Monday, June 15, 2015

साहब, हमें विंग से मुक्ति दे दो

वाणिज्यिक कर का ‘मक्खन’ बना एंटी इवेजन विंग, फिर भी सालभर से अधिकारी कह रहे हैं
इंदौर. विनोद शर्मा ।
श्री मान, हमें सिफारिश से नहीं बल्कि मेरिट के आधार पर एंटी इवेजन विंग की जिम्मेदारी मिली थी। विंग को मलाई का डिब्बा समझने वाले आला अधिकारियों को न हम समझ आए। न ही हमारा काम। हमारे काम में अडंगा ही उनकी ड्यूटी रह गया। हम शहर के टैक्स चोरों से लड़ सकते हैं, अपने विभाग के अफसरों से नहीं। इसीलिए आप से निवेदन है कि आप तो हमें एंटी इवेजन विंग की जिम्मेदारियों से मुक्त कर दें और कुछ और काम दें। यह हाल है एंटी इवेजन विंग, इंदौर का। तबादले का काउंट डाउन शुरू होते ही जहां जाने के लिए अधिकारियों में मारामारी मची है वहीं मौजूदा अफसर सालभर से आयुक्त से कुछ इसी अंदाज में विंग से मुक्ति की गुहार कर रहे हैं।
एंटी इवेजन विंग के अधिकारियों की अपनी कुर्सी से चिड़चिड़ाहट बढ़ी 2014 की शुरूआत में। दोनों ही विंग के प्रभारी और उपायुक्त अपनी कुर्सी बदलने की मांग कर चुके हैं। अधिकारी इसकी वजह फरवरी 2015 में रिटायर हुए विभागीय संचालक प्रवीण बागड़ीकर को बताते हैं। उनकी मानें तो तत्कालीन आयुक्त अमित राठौर के नजदीकी रहते बागड़ीकर ने विंग के लिए अपने चहेते अधिकारियों में चाह जगाई। अफसरों का आरोप है कि बागड़ीकर स्वयं हमारी शिकायत आयुक्त को करते और बाद में आयुक्त को लगातार शिकायत मिल रही है कहकर हम पर कार्रवाई के लिए दबाव बनवाते।  उन्हें उम्मीद थी कि उनके प्रयासों से टीम बदलेगी, इसीलिए उन्होंने विंग में पद दिलाने तक के ठेके लेना शुरू कर दिए थे। प्रस्ताव बनाकर भी भेजे। कहा कि नए लोगों को मौका मिलना चाहिए। ट्रांसफर पर लगी रोक के कारण वे अपने मनसूबों में कामयाब नहीं हुए। इसके बाद भी उनकी शिकायतों का सिलसिला जारी रहा। जो भी कार्रवाई की, हर एक में अंगुली उठाई।
टैक्स कलेक्शन का टार्गेट, सर्च-सर्वे की टेंशन, मैदानी अमले की कमी और आला अफसरों द्वारा की जा रही टांग खिंचाई ने इतना खिन्न कर दिया था कि अंतत: विंग अधिकारियों ने ही कुर्सी से हाथ जोड़ लिए। उपायुक्त वी.एस.भदौरिया, श्री सोनवलकर, उनके अधिनस्थ अलका डामोर व अन्य अधिकारी इस संबंध में आला अधिकारियों को चिट्ठी लिख चुके हैं।
जहां 15 अधिकारी रहते थे वहां छोड़े तीन
विंग अधिकारियों ने तत्कालीन अफसरों पर यह भी आरोप लगाए थे कि जिन एंटी इवेजन विंग्स में कभी 15-15 अधिकारी हुआ करते थे वहीं षड़यंत्र पूर्वण तीन वर्षों में अधिकारी दिए गए तीन-चार। विंग ‘ए’ में भदौरिया के साथ तीन अन्य अधिकारी हैं। जिनमें दो महिलाएं हैं। अलका डामोर बीमारी का हवाला देते हुए विंग से मुक्ति का लिख चुकी है। वहीं दूसरी अधिकारी भी बीमार है। यही स्थिति विंग-बी की है यहां तो विंग संभालने वाला ही नहीं है। अन्य जो मैदानी अमला था वह भी लोकायुक्त की कार्रवाई के बाद से है, नहीं है, समान है।
विंग में अमले की कमी से जहां छापेमार कार्रवाइयों का ग्राफ घटा वहीं मैदानी अमले को टैक्स चोरों की दादागिरी का सामना भी करना पड़ा। इसका बड़ा उदाहरण अलका डामोर प्रकरण है। उन्होंने जिनकी गाड़ी पकड़ी थी उन्हीं ने उनके साथ धक्कामुक्की की। गाड़ी की चाबी और मोबाइल ले गए। पूरा विभाग परेशान होता रहा रातभर। इसी तरह विंग-बी की टीम 2014-15 के 12 महीनों में गिनती की कार्रवाई कर पाई वहीं 2015 में अब तक उनका खाता तक नहीं खुला।
हमें तो अपनों ने लूटा, गैरों में कहां दम था
विंग के अधिकारी विंग मुक्ति के लिए अपनी बात रखते हुए यह भी कह चुके हैं कि इंदौर जैसे शहर में टैक्स चोरों पर छापा मारना और टैक्स वसूलने से ज्यादा टेंशन दायक है अफसरों की आंखों की किरकिरी बने रहना। क्योंकि टैक्स चोरों से तो लड़ झगड़कर हम जैसे-तैसे टैक्स ले आएंगे लेकिन मिनमैक निकालने के आदी हो चुके अफसरों के सवालों के जवाब देना भारी पड़ जाएगा।



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