पुलिस ने तीन दिन रखा और 420 को धारा 151 में बदल दिया था
इंदौर. विनोद शर्मा ।
कैंसर और एड्स पीड़ितों के नाम पर चंदा वसूली करती आ रही इंदौर की चंदागैंग के खिलाफ जुलाई में ही झाबुआ की तरह ही आगर पुलिस ने भी कार्रवाई की थी लेकिन मामला पांच लाख रुपए के लेनदेन के बाद रफादफा हो गया। तीन दिन तक चंदागैंग के तीन सदस्य लॉकअप में रहे और इधर थाना स्टाफ मास्टर माइंड संदीप से सेटिंग करता रहा। पांच लाख में जैसे ही तोड़बट्टा हुआ पुलिस ने धोखाधड़ी के मामले को 151 व 34 जैसी मामूली धारा लगाकर गैंग को छोड़ दिया।
एनजीओ के नाम पर चंदा वसूली करती आ रही इंदौरी चंदागैंग को व्यापारियों की शिकायत पर आगर मालवा पुलिस ने 7 जुलाई की शाम को गिरफ्तार किया था। इनमें सचिन मलिक, अक्षय गुर्जर उर्फ राघव और अमित सिसोदिया के साथ एसपी तिवारी भी था। तिवारी झाबुआ में भी था लेकिन पुलिस के पकड़ने से पहले ही फरार हो गया था। रसीद और रसीद कट्टों के साथ ही गैंग द्वारा वसूले गए 70-80 हजार रुपए जब्त करते हुए पुलिस ने आरोपियों को आगर शहर के एक मात्र कोतवाली थाने के लॉकअप में रखा। उस वक्त भी संदीप मौके पर नहीं था। साथियों के पकड़े जाने के बाद उसने अपने घर पीजी-257 स्कीम-54 (राष्ट्रीय विद्या मंदिर) इंदौर से आगर थाने में अपनी गोठ बिठाना शुरू कर दी।
पांच लाख में हुआ सेटलमेंट
बताया जा रहा है कि थाने के एक आरक्षक ने इस मामले में संदीप की मदद की। उसने 50 हजार की बक्शीश के वादे में संदीप को थाने के बड़े अधिकारी से मिलवाया। मामला भाव-ताव के कारण दो दिन तक टलता रहा। तीसरे दिन 9 जुलाई को सौदा पांच लाख में पटा। छूटने के बाद आरक्षक को उसका हिस्सा दिये बिना गैंग ने आगर छोड़ दिया।
धारा 151 में बदल गई 420
चूंकि पैसा मिलने में देर हो रही थी इसीलिए थाना स्टाफ ने गिरफ्तारी दिखाई लेकिन अपराध की धारा नहीं डाली। सेटलेमेंट होने और हाथ में पैसा आने के बाद पुलिस अधिकारियों ने धोखाधड़ी की शिकायत पर पकड़े गए चंदागैंग के सदस्यों के खिलाफ धारा 151 और 34 के तहत कार्रवाई की। 9 जुलाई की शाम को आगर एसडीएम ने जमानत दी।
420 क्यों नहीं, 151 क्यों..
धारा 420 : जब पुलिस ने व्यापारियों की शिकायत पर वसूली गई रकम और रसीद कट्टों के साथ आरोपियों को गिरफ्तार किया था लेकिन बाद में पुलिस ने कह दिया कि हमारे पास किसी व्यापारी ने लिखित शिकायत नहीं की। इसीलिए धोखाधड़ी का मुकदमा नहीं बनता।
धारा 151 व 34 : सवाल यह उठता है कि जब 420 दर्ज नहीं की गई तो फिर आरोपियों को तीन दिन लॉकअप में क्यों रखा गया? दबंग दुनिया द्वारा लिये गए रिकॉर्डेड बयान में थाने के आधे स्टाफ ने इस बात की पुष्टि की। ऐसे में सवाल यह था कि फिर 151 व 34 की कार्रवाई किस आधार पर की गई? जबकि 151 व 34 प्रतिबंधात्मक धाराएं हैं जो कि अशांति फैलाने के मामले में लगाई जाती है।
फिर राणापुर में केस क्यों? जिन चार लोगों में से तीन (अमित सिसोदिया, सचिन मलिक और अक्षय गुर्जर)को पुलिस ने गिरफ्तार किया और धारा 151 लगाकर छोड़ दिया उन्हें 17 जुलाई को (9 जुलाई को आगर थाने से छूटने के 8 दिन बाद ही) झाबुआ की राणापुर पुलिस ने धोखाधड़ी के मामले में गिरफ्तार किया। उस वक्त भी संदीप बाहर था। आगर से छुड़वाने वाले संदीप और उसके साथी राणापुर भी गए थे लेकिन वहां टीआई भीमसिंह मीणा ने कानून का साथ दिया और कार्रवाई की।
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शिकायत नहीं तो कार्रवाई नहीं
सर चंदागैंग के लोगों के खिलाफ धोखाधड़ी क्यों दर्ज नहीं की?
किसी ने रिपोर्ट नहीं की होगी।
फिर 151 जैसी सामान्य धारा क्यों लगी?
हो सकता है वहां झगड़े जैसी स्थिति उत्पन्न हो गई हो।
जब्त रुपए और रसीद कट्टों की जांच क्यों नहीं की?
कोई शिकायत मिलेगी तभी तो कार्रवाई होगी।
कहा तो यह जा रहा है कि पांच लाख रुपए लेकर पुलिस ने इस काम को किया?
आरोप बेबुनियाद है। ऐसा होता तो गिरफ्तारी भी क्यों दिखाते।
आगर से छुटने के बाद झाबुआ में भी तो पकड़े गए?
वहां केस की परिस्थिति अलग होगी।
एस.एस.नागर, थाना प्रभारी
तो टीआई के खिलाफ भी होगी कार्रवाई
मामला मेरे संज्ञान में आज आया है। मैं फाइल खुलवाता हूं। जांच करवाता हूं और आवश्यकता पड़ी तो थाना प्रभारी के खिलाफ भी कार्रवाई करेंगे।
आर.एस.मीणा, एसपी
आगर मालवा
इंदौर. विनोद शर्मा ।
कैंसर और एड्स पीड़ितों के नाम पर चंदा वसूली करती आ रही इंदौर की चंदागैंग के खिलाफ जुलाई में ही झाबुआ की तरह ही आगर पुलिस ने भी कार्रवाई की थी लेकिन मामला पांच लाख रुपए के लेनदेन के बाद रफादफा हो गया। तीन दिन तक चंदागैंग के तीन सदस्य लॉकअप में रहे और इधर थाना स्टाफ मास्टर माइंड संदीप से सेटिंग करता रहा। पांच लाख में जैसे ही तोड़बट्टा हुआ पुलिस ने धोखाधड़ी के मामले को 151 व 34 जैसी मामूली धारा लगाकर गैंग को छोड़ दिया।
एनजीओ के नाम पर चंदा वसूली करती आ रही इंदौरी चंदागैंग को व्यापारियों की शिकायत पर आगर मालवा पुलिस ने 7 जुलाई की शाम को गिरफ्तार किया था। इनमें सचिन मलिक, अक्षय गुर्जर उर्फ राघव और अमित सिसोदिया के साथ एसपी तिवारी भी था। तिवारी झाबुआ में भी था लेकिन पुलिस के पकड़ने से पहले ही फरार हो गया था। रसीद और रसीद कट्टों के साथ ही गैंग द्वारा वसूले गए 70-80 हजार रुपए जब्त करते हुए पुलिस ने आरोपियों को आगर शहर के एक मात्र कोतवाली थाने के लॉकअप में रखा। उस वक्त भी संदीप मौके पर नहीं था। साथियों के पकड़े जाने के बाद उसने अपने घर पीजी-257 स्कीम-54 (राष्ट्रीय विद्या मंदिर) इंदौर से आगर थाने में अपनी गोठ बिठाना शुरू कर दी।
पांच लाख में हुआ सेटलमेंट
बताया जा रहा है कि थाने के एक आरक्षक ने इस मामले में संदीप की मदद की। उसने 50 हजार की बक्शीश के वादे में संदीप को थाने के बड़े अधिकारी से मिलवाया। मामला भाव-ताव के कारण दो दिन तक टलता रहा। तीसरे दिन 9 जुलाई को सौदा पांच लाख में पटा। छूटने के बाद आरक्षक को उसका हिस्सा दिये बिना गैंग ने आगर छोड़ दिया।
धारा 151 में बदल गई 420
चूंकि पैसा मिलने में देर हो रही थी इसीलिए थाना स्टाफ ने गिरफ्तारी दिखाई लेकिन अपराध की धारा नहीं डाली। सेटलेमेंट होने और हाथ में पैसा आने के बाद पुलिस अधिकारियों ने धोखाधड़ी की शिकायत पर पकड़े गए चंदागैंग के सदस्यों के खिलाफ धारा 151 और 34 के तहत कार्रवाई की। 9 जुलाई की शाम को आगर एसडीएम ने जमानत दी।
420 क्यों नहीं, 151 क्यों..
धारा 420 : जब पुलिस ने व्यापारियों की शिकायत पर वसूली गई रकम और रसीद कट्टों के साथ आरोपियों को गिरफ्तार किया था लेकिन बाद में पुलिस ने कह दिया कि हमारे पास किसी व्यापारी ने लिखित शिकायत नहीं की। इसीलिए धोखाधड़ी का मुकदमा नहीं बनता।
धारा 151 व 34 : सवाल यह उठता है कि जब 420 दर्ज नहीं की गई तो फिर आरोपियों को तीन दिन लॉकअप में क्यों रखा गया? दबंग दुनिया द्वारा लिये गए रिकॉर्डेड बयान में थाने के आधे स्टाफ ने इस बात की पुष्टि की। ऐसे में सवाल यह था कि फिर 151 व 34 की कार्रवाई किस आधार पर की गई? जबकि 151 व 34 प्रतिबंधात्मक धाराएं हैं जो कि अशांति फैलाने के मामले में लगाई जाती है।
फिर राणापुर में केस क्यों? जिन चार लोगों में से तीन (अमित सिसोदिया, सचिन मलिक और अक्षय गुर्जर)को पुलिस ने गिरफ्तार किया और धारा 151 लगाकर छोड़ दिया उन्हें 17 जुलाई को (9 जुलाई को आगर थाने से छूटने के 8 दिन बाद ही) झाबुआ की राणापुर पुलिस ने धोखाधड़ी के मामले में गिरफ्तार किया। उस वक्त भी संदीप बाहर था। आगर से छुड़वाने वाले संदीप और उसके साथी राणापुर भी गए थे लेकिन वहां टीआई भीमसिंह मीणा ने कानून का साथ दिया और कार्रवाई की।
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शिकायत नहीं तो कार्रवाई नहीं
सर चंदागैंग के लोगों के खिलाफ धोखाधड़ी क्यों दर्ज नहीं की?
किसी ने रिपोर्ट नहीं की होगी।
फिर 151 जैसी सामान्य धारा क्यों लगी?
हो सकता है वहां झगड़े जैसी स्थिति उत्पन्न हो गई हो।
जब्त रुपए और रसीद कट्टों की जांच क्यों नहीं की?
कोई शिकायत मिलेगी तभी तो कार्रवाई होगी।
कहा तो यह जा रहा है कि पांच लाख रुपए लेकर पुलिस ने इस काम को किया?
आरोप बेबुनियाद है। ऐसा होता तो गिरफ्तारी भी क्यों दिखाते।
आगर से छुटने के बाद झाबुआ में भी तो पकड़े गए?
वहां केस की परिस्थिति अलग होगी।
एस.एस.नागर, थाना प्रभारी
तो टीआई के खिलाफ भी होगी कार्रवाई
मामला मेरे संज्ञान में आज आया है। मैं फाइल खुलवाता हूं। जांच करवाता हूं और आवश्यकता पड़ी तो थाना प्रभारी के खिलाफ भी कार्रवाई करेंगे।
आर.एस.मीणा, एसपी
आगर मालवा
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