीन चिट ही दे दी...
स्वयं सहकारिता विभाग का ही मैदानी अमला अपने ही विभाग के इस फैसले से नाराज है। उनकी मानें तो जब आयकर की जांच चल रही थी तो सहकारिता विभाग को उसमें मदद करना चाहिए थी। विभाग ने भंग करके संचालकों को एक तरह से मामले से बरी कर दिया। उनके सिर पर नित नए खुलासों और आयकर के सवाल-जवाब की जो तलवार लटकी थी उसे सहकारिता विभाग ने हटा दिया। उन्हें निश्चिंत कर दिया। अब काला-पीला वे कर गए और आयकर के निशाने पर आ गए हम जैसे। अब हमसे यदि आयकर पूछे कि बताओ किस सदस्य का कितना पैसा जमा है, तो हम क्या बताएंगे। न गुरुशरण के ‘ग’ से मतलब रहा न ही कान्हां के ‘क’ से।
उलटा, सीज दस्तावेज मांगने चले आए...
इंटेलीजेंस विंग के अधिकारी बताते हैं कि हंसी तो उस वक्त आई जब संस्थाओं को भंग करने के बाद सहकारिता विभाग के कुछ लोग यहां आए और उन दस्तावेजों की मांग करने लगे जो हमने कार्रवाई के दौरान सीज कर लिए थे। उन अधिकारियों को फटकार कर यहां से बिदा किया।
सीबीआई जांच क्यों?
भंग की गई तीन संस्थाएं- गुरुशरण, कान्हां और श्री वर्धमान
कुल घपला - 800 करोड़
जिम्मेंदार व्यापारी : करीब-करीब 500
बयान हो चुके : 250 से अधिक के
क्या बाकी : 250 व्यापारियों के बयान। 550 करोड़ की बेहिसाबी रकम का हिसाब पता करना।
किसने घपला किया : संचालकों ने
जवाब कौन देगा : सहकारिता अधिकारी
बड़Þा मुद्दा क्यों : पूरे मामले में आयकर की इंदौर विंग के साथ राजस्थान पुलिस भी मैदान छानबीन कर रही है।


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