Monday, June 15, 2015

पाताल नापकर गंभीर से मिलेगी नर्मदा

- लिंक परियोजना के तहत पहाड़ से ज्यादा टनल पर जोर
- 6 किलोमीटर से लंबी बनेगी टनल
इंदौर. विनोद शर्मा।
मालवा का गर्व कहलाने वाली गंभीर नदी से मिलकर उसकी झोली भरने से पहले नर्मदा को करीब 23 फीट (7 मीटर) की गहराई में ‘पाताल’ पथ से गुजरना होगा। तकरीबन 2100 करोड़ की नर्मदा-गंभीर लिंक परियोजना के तहत नर्मदा घाटी विकास प्राधिकरण (एनवीडीए) पाताल पथ के लिए पक्का मन बना चुका है। इससे 10 मेगवॉट तक बिजली बचेगी और बिजली बिल का खर्च भी 20-25 करोड़ तक कम होगा।
अच्छी खबर यह है कि परियोजना पर कागजी कवायदों से मुक्त होकर काम सर्वे के रूप में मैदान पर शुरू हो चुका है। सर्वे टीम को एक महीने में प्लान एनवीडीए को देना है। प्लान की फिजीब्लिटी  एनवीडीए की तकनीकी टीम तय करेगी। बहरहाल, अधिकारियों का कहना है कि गंभीर से मिलने के लिए नर्मदा को पहाड़ों पर उतनी मेहनत नहीं करना पड़ेगी जितनी की शिप्रा से मिलने के दौरान करना पड़ी थी। बड़वाह से चोरल तक परियोजना का रूट वही होगा जो शिप्रा संगम के लिए था। चोरल घाट से लेकर आम्बाचंदन गांव (सिमरोल-महू रोड स्थित) के बीच टनल बनाने की प्लानिंग है ताकि प्लानिंग को लिफ्ट करने में मेहनत कम लगे।
अधिकारियों का कहना है कि टनल में विशेषज्ञता को देखते हुए ही नवयुग इंजीनियरिंग कंपनी प्रा.लि. (एनईसीपीएल) को ठेका दिया है। कंपनी ने श्रीनगर-जम्मू हाईवे पर काजीगुंड-बनीहाल के बीच दुर्गम पहाड़ी हिस्सों में 9 किलोमीटर लंबी टनल बनाई। 6.2 किलोमीटर की 12 टनल अलग बनाई। यह देश का सबसे सफल टनल प्रोजेक्ट रहा है। इसीलिए उम्मीद है कि यहां कंपनी को कोई दिक्कत नहीं आएगी।
22 फीट जमीन के नीचे बनेगी 11 फीट डाया की टनल ...
टनल की लंबाई कमसकम 6 किलोमीटर होगी। ज्यादा से ज्यादा चोरल से सीधे आम्बाचंदन 17 किलोमीटर लंबी। टनल का डाया 3.5 मीटर रहेगा यानी 11 फीट से ज्यादा। जितनी बड़ी टनल बनाना हो उससे दो गुनी जमीन के नीचे गुदाई करना पड़ती है। मतलब यह कि यदि टनल का डाया 3.5 मीटर (11 फीट) का है तो उसकी खुदाई जमीनी सतह से 7 मीटर (22 फीट) नीचे करना पड़ेगी। एक साथ लंबी टनल तीन साल में बनाना संभव नहीं है। इसीलिए काम संभवत: 4-5 चरणों में एक साथ होगा ताकि टनल जल्दी बने।
ऐसे बनेगी टनल...
1- पहाड़ों की अंदर-अंदर खुदाई हो, बाद में उन्हें सरिया-सीमेंट से पाइप जैसा रिंग आकार दिया जा सके।
2- नीचले या सतही हिस्सों में खुदाई करके उसे चौतरफा कांक्रीट किया जा सके।
3- पहाड़ों के बीच खुदाई, कुछ पत्थरीला हिस्सा कच्चा भी रखा जा सकता है, ऊपरी सतह को कांक्रीट करके ताकि पत्थर न धसे।
4- आम्बाचंदन से दो किलोमीटर की दूरी से पहाड़ों की ओर एक छोटी नदी भी बढ़ती है जो करीब 11 किलोमीटर चलकर चोरल में मिलता है। यह भी टनल के लिए रूट हो सकता है। इसी तरह आम्बाचंदन से चोरल नदी भी 4 किलोमीटर दूर है। उस पर भी बतौर रूट काम किया जा सकता है।
क्यों जरूरी है टनल
- नर्मदा-गंभीर प्रोजेक्ट के लिए एस्टीमेटेड बिजली की जरूरत 84 मेगावॉट प्लान की गई है। टनल के माध्यम से पानी यदि आम्बाचंदन तक पहुंचाया जाता है तो संभवत बिजली की खपत 74-75 मेगॉवाट तक होगी। सालाना 9-10 मेगावॉट बिजली की बचत। इससे बिल में भी 20 करोड़ से ज्यादा की बचत होगी।
- चोरल से आम्बाचंदन के बीच 17 किलोमीटर में करीब-करीब 15 किलामीटर तक पहाड़ ही है। जितने ज्यादा पहाड़, उतनी ऊंची लाइन और उतनी ही ज्यादा टेंशन मेंटेनेंस की। 

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