छह वर्षों में निलेश को नहीं पकड़कर बयान तक नहीं ले पाया डिपार्टमेंट
इंदौर. विनोद शर्मा ।
जमीनी धोखाधड़ी के मामले में क्राइम ब्रांच से लेकर तेजाजीनगर पुलिस तक जिन अजमेरा बंधुओं के खिलाफ धमाकेदार कार्रवाई कर रही है उनका 400 करोड़ का अंतरराष्ट्रीय हवाला प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) की फाइलों के बोझ तले पांच साल से दबा हुआ है। फॉरेन एक्सचेंज मैनेजमेंट एक्ट (फेमा) के तहत उन 11 टॉप क्लास बिल्डरों को जून 2010 में नोटिस थमाए गए थे जिन्होंने अजमेरा बंधुओं के साथ दुबई में पैसा लगाया था।
18 से 21 नवंबर 2015 के बीच इनकम टैक्स इन्वेस्टिगेशन विंग ने सेटेलाइट, चिराग रियल एम्प्रेस, चौधरी एस्टेट, मयूरी हिना हर्बल प्रा.लि., और फोनिक्स ग्रुप के 20 ठिकानों पर दबिश दी। कार्रवाई आॅर्बिट मॉल स्थित फोनिक्स के आॅफिस, न्यू पलासिया स्थित चौधरी एस्टेट, पालीवालनगर स्थित अजमेरा बंधुओं के घर, चिराग शाह, वीरेंद्र चौधरी और अरुण डागरिया के घर पर हुई थी। अजमेरा बंधुओं द्वारा 20 करोड़ की काली कमाई स्वीकारी। जांच में 400 करोड़ रुपया हवाला के माध्यम से इंदौर से दुबई पहुंचाने की पुष्टि हुई। एक हजार पन्नों की अप्राइजल रिपोर्ट आईटी ईडी को सौंप दी।
नोटिस जारी हुए, पूछताछ हुई, कार्रवाई नहीं...
आईटी की रिपोर्ट के आधार पर ईडी ने फॉरेन एक्सचेंज मैनेजमेंट एक्ट (फेमा) के तहत अजमेरा बंधुओं सहित 13 लोगों के खिलाफ इन्फोर्समेंट केस इन्फॉर्मेशन रिपोर्ट (ईसीआईआर) दर्ज की। जून 2010 में पहली दफा नोटिस थमाए गए। पूछताछ का दौर 2012 तक चलता रहा। आखिरी बार अगस्त 2012 में ईडी ने मुख्य आरोपी निलेश अजमेरा और चिराग शाह को समन देकर बयान के लिए बुलाया था लेकिन निलेश ने बयान नहीं दिए।
निलेश के जवाब के इंतजार में अटकी फाइल
निलेश ने अगस्त 1996 में पासपोर्ट बनवाया था जिसकी वैधता अगस्त 2006 में खत्म हो गई। 2005 में निलेश ने ब्रिटिश नागरिकता ली। इसके बाद निलेश की पूछपरख बढ़ी। उसका भारत व यूएई आना-जाना नहा। 2006-07 में दुबई में जमीन के भाव सातवें आसमान पर थे। तब निलेश ने एक रियल एस्टेट प्रोजेक्ट तैयार किया। इंदौर के ख्यात बिल्डरों से फंड जुटाया और दुबई की अलग-अलग कंपनियों के नाम पर ट्रांसफर किया। इस काम में दुबई के पार्टनरों ने भी मदद की। इसीलिए ईडी ने निलेश को मूल आरोपी माना लेकिन बार-बार समन देने के बाद भी निलेश ईडी के सामने पेश नहीं हुआ। हालांकि ईडी का जवाब हजम नहीं होता क्योंकि छह वर्षों में अर्से तक निलेश इंदौर में ही रहा।
घेरे में थे कई बड़े नाम
आरोपियों में सैटेलाइट समूह के कर्ताधर्ता रितेश अजमेरा उर्फ चंपू, उसका भाई निलेश अजमेरा, हैप्पी धवन, संजय, अरूण डागरिया, चिराग शाह, वीरेंद्र चौधरी, विनोद गुप्ता, मोहन चुघ, अतुल सुराना, अश्विन मेहता, संजय जैन के अलावा जमीन के बड़े खिलाड़ी शरद डोसी व अन्य हैं।
25 प्रतिशत दिया नकद, बाकी पीडीसी
दुबई म लैंड डिपार्टमेंट से जमीन खरीदी। इसीलिए स्थानीय पार्टनर बनाया। 25 प्रतिशत राशि इंदौरी बिल्डरों से फंड जुटाकर दी। बाकी 75 फीसदी राशि के पोस्ट डेटेड चेक (पीडीसी) चेक दे दिए। 2008-09 में मंदी ने जमीन की कीमत 80 फीसदी गिरा दी। ऐसे में उस पूरी जमीन की कीमत अजमेरा द्वारा दी गई पहली किस्त से भी कम हो गई। राशि ज्यादा दी जा चुकी थी, पीडीसी अलग। इसीलिए भारी आर्थिक नुकसान से बचने के लिए अजमेरा बंधु आधे-अधूरे प्रोजेक्ट से जितनी रिकवरी हो सकती थी उतनी करके दुबई से फरार हो गए। इसीलिए वहां दुबई में दो केस दर्ज है।
इंदौर. विनोद शर्मा ।
जमीनी धोखाधड़ी के मामले में क्राइम ब्रांच से लेकर तेजाजीनगर पुलिस तक जिन अजमेरा बंधुओं के खिलाफ धमाकेदार कार्रवाई कर रही है उनका 400 करोड़ का अंतरराष्ट्रीय हवाला प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) की फाइलों के बोझ तले पांच साल से दबा हुआ है। फॉरेन एक्सचेंज मैनेजमेंट एक्ट (फेमा) के तहत उन 11 टॉप क्लास बिल्डरों को जून 2010 में नोटिस थमाए गए थे जिन्होंने अजमेरा बंधुओं के साथ दुबई में पैसा लगाया था।
18 से 21 नवंबर 2015 के बीच इनकम टैक्स इन्वेस्टिगेशन विंग ने सेटेलाइट, चिराग रियल एम्प्रेस, चौधरी एस्टेट, मयूरी हिना हर्बल प्रा.लि., और फोनिक्स ग्रुप के 20 ठिकानों पर दबिश दी। कार्रवाई आॅर्बिट मॉल स्थित फोनिक्स के आॅफिस, न्यू पलासिया स्थित चौधरी एस्टेट, पालीवालनगर स्थित अजमेरा बंधुओं के घर, चिराग शाह, वीरेंद्र चौधरी और अरुण डागरिया के घर पर हुई थी। अजमेरा बंधुओं द्वारा 20 करोड़ की काली कमाई स्वीकारी। जांच में 400 करोड़ रुपया हवाला के माध्यम से इंदौर से दुबई पहुंचाने की पुष्टि हुई। एक हजार पन्नों की अप्राइजल रिपोर्ट आईटी ईडी को सौंप दी।
नोटिस जारी हुए, पूछताछ हुई, कार्रवाई नहीं...
आईटी की रिपोर्ट के आधार पर ईडी ने फॉरेन एक्सचेंज मैनेजमेंट एक्ट (फेमा) के तहत अजमेरा बंधुओं सहित 13 लोगों के खिलाफ इन्फोर्समेंट केस इन्फॉर्मेशन रिपोर्ट (ईसीआईआर) दर्ज की। जून 2010 में पहली दफा नोटिस थमाए गए। पूछताछ का दौर 2012 तक चलता रहा। आखिरी बार अगस्त 2012 में ईडी ने मुख्य आरोपी निलेश अजमेरा और चिराग शाह को समन देकर बयान के लिए बुलाया था लेकिन निलेश ने बयान नहीं दिए।
निलेश के जवाब के इंतजार में अटकी फाइल
निलेश ने अगस्त 1996 में पासपोर्ट बनवाया था जिसकी वैधता अगस्त 2006 में खत्म हो गई। 2005 में निलेश ने ब्रिटिश नागरिकता ली। इसके बाद निलेश की पूछपरख बढ़ी। उसका भारत व यूएई आना-जाना नहा। 2006-07 में दुबई में जमीन के भाव सातवें आसमान पर थे। तब निलेश ने एक रियल एस्टेट प्रोजेक्ट तैयार किया। इंदौर के ख्यात बिल्डरों से फंड जुटाया और दुबई की अलग-अलग कंपनियों के नाम पर ट्रांसफर किया। इस काम में दुबई के पार्टनरों ने भी मदद की। इसीलिए ईडी ने निलेश को मूल आरोपी माना लेकिन बार-बार समन देने के बाद भी निलेश ईडी के सामने पेश नहीं हुआ। हालांकि ईडी का जवाब हजम नहीं होता क्योंकि छह वर्षों में अर्से तक निलेश इंदौर में ही रहा।
घेरे में थे कई बड़े नाम
आरोपियों में सैटेलाइट समूह के कर्ताधर्ता रितेश अजमेरा उर्फ चंपू, उसका भाई निलेश अजमेरा, हैप्पी धवन, संजय, अरूण डागरिया, चिराग शाह, वीरेंद्र चौधरी, विनोद गुप्ता, मोहन चुघ, अतुल सुराना, अश्विन मेहता, संजय जैन के अलावा जमीन के बड़े खिलाड़ी शरद डोसी व अन्य हैं।
25 प्रतिशत दिया नकद, बाकी पीडीसी
दुबई म लैंड डिपार्टमेंट से जमीन खरीदी। इसीलिए स्थानीय पार्टनर बनाया। 25 प्रतिशत राशि इंदौरी बिल्डरों से फंड जुटाकर दी। बाकी 75 फीसदी राशि के पोस्ट डेटेड चेक (पीडीसी) चेक दे दिए। 2008-09 में मंदी ने जमीन की कीमत 80 फीसदी गिरा दी। ऐसे में उस पूरी जमीन की कीमत अजमेरा द्वारा दी गई पहली किस्त से भी कम हो गई। राशि ज्यादा दी जा चुकी थी, पीडीसी अलग। इसीलिए भारी आर्थिक नुकसान से बचने के लिए अजमेरा बंधु आधे-अधूरे प्रोजेक्ट से जितनी रिकवरी हो सकती थी उतनी करके दुबई से फरार हो गए। इसीलिए वहां दुबई में दो केस दर्ज है।
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