Wednesday, August 13, 2025

 

इंदौर को जामवंत चाहिए...जो पुलिस को शक्ति याद दिला सके


इंदौर में जिस गति से अपराध बढ़ रहे हैं, उन्हें देखते हुए लगता है कि शहर को एक जामवंत की तलाश है...। जी..हां...जामवंत की...। जो पुलिस कमीश्नर संतोष सिंह और आईजी अनुराग को उनकी खोई हुई ताकत का अहसास करा सके...। जो बता सके कि आपको जिस इंदौर को सुरक्षित रखने का दायित्व सौंपा गया है उसका प्रभार छोटे-मोटे मंत्री के पास नहीं है, स्वयं मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव के पास हैं, जिनके पास गृह मंत्रालय भी है।  

जामवत जरूरी है जो बता सके कि सिंह साहब आपने डीआईजी रहते इंदौर में डंडे की जो धांक और अपराधियों में पुलिस का खौफ पैदा किया था वह पूरी तरह काफूर हो चुका है...। अब गली-मेाहल्ले और रोड-चौराहे तो दूर अपराधी प्रगति विहार जैसी पॉश कॉलोनियों में ऐसे जजों के घरों में अपना शक्ति प्रदर्शन कर रहे हैं....जिनके घुरने मात्र से बड़े-बड़े पुलिस कप्तान थर-थर कांपने लगते थे। सिंह साहब इंदौर में पुलिस कमीश्नरी लागू हो चुकी है। मतलब, पुलिस को पहले से ज्यादा पॉवर है। अब आप डीआईजी भी नहीं रहे...। महाराज, आप इंदौर के पुलिस कमीश्नर हैं..। जागो...।  थानों को मांडवाली का अड्डा बनाकर बैैठे थाना प्रभारियों को कसो, वरना इनकी हिलाहवाली आपकी इज्जत खराब कर रही है। 

1988 बैच के आईएएस अनुराग अग्रवाल की गिनती भी पुलिस के होनहार अफसरों में होती है।  टीकमगढ़, सिंगरौली, भिंड, हरदा और उज्जैन में बतौर एसपी काम कर चुके अग्रवाल सागर जोन (बुंदेलखंड) के आईजी रह चुके हैं। माननीय ये सही है कि आपके पास ग्रामीण थाने हैं। जिनमें बल कम है लेकिन कार्यक्षेत्र ज्यादा है। हालांकि शहर के मुकाबले गांवों में अपराध कम ही होते हैं लेकिन फिर भी शहरसीमा से लगे गांवों में आपसे जिस कसावट की उम्मीद की जाती है वह दिख नहीं रही है। थाने के स्टाफ के पास कानून का राज कायम रखने के अलावा बहुत काम है। अवैध कॉलोनाइजरों को संरक्षण देना है और गुंडे-बदमाशों से जमीनों के विवाद निपटाना है। वह भी यह कहते हुए कि थोडी दाड़की हमारी निकल जाएगी।  अब स्टाफ दाड़की निकालने में लगा रहेगा तो अपराध पर नियंत्रण मुश्किल है।  


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