कार्रवाई के बजाय पल्ला झाड़ते रहे अधिकारी
इंदौर. चीफ रिपोर्टर ।
तेजपुर गड़बड़ी में आईडीए की सड़क उखाड़कर फेकने वाली ज्योति नगर गृह निर्माण सहकारी संस्था के संचालकों और सड़क बनाने, बचाने व तोड़ने वालों पर कार्रवाई का जिम्मा रखने वाले अधिकारियों की मिलीभगत यदि चर्चा में है तो गलत नहीं है। वैसे भी कार्रवाई के नाम पर आईडीए, नगर निगम और जिला प्रशासन ने अपना पल्ला झाड़ने और एक-दूसरे के पाले में गेंद डालने के अलावा कुछ किया भी नहीं। मार्च 2014 में अपर तहसीलदार द्वारा थमाए गए नोटिस के बाद तत्कालीन कलेक्टर ने भी कार्रवाई आगे बढ़ाने में रुचि नहीं ली।
आईडीए ने 2005 में 14.95 लाख की सड़क 2011 में उखाड़ फेंकी थी। इसकी शिकायत जब आईडीए को दी गई तो जवाब मिला कि हमारा काम आश्रय निधि से सड़क बनाना था। चूंकि अब सड़क नगर निगम की सीमा में है, कार्रवाई भी उन्हें करना है। सड़क जब तोड़ी जा रही थी जब क्षेत्रीय पार्षद दिलीप सुरागे ने जबरस्त विरोध भी किया लेकिन निगम प्रशासन चूप रहा। अपर तहसीलदार रहे प्रदीप कौरव ने जांच की। जांच के बाद 14 मार्च 2014 को कारण बताओ नोटिस (1024/री-4/14) थमाया। कहा कि सप्ताहभर में जवाब दें। अन्यथा आपके खिलाफ वैधानिक कार्रवाई की जाएगी। जवाब नहीं मिला। कौरव का ट्रांसफर जरूर हो गया।
राजस्व मंडल की दखल से रूका सीमांकन
राजस्व निरीक्षक और पटवारी ने रास्ता बंद होने से किसानों का रास्ता प्रभावित होने की बात कही। बावजूद इसके ज्योति नगर संस्था के आवेदन पर इन्हीं अधिकारियों ने सीमांकन की तैयारी कर दी। संस्था सीमांकन के साथ ही अपनी जमीन के चौतरफा बाउंड्रीवाल करना चाहती थी जिसमें यह सड़क भी शामिल हो जाती। इस पर बलजीतसिंह साहनी, देवराज राठौर और अन्य किसानों ने आपत्ति ली। मामला राजस्व मंडल, ग्वालियर पहुंचा। मंडल के आदेश पर सीमांकन रूका।
बिके नहीं तो कार्रवाई करते...
क्षेत्रवासियों का साफ कहना है कि यदि अधिकारियों की भूमिका निर्विवाद होती तो 14.95 लाख रुपए की सड़क तोड़े जाने के मामले में ज्योति नगर संस्था के कर्ताधर्ताओं के खिलाफ कार्रवाई जरूर होती। अन्यथा अधिकारी यही बता दे कि 2014 में जो नोटिस दिया गया था उसके आगे कार्रवाई क्यों नहीं बढ़ी। यदि जमीन वाकई ज्योति संस्था की तो उसने 2005 में आईडीए को रोड क्यों बनाने दी? तब आपत्ति लेने के बजाय छह साल बाद क्यों सड़क उखाड़ी?
सब पुष्टि कर चुके हैं सड़क की
आश्रय निधि के तहत आईडीए से सड़क बनवाने वाले जिला प्रशासन, कच्चे रास्ते को पक्की सड़क की शक्ल देने वाले आईडीए और सड़क किनारे नर्मदा लाइन डालने वाली नर्मदा परियोजना के अधिकारी भी इस बात की पुष्टि कर चुके हैं कि मौके पर कच्चा रास्ता था जो बाद में सड़क बना था।
इंदौर. चीफ रिपोर्टर ।
तेजपुर गड़बड़ी में आईडीए की सड़क उखाड़कर फेकने वाली ज्योति नगर गृह निर्माण सहकारी संस्था के संचालकों और सड़क बनाने, बचाने व तोड़ने वालों पर कार्रवाई का जिम्मा रखने वाले अधिकारियों की मिलीभगत यदि चर्चा में है तो गलत नहीं है। वैसे भी कार्रवाई के नाम पर आईडीए, नगर निगम और जिला प्रशासन ने अपना पल्ला झाड़ने और एक-दूसरे के पाले में गेंद डालने के अलावा कुछ किया भी नहीं। मार्च 2014 में अपर तहसीलदार द्वारा थमाए गए नोटिस के बाद तत्कालीन कलेक्टर ने भी कार्रवाई आगे बढ़ाने में रुचि नहीं ली।
आईडीए ने 2005 में 14.95 लाख की सड़क 2011 में उखाड़ फेंकी थी। इसकी शिकायत जब आईडीए को दी गई तो जवाब मिला कि हमारा काम आश्रय निधि से सड़क बनाना था। चूंकि अब सड़क नगर निगम की सीमा में है, कार्रवाई भी उन्हें करना है। सड़क जब तोड़ी जा रही थी जब क्षेत्रीय पार्षद दिलीप सुरागे ने जबरस्त विरोध भी किया लेकिन निगम प्रशासन चूप रहा। अपर तहसीलदार रहे प्रदीप कौरव ने जांच की। जांच के बाद 14 मार्च 2014 को कारण बताओ नोटिस (1024/री-4/14) थमाया। कहा कि सप्ताहभर में जवाब दें। अन्यथा आपके खिलाफ वैधानिक कार्रवाई की जाएगी। जवाब नहीं मिला। कौरव का ट्रांसफर जरूर हो गया।
राजस्व मंडल की दखल से रूका सीमांकन
राजस्व निरीक्षक और पटवारी ने रास्ता बंद होने से किसानों का रास्ता प्रभावित होने की बात कही। बावजूद इसके ज्योति नगर संस्था के आवेदन पर इन्हीं अधिकारियों ने सीमांकन की तैयारी कर दी। संस्था सीमांकन के साथ ही अपनी जमीन के चौतरफा बाउंड्रीवाल करना चाहती थी जिसमें यह सड़क भी शामिल हो जाती। इस पर बलजीतसिंह साहनी, देवराज राठौर और अन्य किसानों ने आपत्ति ली। मामला राजस्व मंडल, ग्वालियर पहुंचा। मंडल के आदेश पर सीमांकन रूका।
बिके नहीं तो कार्रवाई करते...
क्षेत्रवासियों का साफ कहना है कि यदि अधिकारियों की भूमिका निर्विवाद होती तो 14.95 लाख रुपए की सड़क तोड़े जाने के मामले में ज्योति नगर संस्था के कर्ताधर्ताओं के खिलाफ कार्रवाई जरूर होती। अन्यथा अधिकारी यही बता दे कि 2014 में जो नोटिस दिया गया था उसके आगे कार्रवाई क्यों नहीं बढ़ी। यदि जमीन वाकई ज्योति संस्था की तो उसने 2005 में आईडीए को रोड क्यों बनाने दी? तब आपत्ति लेने के बजाय छह साल बाद क्यों सड़क उखाड़ी?
सब पुष्टि कर चुके हैं सड़क की
आश्रय निधि के तहत आईडीए से सड़क बनवाने वाले जिला प्रशासन, कच्चे रास्ते को पक्की सड़क की शक्ल देने वाले आईडीए और सड़क किनारे नर्मदा लाइन डालने वाली नर्मदा परियोजना के अधिकारी भी इस बात की पुष्टि कर चुके हैं कि मौके पर कच्चा रास्ता था जो बाद में सड़क बना था।
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