कभी तुम्हारी शह पर ही चहकी थी चौपाटी
विनोद शर्मा
इंदौर में राजनीति का स्तर लगातार गिरता जा रहा है..। पहले पार्षद से पार्षद की लड़ाई हुई...। फिर विधायक से विधायक की ठनी। जो ठंडी भी नहीं हुई...। अब दादा-भैया के कहने पर नगर निगम ने मेघदूत चौपाटी से हटाई दुकानों को बुलडोजर से रौंदकर नया बखेड़ा खड़ा कर दिया...। पीली गैंग ने नेताओं की नौकरी बजाकर...गरीबों के पेट पर लात मार दी...। एक बात तो तय है कि जिस किसी के भी कहने पर गुमटियों को मटियामेट किया गया है वह भी अपने सीने पर हाथ रखकर इस तरह की कार्रवाई को जायज तो नहीं कह सकता..।
मेघदूत की जिस चौपाटी को नगर निगम ने हटाया था। जायज या नाजायज रूप से बसाया तो निगम के ही नुमाइंदों ने था। कभी किस नेता के कहने पर गुमटी लगी। कभी किस नेता के कहने पर। कभी कौन नेता आया वसूली हफ्ता वसूली करने? तो कभी कौन? अपनी रोजी-रोटी जमीं रहे ! इसी सोच के साथ दुकानदारों ने भी सबकी जेब भरी। क्या नेता...क्या निगमकर्मी... यहां तक कि पुलिस वालों और बिजलीकर्मियों की भी बंदी बंध गई थी...। सबको तय समय पर अपना सामान मिल रहा था। तब तक न दुकानों से सिस्टम को कोई दिक्कत हुई। रात को दुकानें बंद कराने के लिए बेतरतीब पार्किंग के बीच पुलिस को गाड़ी निकालने में जोर आजमाना पड़ता था....'गांधीजी' रास्ता साफ करते रहे...।
करोड़ों की लागत से बनी सर्विस रोड हो या मैन रोड उन पर गुमटी-ठेले की हिमायत न हिंदुस्तान मेल करता है, न ही कोई सभ्य शहरी। फिर भी 24 घंटे के अल्टीमेटम पर मात्र इसलिए गुमटियों को रौंदना पड़े कि दुकानदारों की मदद के लिए कांग्रेस के नेता आने लगे हैं तो यह कार्रवाई गलत है। वह भी सूरज की पहली किरण के साथ शुरू हुई। नेता प्रतिपक्ष चिंटू चौकसे का समर्थन लेने और विधानसभा के नेताप्रतिपक्ष उमंग सिंगार को बुलाने की सजा दुकानदारों को ऐसी दी जाए? यह कहां का न्याय है।
दुकानदार अपनी दुकान बचाने के लिए चीखते रहे, चिल्लाते रहे। बिलखते रहे। रूंधाते रहे। निगम ने नहीं सुना। न उनकी तरफ देखा। कोई बिखरा सामान समेटता रहा तो कोई निगम का बुलडोजर हटने के बाद अपनी दुकान के अवशेष् बचाता रहा।
दुकानें लगते वक्त ही उन्हें रोक दिया जाता तो इतनी दुकानें नहीं लगती। न ही दादा-भैया करके लोग गुमटियों पर लाखों रुपए की जमापूंजी खर्च करते। न किसी को यह उम्मीद होती कि यह चौपाटी उनका घर चला देगी। यदि दुकानदारों में यह विश्वास बना था तो इसकी वजह भी नगर निगम ही था जो लगातार दुकानदारों की हिमाकत तो नेताओं की शह पर नजरअंदाज करते आ रहा था। इसीलिए एमबीए-बीबीए किए हुए युवा भी गुमटी से स्टार्टअप के सपना संजोकर बैठ गए थे जिन्हें निगम ने नेस्तनाबूत कर दिया।
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