- 90 फीसदी अखबार की बिक्री बच्चों के जिम्में
- बालश्रम कानून बनाने वाले देखकर भी अनदेखा कर रहे हैं दादागिरी
भोपाल. विनोद शर्मा ।
पत्रकारिता की आड़ में दलाली करते आ रहे ह्रदयेश दीक्षित ने मासूमों के नाजूक कंधों पर प्रदेश टूडे की नींव रख रखी है। कानून-कायदे के कसीदे गढ़ने और सरकार को अपनी अंगुलियों पर नचाते आए दीक्षित ने बाल श्रम की परिभाषा को रौंदते हुए सैकड़ों बच्चों को हॉकर बना डाला। दो वक्त की रोटी के लिए मासूम भी वाहनों से भिड़ते-टकराते सड़क पार करते हैं और प्रदेश टूडे बेच रहे हैं। गुंडागर्दी ऐसी की सरकारी मशीनरी से लेकर नोबल पुरस्कार प्राप्त विदिशा के ही कैलाश सत्यार्थी तक भी दीक्षित की दादागिरी से बच्चों को नहीं बचा पाए।
एक तरफ प्रदेश टूडे सलफता के दावे कर रहा है। इस सफलता ने दीक्षित बंधुओं की अय्याशी तो बढ़ाई लेकिन अखबार वितरण की जिम्मेदारी बच्चों से आगे नहीं बढ़ पाई। आज भी भोपाल व अन्य जगह सैकड़ों बच्चे ऐसे हैं जो दोपहर से शाम तक चौराहे-चौराहे खड़े होकर प्रदेश टूडे बेचते नजर आते हैं। कभी सिग्नल को लेकर वाहनों की जल्दबाजी उनके लिए दुखदाई बन जाती है तो कभी बच्चे चाइल्ड ट्रेफिकिंग का शिकार हो जाते हैं। न बाल श्रम विरोधी होर्डिंग-बैनर से सड़कें सजाने वाले श्रम विभाग को इसकी चिंता है और न ही महिला एवं बाल विकास विभाग को। उलटा, हालात यह है कि जो कार्रवाई करना चाहता है उसे भी दबाव-प्रभाव डालकर ऐसा कुछ करने से रोक दिया जाता है।
ऐसे समझें कितना बड़ा नेटवर्क है बच्चों का...
-- प्रदेश टूडे मीडिया समूह से ही ताल्लुक रखने वाले एक अहम व्यक्ति ने बताया कि आॅन रिकॉर्ड प्रदेश टूडे की सवा लाख कॉपी छपती है। इसमें से एक लाख कॉपी बेचने की जिम्मेदारी बच्चों की है। इसीलिए बच्चों का नेटवर्क मजबूत है और प्रबंधन इसे चाहकर भी नहीं बदल सकता। क्योंकि बच्चों को बड़ो की तरह ज्यादा पैसा नहीं देना पड़ता। बच्चों को डराना और समझाना भी आसान है।
--प्रदेश टूडे समूह ने एजेंटों के नाम पर ऐसे तत्वों को बढ़ावा दे रखा हे जो कि आसपास की गरीब बस्तियों से बच्चों को लाते हैं और उन्हें अखबार थमा देते हैं। एक चौराहे पर यदि 10 बच्चे अखबार बेचते नजर आते हैं तो दो पहलवान उनकी निगरानी रखते हैं। जब कोई बाल श्रम का हवाला देकर फोटो खींचने या फिर बच्चों द्वारा की जा रही अखबार की बिक्री का विरोध करता है तो उसे पकड़कर प्रदेश टूडे के आॅफिस ले जाते हैं। यहां उसकी देवेश कल्याणी और सतीश पिंपले क्लास लेते हैं। मारपीट और धौंसधपट इनकी पुरानी आदत है।
-- चाइल्ड लाइन या पुलिस जब ऐसे बाल हॉकरों पर पकड़ लेती है तो निगरानी करने वाले दीक्षित के गुर्गे 100-50 लोगों की भीड़ ले जाते हैं और संबंधित विभाग के द्वार पर हंगामेबाजी शुरू कर देते हैं। उधर, प्रदेश टूडे प्रबंधन यह कहते हुए पल्ले झाड़ लेता है कि उसका पेपर बांटने वाले बच्चों से संबंध नहीं है। यह बच्चे एजेंटों के माध्यम से यहां काम करते हैं।
-- भोपाल और विदिशा में बाल श्रम को लेकर बड़े काम करने वाले कैलाश सत्यार्थी को नोबेले पुरस्कार से नवाजा जा चुका है लेकिन उनके ही शहर में बच्चों की हॉकरी किसी को नहीं कसक रही है।
बड़े हादसे का इंतजार..
बच्चे अखबार बेचने के लिए जी-जान लगा देते हैं। हाथ में रखे दो-ढ़ाई किलो अखबार की कॉपी जल्द से जल्द बेचने के लिए बच्चे सड़कों पर सर्कस तक करते नजर आते हैं। कोई गाड़ियों से झुलता दिखता है। कोई सिग्नल पर खड़ी गाड़ी में पेपर देकर ग्रीन सिग्नल होने के बाद आगे बड़ी गाड़ी के पीछे पैसे के लिए दौड़ लगाता नजर आता है। आए दिन गिरते-पड़ते रहते हैं लेकिन सरकार को इंतजार है शायद किसी हादसे जिसके बाद सोये अधिकारी जागे और ताबड़तोड़ कार्रवाई करे।
शर्म की बात : मामा के राज में हासिये पर भानजों का भविष्य
मुख्यमंत्री शिवराजसिंह चौहान मप्र की महिलाओं को अपनी बहन और बच्चों को भानजी-भानजा मानते हुए स्वयं को उनका मामा कहते हैं। श्री चौहान और उनके मंत्रियों के साथ ही आईएएस और आईपीएस का लंबा लबाजमा भोपाल में रहता है। हैरत की बात यह है कि मामा और उनके मातहतों को छह साल में सड़कों पर हैरान-परेशान प्रदेश टूडे बेचते हुए बच्चे नजर नहीं आए। या यूं कहें कि दलाल दीक्षित की दोस्ती ने उनकी आंखों पर ऐसा पर्दा डाला कि उन्हें प्रदेश टूडे तो दिखता है लेकिन उसे बेचते हुए बच्चे नहीं दिखते। ह्यसरकारह्ण को बाल हॉकरों से यह तक पूछने की फुरसत नहीं है कि हम राइट टू एजूकेशन (आरटीई) जैसी कल्याणकारी योजनाएं चला रहे हैं लेकिन तुम पढ़ने जाते भी हो या नहीं?
चाइल्ड लाइन को भी चमकाया...
2015 की शुरूआत में चाइल्ड लाइन ने सड़कों पर अखबार लेकर भागते इन बच्चों को सूध ली। धरपकड़ के लिए अभियान चलाया। भोपाल पुलिस की मदद से कुछ बच्चों को पकड़ा भी गया। बताया जा रहा है कि इसी बीच चाइल्ड लाइन के लोगों को प्रदेश टूडे आमंत्रित किया गया। यहां बातचीत की शुरूआत प्रेम से हुई लेकिन देखते ही देखते मामला धौंसधपट तक पहुंच गया। छह महीने में बाल हॉकर व्यवस्था बदलने का दावा किया गया लेकिन अगले ही दिन प्रदेश टूडे के मुखिया महिला एवं बाल विकास विभाग के सरपरस्तों के पास पहुंच गए। अगले ही दिन महिला एवं बाल विकास विभाग के अधिकारियों ने कार्रवाई से हाथ खींच लिए और चाइल्ड लाइन से लेकर पुलिस तक को इत्तला कर दी गई कि आगे से ऐसा कोई अभियान न चलाएं। इसके बाद से चाइल्ड लाइन ने भी इस दिशा में सोचना बंद कर दिया।
कौन कहता है कि बच्चे परेशान हैं...
प्रदेश टूडे प्रबंधन हमेशा यही जचाता आया है कि उसकी सरपरस्ती में अखबार बांटने वाले बच्चे खुश हैं। प्रबंधन पहले बाल श्रम की बात नकारता है और बाद में कहता है कि हम बच्चों को बीमा कर चुके हैं। उन्हें कपड़े भी देते हैं। हालांकि बच्चे इस दलील से इत्तेफाक नहीं रखते। उनकी मानें तो कपड़े के नाम पर सिर्फ लाल रंग की टी-शर्ट दी जाती है ताकि हमारी पहचान आसान रहे। निगरानी रखने वालों को निगरानी रखने में फायदा रहे। चौराहों पर किसी से बात करने की आजादी नहीं है। किसी से थोड़ी-बहुत देर किसी को बात करते देख लें तो उसे पकड़कर सवाल किए जाते हैं या फिर हमसे। मारपीट भी करते हैं।
हम प्रयास करते रहते हैं...
बाल श्रम कानून के पालन के लिए हम लगातार प्रयास करते हैं जो भी लोग बच्चों से काम ले रहे हैं उनके खिलाफ अभियान जारी है फिर वह आम घरेलू व्यक्ति हो या फिर कोई अखबार। पुलिस की पहल पर कुछ दिन पहले भी हमने 15 बच्चों को पकड़ा था लेकिन सीमित संसाधनों और सरकारी असहयोग के बीच बच्चों को मुक्त कराना मुश्किल रहता है।
अर्चना सहाय, चाइल्ड लाइन
श्रम विभाग को काम है देखना, हमारा नहीं
अखबार वितरण करने या फिर अन्य किसी बाल श्रम से जुड़े मामले में कार्रवाई करने का अधिकार श्रम विभाग को है। महिला एवं बाल विकास विभाग हो या फिर पुलिस हम तो सिर्फ सहयोग करते हैं। जब कार्रवाई हुई हम साथ थे, होगी तब भी साथ होंगे।
कंसोटिया, प्रमुख सचिव
महिला एवं बाल विकास विभाग
भोपाल. विनोद शर्मा ।
पत्रकारिता की आड़ में दलाली करते आ रहे ह्रदयेश दीक्षित ने मासूमों के नाजूक कंधों पर प्रदेश टूडे की नींव रख रखी है। कानून-कायदे के कसीदे गढ़ने और सरकार को अपनी अंगुलियों पर नचाते आए दीक्षित ने बाल श्रम की परिभाषा को रौंदते हुए सैकड़ों बच्चों को हॉकर बना डाला। दो वक्त की रोटी के लिए मासूम भी वाहनों से भिड़ते-टकराते सड़क पार करते हैं और प्रदेश टूडे बेच रहे हैं। गुंडागर्दी ऐसी की सरकारी मशीनरी से लेकर नोबल पुरस्कार प्राप्त विदिशा के ही कैलाश सत्यार्थी तक भी दीक्षित की दादागिरी से बच्चों को नहीं बचा पाए।
एक तरफ प्रदेश टूडे सलफता के दावे कर रहा है। इस सफलता ने दीक्षित बंधुओं की अय्याशी तो बढ़ाई लेकिन अखबार वितरण की जिम्मेदारी बच्चों से आगे नहीं बढ़ पाई। आज भी भोपाल व अन्य जगह सैकड़ों बच्चे ऐसे हैं जो दोपहर से शाम तक चौराहे-चौराहे खड़े होकर प्रदेश टूडे बेचते नजर आते हैं। कभी सिग्नल को लेकर वाहनों की जल्दबाजी उनके लिए दुखदाई बन जाती है तो कभी बच्चे चाइल्ड ट्रेफिकिंग का शिकार हो जाते हैं। न बाल श्रम विरोधी होर्डिंग-बैनर से सड़कें सजाने वाले श्रम विभाग को इसकी चिंता है और न ही महिला एवं बाल विकास विभाग को। उलटा, हालात यह है कि जो कार्रवाई करना चाहता है उसे भी दबाव-प्रभाव डालकर ऐसा कुछ करने से रोक दिया जाता है।
ऐसे समझें कितना बड़ा नेटवर्क है बच्चों का...
-- प्रदेश टूडे मीडिया समूह से ही ताल्लुक रखने वाले एक अहम व्यक्ति ने बताया कि आॅन रिकॉर्ड प्रदेश टूडे की सवा लाख कॉपी छपती है। इसमें से एक लाख कॉपी बेचने की जिम्मेदारी बच्चों की है। इसीलिए बच्चों का नेटवर्क मजबूत है और प्रबंधन इसे चाहकर भी नहीं बदल सकता। क्योंकि बच्चों को बड़ो की तरह ज्यादा पैसा नहीं देना पड़ता। बच्चों को डराना और समझाना भी आसान है।
--प्रदेश टूडे समूह ने एजेंटों के नाम पर ऐसे तत्वों को बढ़ावा दे रखा हे जो कि आसपास की गरीब बस्तियों से बच्चों को लाते हैं और उन्हें अखबार थमा देते हैं। एक चौराहे पर यदि 10 बच्चे अखबार बेचते नजर आते हैं तो दो पहलवान उनकी निगरानी रखते हैं। जब कोई बाल श्रम का हवाला देकर फोटो खींचने या फिर बच्चों द्वारा की जा रही अखबार की बिक्री का विरोध करता है तो उसे पकड़कर प्रदेश टूडे के आॅफिस ले जाते हैं। यहां उसकी देवेश कल्याणी और सतीश पिंपले क्लास लेते हैं। मारपीट और धौंसधपट इनकी पुरानी आदत है।
-- चाइल्ड लाइन या पुलिस जब ऐसे बाल हॉकरों पर पकड़ लेती है तो निगरानी करने वाले दीक्षित के गुर्गे 100-50 लोगों की भीड़ ले जाते हैं और संबंधित विभाग के द्वार पर हंगामेबाजी शुरू कर देते हैं। उधर, प्रदेश टूडे प्रबंधन यह कहते हुए पल्ले झाड़ लेता है कि उसका पेपर बांटने वाले बच्चों से संबंध नहीं है। यह बच्चे एजेंटों के माध्यम से यहां काम करते हैं।
-- भोपाल और विदिशा में बाल श्रम को लेकर बड़े काम करने वाले कैलाश सत्यार्थी को नोबेले पुरस्कार से नवाजा जा चुका है लेकिन उनके ही शहर में बच्चों की हॉकरी किसी को नहीं कसक रही है।
बड़े हादसे का इंतजार..
बच्चे अखबार बेचने के लिए जी-जान लगा देते हैं। हाथ में रखे दो-ढ़ाई किलो अखबार की कॉपी जल्द से जल्द बेचने के लिए बच्चे सड़कों पर सर्कस तक करते नजर आते हैं। कोई गाड़ियों से झुलता दिखता है। कोई सिग्नल पर खड़ी गाड़ी में पेपर देकर ग्रीन सिग्नल होने के बाद आगे बड़ी गाड़ी के पीछे पैसे के लिए दौड़ लगाता नजर आता है। आए दिन गिरते-पड़ते रहते हैं लेकिन सरकार को इंतजार है शायद किसी हादसे जिसके बाद सोये अधिकारी जागे और ताबड़तोड़ कार्रवाई करे।
शर्म की बात : मामा के राज में हासिये पर भानजों का भविष्य
मुख्यमंत्री शिवराजसिंह चौहान मप्र की महिलाओं को अपनी बहन और बच्चों को भानजी-भानजा मानते हुए स्वयं को उनका मामा कहते हैं। श्री चौहान और उनके मंत्रियों के साथ ही आईएएस और आईपीएस का लंबा लबाजमा भोपाल में रहता है। हैरत की बात यह है कि मामा और उनके मातहतों को छह साल में सड़कों पर हैरान-परेशान प्रदेश टूडे बेचते हुए बच्चे नजर नहीं आए। या यूं कहें कि दलाल दीक्षित की दोस्ती ने उनकी आंखों पर ऐसा पर्दा डाला कि उन्हें प्रदेश टूडे तो दिखता है लेकिन उसे बेचते हुए बच्चे नहीं दिखते। ह्यसरकारह्ण को बाल हॉकरों से यह तक पूछने की फुरसत नहीं है कि हम राइट टू एजूकेशन (आरटीई) जैसी कल्याणकारी योजनाएं चला रहे हैं लेकिन तुम पढ़ने जाते भी हो या नहीं?
चाइल्ड लाइन को भी चमकाया...
2015 की शुरूआत में चाइल्ड लाइन ने सड़कों पर अखबार लेकर भागते इन बच्चों को सूध ली। धरपकड़ के लिए अभियान चलाया। भोपाल पुलिस की मदद से कुछ बच्चों को पकड़ा भी गया। बताया जा रहा है कि इसी बीच चाइल्ड लाइन के लोगों को प्रदेश टूडे आमंत्रित किया गया। यहां बातचीत की शुरूआत प्रेम से हुई लेकिन देखते ही देखते मामला धौंसधपट तक पहुंच गया। छह महीने में बाल हॉकर व्यवस्था बदलने का दावा किया गया लेकिन अगले ही दिन प्रदेश टूडे के मुखिया महिला एवं बाल विकास विभाग के सरपरस्तों के पास पहुंच गए। अगले ही दिन महिला एवं बाल विकास विभाग के अधिकारियों ने कार्रवाई से हाथ खींच लिए और चाइल्ड लाइन से लेकर पुलिस तक को इत्तला कर दी गई कि आगे से ऐसा कोई अभियान न चलाएं। इसके बाद से चाइल्ड लाइन ने भी इस दिशा में सोचना बंद कर दिया।
कौन कहता है कि बच्चे परेशान हैं...
प्रदेश टूडे प्रबंधन हमेशा यही जचाता आया है कि उसकी सरपरस्ती में अखबार बांटने वाले बच्चे खुश हैं। प्रबंधन पहले बाल श्रम की बात नकारता है और बाद में कहता है कि हम बच्चों को बीमा कर चुके हैं। उन्हें कपड़े भी देते हैं। हालांकि बच्चे इस दलील से इत्तेफाक नहीं रखते। उनकी मानें तो कपड़े के नाम पर सिर्फ लाल रंग की टी-शर्ट दी जाती है ताकि हमारी पहचान आसान रहे। निगरानी रखने वालों को निगरानी रखने में फायदा रहे। चौराहों पर किसी से बात करने की आजादी नहीं है। किसी से थोड़ी-बहुत देर किसी को बात करते देख लें तो उसे पकड़कर सवाल किए जाते हैं या फिर हमसे। मारपीट भी करते हैं।
हम प्रयास करते रहते हैं...
बाल श्रम कानून के पालन के लिए हम लगातार प्रयास करते हैं जो भी लोग बच्चों से काम ले रहे हैं उनके खिलाफ अभियान जारी है फिर वह आम घरेलू व्यक्ति हो या फिर कोई अखबार। पुलिस की पहल पर कुछ दिन पहले भी हमने 15 बच्चों को पकड़ा था लेकिन सीमित संसाधनों और सरकारी असहयोग के बीच बच्चों को मुक्त कराना मुश्किल रहता है।
अर्चना सहाय, चाइल्ड लाइन
श्रम विभाग को काम है देखना, हमारा नहीं
अखबार वितरण करने या फिर अन्य किसी बाल श्रम से जुड़े मामले में कार्रवाई करने का अधिकार श्रम विभाग को है। महिला एवं बाल विकास विभाग हो या फिर पुलिस हम तो सिर्फ सहयोग करते हैं। जब कार्रवाई हुई हम साथ थे, होगी तब भी साथ होंगे।
कंसोटिया, प्रमुख सचिव
महिला एवं बाल विकास विभाग
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