भूलसुधार के नाम पर खजराना की बेशकीमती सरकारी जमीन बिल्डर को सौंपने से विधायक खफा
कलेक्टर को चिट्ठी लिखकर बरसे 'बाबा'
इंदौर. विनोद शर्मा ।
सरकारी जमीनों की बंदरबांट में प्रशासनिक अमले की भागीदारी से इंदौर-5 के विधायक महेंद्र हार्डिया 'बाबा' खासे नाराज हैं। उन्होंने कलेक्टर आशीष सिंह को तीखा पत्र लिखा। कहा कि आपके मतहत मनमानी पर आमादा है। अपने पद का दुरुपयोग करके बंदरबांट में बिल्डरों का साथ दे रहे हैं। जिसका उदाहरण है खजराना के सर्वे नंबर 543/1 की सरकारी जमीन। जिसे एसडीएम ने मेरी आपत्तियों को नजरअंदाज करते हुए भूल सुधार के नाम पर बिल्डर को सौंप दी।
बाबा की चिट्ठी 10 फरवरी को कलेक्टर ऑफिस में पहुंची। चिट्ठी में उन्होंने जूनी इंदौर के पूर्व और सांवेर के मौजूदा एसडीएम जगदीश धनगर की कार्यशैली पर सवाल उठाए हैं। उन्होंने लिखा कि परमिशन लेने के लिए कॉलोनाइजर राकेश जैन ने निजी जमीन का खसरा 543/1 उत्तर दिशा में अपनी दूसरी जमीन से सटा हुआ बताया था।ब सीलिंग की सरकारी जमीन का खसरा 543/2 दक्षिण में दर्शाया। बाद में जांच हुई। उत्तर में 543/2 निकला। तब तक जैन वहां जी+6 बिल्डिंग बना चुका था।
बिल्डर लगातार कहता रहा कि गलत हम नहीं, राजस्व रिकार्ड है। कोर्ट ने प्रशासन से कहा था मामला बारीकि से देखें। गलती आपकी है तो सुधार लें। इसी पर जैन से भूलसुधार का आवेदन लिए बिना जो नहीं हुई वह भूल सुधार कर दी हार्डिया ने कहा कि मैंने पहले ही आपत्ति ली। मैंने लिखित में दिया कि जिस जमीन को जैन अब सरकारी बता रहा है वहां तो 30 साल से लोगों के घर बने हुए हैं। जिन्हें हासिए पर रखकर बिल्डर सरकारी जमीन हथियाना चाहता है।
मैंने एक बार नहीं, तीन बार पत्र लिखे। इन तीनों पत्रों की अवहेलना करके एसडीएम ने न सिर्फ बिल्डर को आर्थिक लाभ पहुंचाया है। बल्कि बस्ती उजाड़ने के षड़यंत्र में बिल्डर के सहभागी भी बने हैं। हद तो यह है कि एसडीएम और तहसीलदार ने मुझे मेरे पत्रों के जवाब तक देना उचित नहीं समझा। इसीलिए मुझे आपको चिट्ठी लिखना पड़ी। आपको भेजे वे पत्र अकसर आवक होकर गायब हो जाते हैं जिसमें सरकारी जमीन को बचाने की मांग की जाती है। आपके मैदानी को सिर्फ अपनी जैब की चिंता है, फिर भले सरकारी जमीन की कीमत 500 करोड़ से ज्यादा ही क्यों न हो। 20 जनवरी 2025 को तहसीलदार से मिला पत्र (क्र/156/रीडर/2025) भी करता है।
गणेश की जमीन पर सरदार कहां से आया?
हार्डिया ने दस्तावेजी प्रमाण देते हुए बताया कि सर्वे नंबर 543 की जमीन पहले गणेश पिता भागीरथ के नाम थी। सीलिंग शाखा में उसी के नाम से प्रकरण (675(20)/76-77) दर्ज हुआ था। 31 मई 1993 को यही प्रकरण सक्षम प्राधिकरी के समक्ष दर्ज हुआ। फिर ये जमीन सरदार पिता सुलेमान की कैसे हो गई। न त्रुटि सुधार प्रकरण में उक्त नाम का उल्लेख है। कंचन जैन-मीनाक्षी जैन कहती हैं सरदार से 1984 में जमीन खरीदी (प्र.152/90/सी-1/1983-84) बताई। 8 फरवरी 1993 को जिस प्रकरण पर त्रुटि सुधार हुआ था उसका नंबर 558/ए-90/ए/1/77-78 था।
एसडीएम ने बस्ती वालों को क्यों नहीं सुना
जिस जमीन को एसडीएम ने सरकारी कर दिया है वहां 50 से ज्यादा लोगों के घर बने हैं। ऐसे में एसडीएम को त्रुटि सुधार से पहले कानूनन उन परिवारों को भी मौका देकर सुनवाई करना थी। ताकि पता चलता कि उनकी नौटरी पर क्या खसरा लिखा है। किसने और कैसे उन्हें बेची। और कंजन जैन से सरदार सुलेमान के पक्ष में हुआ विक्रय पत्र मांगना था क्योंकि उक्त अवधि में सीलिंग शाखा में प्रकरण दर्ज़ हो चुका था।
मुझे जानकारी तक देना उचित नहीं समझा
7 अक्टूबर 2023 को मैंने जानकारी मांगी। जो नहीं मिली। 20 जून 2024 को लोक सूचना अधिकारी ने जवाब देते हुए कहा कि तहसीलदार ने मामला जांच के लिए भेजा है। रिपोर्ट नहीं मिली। जबकि तहसीलदार और एसडीएम ने 1 फरवरी 2024 को प्रकरण की रिपोर्ट दे दी थी लेकिन मुझे 28 अगस्त 2024 तक रिपोर्ट की जानकारी नहीं दी।
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