Monday, June 15, 2015

फ्लैग : 700 करोड़ का अंतरराष्ट्रीय हवाला

अंबानी हाउस तक पहुंची हवाले की हवा!
सब हेडिंग
- एनएचआई से 590 करोड़ में ठेका लेकर पाथ को सौंपा 350 करोड़ में काम
- वित्त मंत्रालय और सीबीडीटी पहुंची अप्राइजल रिपोर्ट में अनिल अम्बानी ग्रुप की आर.इन्फ्रा पर टिकी आयकर की निगाहें
इंदौर. विनोद शर्मा । 9826667092
पाथ इंडिया के पथ से उजागर हुए 700 करोड़ के हवाले की जांच की आंच रिलायंस इन्फ्रास्ट्रक्चर का रास्ता पकड़कर अनिल अंबानी के घर तक जा सकती है! नेशनल हाईवे अथॉरिटी आॅफ इंडिया (एनएचएआई), रिलायंस और पाथ सहित दुबई तक पैसा पहुंचाने वाली गीत एक्जिम तक के दस्तावेजी प्रमाण है आयकर के पास। प्रमाणों को संबंधितों के बयानों के साथ अप्राइजल रिपोर्ट में पहले ही पुख्ता किया जा चुका है। इंतजार है तो सिर्फ  वित्त मंत्रालय और सीबीडीटी की मंजूरी का। मंजूरी मिलते ही आयकर अंबानी से पूछताछ कर सकती है।
छापेमार कार्रवाई के दौरान आयकर को 700 करोड़ के  अंतरराष्ट्रीय हवाले के सुराग मिले थे। इसका जिक्र भोपाल से लेकर दिल्ली तक पहुंच चुकी अप्राइजल रिपोर्ट में है। रिपोर्ट के मुताबिक सारी खोजबीन अंतत: रिलायंस इन्फ्रा पर आकर अटक जाती है। क्योंकि ग्रुप बड़ा है और बिना किसी सक्षम स्वीकृति के ग्रुप से पूछताछ नहीं की जा सकती। इसीलिए रिपोर्ट वित्त मंत्रालय और सीबीडीटी को सौंप दी गई है ताकि कार्रवाई उनके स्तर पर हो। हालांकि चार महीने हो चुके हैं रिपोर्ट भेजे लेकिन शीर्ष प्रबंधन ने भी कार्रवाई करके मैदानी अमले की मेहनत को भुनाने की जहमत नहीं की।
यूं समझे रिलायंस की भूमिका पर उठे सवालों को...
- एनएचएआई ने जयपुर-रींगस का ठेका आर-इन्फ्रा को दिया था। आर.इन्फ्रा ने 20 अक्टूबर 2009 को विज्ञप्ती जारी करके इसकी विधिवत घोषणा कर दी। प्रोजेक्ट को अंजाम देने के लिए आर-इन्फ्रा ने 9 दिसंबर 2009 को जयपुर रींगस टोल रोड प्रा.लि. (जेआरटीआरपीएल) कंपनी पंजीबद्ध कराई। इस कंपनी का एनएचएआई के साथ अनुबंध हुआ 19 फरवरी 2010 को।
- मार्च-अपै्रल 2010 में जेआरटीआरपीएल ने महू की पाथ इंडिया से अनुबंध किया और सड़क बनाने की जिम्मेदारी उसे सौंप दी। काम मिलते ही मई और जून में सात अलग-अलग किश्तों में पाथ ने सूरत के पते पर पंजीबद्ध गीत एक्जिम प्रा.लि. को 80 करोड़ का भुगतान कर दिया।
- बड़ा सवाल यह था कि भुगतान क्यों और किस लिए किया गया? इसके जवाब में गीत एक्जिम के संचालकों ने पाथ को पहचानने से ही इन्कार कर दिया। कहा कि उन्होंने कमीश्न के लालच में बैंक अकाउंट किराए पर दिया था।
- गीत एक्जिम के मना करने के बाद आयकर के पास 80 करोड़ का हिसाब पता करने के लिए आखिरी विकल्प था पाथ। इसीलिए उन्होंने पूरा जोर पाथ पर लगा दिया। पाथ के डायरेक्टर पुनीत अग्रवाल टूट गए और उन्होंने स्वीकारा कि यह पैसा उन्होंने आर-इन्फ्रा के कहने पर गीत एक्जिम के खाते में जमा किया था। इन्वेस्टिगेशन के दौरान इन्वेस्टिगेशन विंग आयकर अधिनियम-1961 की धारा 131(1)(बी) के तहत पुनीत के इस बयान को रिकार्ड भी कर चुकी है। अप्राइजल रिपोर्ट में भी इस बयान का जिक्र है। आयकर के जानकारों की मानें तो इन्वेस्टिगेशन के दौरान धारा 131(1)(बी) के तहत दिए बयान कोर्ट भी मान्य करती है।
सवाल यह भी....
- रिलायंस इन्फ्रा देश की सबसे बड़ी इन्फ्रास्ट्रक्चर कंपनी है। कंपनी कुल 968 किलोमीटर लंबे 11 प्रोजेक्ट पर काम कर रही है जिनकी लागत 11430 करोड़ है। इन प्रोजेक्ट में जयपुर-रींगस रोड भी है। ऐसे में सवाल यह उठता है कि इस कंपनी को पाथ इंडिया जैसी उस कंपनी की जरूरत क्यों पड़ी जो 2006 में एमआर-10 ब्रिज बनाने के बाद अस्तित्व में आई।
एनएचएआई के रीजनल आॅफिसर (राजस्थान) एम.के.जैन की मानें तो 51.480 किलोमीटर लंबी इस सड़क की कॉस्ट अनुबंध के हिसाब से  267.81 करोड़ है। वैसे भी 2009-10 में जब सड़क का ठेका दिया गया उस वक्त दो लेन को फोरलेन करने की लागत 5 से 5.5 करोड़ के बीच आती थी। इस लिहाज से अनुबंध की राशि ठीक है।
- रिलायंस अपने स्तर पर काम नहीं कर सकता था तो उसने मना एनएचएआई से ठेका क्यों लिया? या फिर ठेका लेने के बाद सरेंडर क्यों नहीं किया? क्यों एक नई कंपनी के भरौसे अपना नाम छोड़ दिया?
- पाथ के लिए रिलायंस के साथ काम करना बड़ी उपलब्धि थी इससे उसके नंबर भी बढ़े लेकिन काम लेते ही उसे गीत एक्जिम को 80 करोड़ का भुगतान करना पड़ गया जो उसे 2014 में जाकर महंगा पड़ा। जब रिलायंस ने काम लेकर पाथ को दिया तो फिर पैसा गीत एक्जिम के खाते में क्यों गया?
- पाथ को अपै्रल में काम लेते ही रिलायंस ने ऐसा कितना पैसा दिया कि उसने 80 करोड़ गीत एक्जिम को भी पहुंचा दिए?
लागत का गणित भी गड़बड़ है...
- 20 अक्टूबर 2009 को जारी रिलायंस की विज्ञप्ती में 53 किलोमीटर लंबे इस प्रोजेक्ट की अनुमानित लागत 590 करोड़ आंकी गई थी। बताया कि 103 करोड़ की कम बोली लगातर ठेका मिला। वहीं प्रकाश एस्फाल्टिंग टोल हाईवे इंडिया लिमिटेड की वेबसाइट पर करंट प्रोजेक्ट आॅपशन पर प्रोजेक्ट का जिक्र है लेकिन यहां लागत 350 करोड़ दर्ज है। दोनों के बीच अंतर है सीधे 240 करोड़ का। दोनों के बीच यह भी स्पष्ट नहीं है कि अनुबंध किन शर्तों पर आर इन्फ्रा ने पाथ को काम सौंपा?
- यहां बड़ा सवाल यह है कि क्या रिलायंस इन्फ्रा ने 350 करोड़ की लागत के प्रोजेक्ट की लागत 590 करोड़ बताई। बाद में काम 350 करोड़ में ही करवाया और 240 करोड़ रुपए उसका विशुद्ध मुनाफा कमाया?
- ऐसा तो नहीं कि 590 करोड़ का ठेका लेकर रिलायंस ने 350 करोड़ में पाथ को काम सौंप दिया और अपने नाम के बदले 240 करोड़ लेकर बाहर हो गया? यदि ऐसा है तो जिस काम के 590 करोड़ रुपए मंजूर हुए हों उसे 350 करोड़ में ईमानदारी से कैसे पूरा किया जा सकता है? यानी सड़क वैसी नहीं बनी जैसी एनएचएआई ने बनाने के लिए कहा था? 

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