अब प्राधिकरण को करना है नामांतरण
इंदौर. विनोद शर्मा ।
स्कीम 54 के दो बेशकीमती प्लॉटों को गलत तरीके से आवंटित करने के मामले में पूर्व आईडीए अध्यक्ष कृपाशंकर शुक्ला, आईएएस अधिकारी रामकिंकर गुप्ता को बरी किए जाने के बाद हाईकोर्ट ने बचे हुए दो आरोपियों को भी क्लीन चिट दे दी है। सभी आरोपियों को मिली क्लीनचिट ने जहां गड़बड़ी के आरोपों को सिरे से खारिज कर दिया है वहीं इन प्लॉटों के नामांतरण का रास्ता भी खोल दिया है। बहरहाल, प्राधिकरण ने नामांतरण की प्रक्रिया भी शुरू कर दी है।
21 दिसंबर 2009 को ईओडब्लयू द्वारा भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम की धारा 13(1)डी, 13(2) और भादवि की धारा 420, 120बी, 468, 467, 471 के तहत दर्ज किए गए मुकदमे (9/2009) की सुनवाई भष्ट्राचार निवारण अधिनियम के अंतर्गत गठित विशेष न्यायालय में विशेष न्यायाधीश जे.पी.सिंह के समक्ष हुई। सुनवाई के बाद कोर्ट ने 6 दिसंबर को हाईकोर्ट द्वारा पूर्व में बरी किए गए अन्य लोगों और उनके द्वारा प्रस्तुत किए गए तथ्यों के आधार पर इंदौर विकास प्राधिकरण के दो अधिकारियों (अजय शर्मा और पी.सी.बापना) को भी बरी कर दिया।
नौ आरोपी थे, सात पहले ही हो चुके थे बरी
ईओडब्ल्यू द्वारा दायर प्रकरण में 6 अपै्रल 2016 को विशेष न्यायाधीश बीके पालोदा ने आरोपी शुक्ला, गुप्ता के अलावा प्लॉट खरीदने वाली सुनंदा गुप्ता, वंदना गुप्ता, आईडीए अधिकारी पीसी बाफना, टीएंडसीपी के तत्कालीन संयुक्त संचालक वीपी कुलश्रेष्ठ, दिलीप आगासे, अजय शर्मा और राजीव श्रीवास्तव पर भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम की धारा 13(1)डी, 13(2) और भादवि की धारा 420, 120बी, 468, 467, 471 के तहत आरोप तय किए। इसमें से शर्मा और बाफना को छोड़ बाकी को पहले ही बरी किया जा चुका है।
केस भी खत्म
विशेष न्यायालय ने यह भी स्पष्ट कर दिया है कि अब प्रकरण में कोई भी आरोपी नहीं बचा है। उक्त सभी आरोपी हाईकोर्ट के आदेशानुसार आरोप मुक्त किये जा चुके हैं। इसीलिए प्रकरण में कार्रवाई शेष नहीं रहती।
नामांतरण को मिला रास्ता
एससीएस बिल्डर्स एंड डेवलपर्स ने 4 नवंबर 2008 को एमपी रीयल एस्टेट एंड डेवलपर्स की डायरेक्टर सुनंदा गुप्ता और वंदना गुप्ता से प्लॉट नं. 14 व 16 खरीदे थे। रजिस्ट्री के बाद एससीएस बिल्डर्स ने दोनों प्लॉटों के नामांतरण के लिए 9 जनवरी 2009 को आईडीए में आवेदन किया। प्राधिकरण ने नामांतरण नहीं किया। उल्टा आवेदन खारिज कर दिया। इस फैसले को कंपनी ने हाईकोर्ट में चुनौती दी। कंपनी जीती। कोर्ट के फैसले को प्राधिकरण ने कोर्ट में चुनौती दी। कोर्ट ने पहले के आदेश को यथावत रखा। फिर भी नामांतरण नहीं हुआ। अंत: कंपनी को अवमानना याचिका लगाना पड़ी। जिसमें कोर्ट प्राधिकरण को फटकार चुका है। माना जा रहा है कि अब चूंकि विवाद निपट चुका है इसीलिए प्राधिकरण को नामांतरण करने में दिक्कत होगी भी नहीं।
इन याचिकाओं में यह हुए बरी
याचिका बरी
709/2016 वीपी कुलश्रेष्ठ
826/2016 दिलीप आगाशे
926/2016 कृपाशंकर शुक्ला
1238/2016 राजीव श्रीवास्तव
585/2016 सुनंदा गुप्ता/वंदना गुप्ता
7183/2016 रामकिंकर गुप्ता
1179/2016 पीसी बाफना
1198/2016 अजय शर्मा
यह था आरोपों का जखिरा
टीएंडसीपी द्वारा स्वीकृत स्कीम 54 के नक्शे में प्लॉट नंबर 14 और 16 मुक्तिधाम की ओर बताए गए थे। अप्रैल 2002 में आईडीए ने टीएंडसीपी से स्कीम का संशोधित नक्शा पास कराया। आरोप था कि उक्त दोनों प्लॉटों को मेन रोड पर लाने के लिए हेराफेरी की गई। भूखंडों के पीछे 20 फीट का नाला गायब कर दिया गया। पहले पार्किंग मेन रोड की ओर थी लेकिन प्लॉटों को मुक्तिधाम से दूर करने के लिए इसे प्लॉटों के पीछे कर दिया गया। पार्किंग तक पहुंचने के लिए प्लॉटों के पास से 20 फीट चौड़ी सड़क भी निकाल दी। आईडीए ने स्कीम के प्लॉट नंबर 19 और 17 गायब कर प्लॉट 14 और 16 में शामिल कर लिया। अक्टूबर 2002 में आईडीए ने दोनों प्लॉटों को बेचने के लिए निविदाएं बुलाईं। बाद में प्लॉट सुनंदा व वंदना गुप्ता को आवंटित कर दिए। दोनों प्लॉट मेन रोड के होकर कॉर्नर के हैं। इसलिए स्टाम्प ड्यूटी भी इसी के मुताबिक लगना थी, लेकिन ऐसा नहीं करते हुए शासन को 14 लाख 96 हजार 425 रुपए की
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