भू-माफियाओं को मिला ‘सरकार’ का साथ, सड़ती रही शिकायतें
इंदौर. विनोद शर्मा ।
नए तालाब बनाना तो दूर उसके बारे में सोचने में भी नाकाम रहे प्रशासनिक अमले की मिलीभगत से खजराना के तीन तालाब चोरी हो चुके हैं। जो चौथा तालाब बचा है वह आज तालाब कम सेप्टिक टैंक ज्यादा नजर आता है। आंकड़ों के लिहाज से बात करें तो खजराना में तालाब की 10 एकड़ से ज्यादा जमीन थी जबकि बची बमुश्किल पांच-साढ़े पांच एकड़ जमीन। सजग क्षेत्रवासियों की सतत शिकायतों के बावजूद चोरी हुए तालाबों पर कॉलोनियां कट चुकी है।
जल स्रोतों के संरक्षण को लेकर रंग-बिरंगे प्रजेंटेशन देने वाली ‘सरकार’ की तालाबों के प्रति चिंता सतही है। इसका बड़ा उदाहरण है खजराना। राजस्व रिकार्ड और क्षेत्रवासियों की मानें तो क्षेत्र में किसी वक्त चार तालाब हुआ करते थे। आज अस्तित्व में सिर्फ एक ही तालाब है, वह भी मटमेला। बाकी तीन तालाबों का अस्तित्व दस्तावेजों में ही दफन होकर रह गया। क्षेत्र के जानकार और सरकारी जमीनों पर कब्जे के खिलाफ अर्से तक कानूनी लड़ाई लड़ते रहे नासिर मेवाड़वाला ने तालाबों की जमीन बचाने के लिए भी कोशिश की। कई शिकायतें की लेकिन अधिकारियों ने वक्त रहते ध्यान ही नहीं दिया।
कहां गया तालाब...
-- सर्वे नं. 435/1/1 की जमीन में से तकरीबन पांच एकड़ जमीन के हिस््से (खजराना थाने से लगा हुआ) पर भी कभी एक तालाब हुआ करता था। बाद में प्रशासन ने यह जमीन मप्र वाणिज्यिक कर अल्प आय गृह निर्माण सहकारी संस्था को दे दी। बीते साल वापस ले लिया। हालांकि जमीन राजस्व रिकार्ड में अब भी संस्था के ही नाम है। इस बात की पुष्टि संस्था के अध्यक्ष शोभरन सिंह भी करते हैं। उनका कहना है कि मुलत: तालाब था या नहीं यह तो नहीं पता लेकिन यहां तलाई की तरह पानी जरूर भरा रहता था।
-- सर्वे नं. 425 की 0.344 जमीन पर तालाब और सर्वे नं. 432 की 0.219 हेक्टेयर पाल की जमीन पर कॉलोनी कट चुकी है। भू-माफियाओं ने अवैध रूप से प्लॉट बेचे और मकान बनवा दिए।
-- इसी तरह सर्वे नं. 251 की 0.421 हेक्टेयर जमीन पर भी कॉलोनी कट चुकी है।
-- ये कॉलोनियां विगत 15 वर्षों में कटी है। इससे पहले तालाब और तलई की जमीन को लोगों ने बराबर करके खेती शुरू कर दी थी। बाद में कॉलोनियां कटी। यहां 300 से लेकर 700 रुपए वर्गफीट तक में 50-100 रुपए के स्टॉम्प पर प्लॉट बेचे गए।
उम्मीद जागी है...
खजराना में सीलिंग की जमीन पर कटी कॉलोनी के खिलाफ हुई सरकारी तोड़फोड़ ने क्षेत्र के तालाब चिंतकों में उम्मीद जगा दी है। अब लोगों को लगने लगा है कि यदि वे महकमे में बैठे सख्ती पसंद अफसरों की शरण लें तो तालाब कब्जे मुक्त हो जाएंगे। यदि ऐसा होता है तो क्षेत्र को और भी तालाब मिलेंगे जो पेयजल के काम भले न आए लेकिन जलपुनर्भरण का काम जरूर लिया जा सकता है।
प्रशासन ने ध्यान ही नहीं दिया...
कभी चार तालाब थे। एक की जमीन संस्था को सरकार ने ही दे दी जबकि दो पर कब्जे करके भू-माफियाओं ने कॉलोनियां का डाली। हमने संघर्ष समिति बनाई। कई शिकायतें की लेकिन उन शिकायतों पर अमल करने के बजाय अधिकारी आंख बंद करके बैठ गए। अब जब सरकार सीलिंग की जमीन बचाना चाहती है तो हम भी कोशिश करेंगे, उम्मीद है कार्रवाई होगी।
नासिर मेवाड़वाला, क्षेत्रवासी
खसरा नं. रकबा (हेक्टेयर) उपयोग
432 0.219 ताल की पार
425 0.344 तालाब
251 0.421 तालाब (पोखर)
4351/1/1 5 एकड़ ......
जमीन जहां तालाब है...
902 3.137 तालाब
(7 एकड़ 32743 वर्गफीट जमीन है कुल इस तालाब की। इसमें से अभी तालाब बमुश्किल 5-साढेÞ पाच एकड़ जमीन बची है। बाकी पर लोगों ने कब्जे कर लिया। या सरकार ने सड़क निकाल दी।)
इंदौर. विनोद शर्मा ।
नए तालाब बनाना तो दूर उसके बारे में सोचने में भी नाकाम रहे प्रशासनिक अमले की मिलीभगत से खजराना के तीन तालाब चोरी हो चुके हैं। जो चौथा तालाब बचा है वह आज तालाब कम सेप्टिक टैंक ज्यादा नजर आता है। आंकड़ों के लिहाज से बात करें तो खजराना में तालाब की 10 एकड़ से ज्यादा जमीन थी जबकि बची बमुश्किल पांच-साढ़े पांच एकड़ जमीन। सजग क्षेत्रवासियों की सतत शिकायतों के बावजूद चोरी हुए तालाबों पर कॉलोनियां कट चुकी है।
जल स्रोतों के संरक्षण को लेकर रंग-बिरंगे प्रजेंटेशन देने वाली ‘सरकार’ की तालाबों के प्रति चिंता सतही है। इसका बड़ा उदाहरण है खजराना। राजस्व रिकार्ड और क्षेत्रवासियों की मानें तो क्षेत्र में किसी वक्त चार तालाब हुआ करते थे। आज अस्तित्व में सिर्फ एक ही तालाब है, वह भी मटमेला। बाकी तीन तालाबों का अस्तित्व दस्तावेजों में ही दफन होकर रह गया। क्षेत्र के जानकार और सरकारी जमीनों पर कब्जे के खिलाफ अर्से तक कानूनी लड़ाई लड़ते रहे नासिर मेवाड़वाला ने तालाबों की जमीन बचाने के लिए भी कोशिश की। कई शिकायतें की लेकिन अधिकारियों ने वक्त रहते ध्यान ही नहीं दिया।
कहां गया तालाब...
-- सर्वे नं. 435/1/1 की जमीन में से तकरीबन पांच एकड़ जमीन के हिस््से (खजराना थाने से लगा हुआ) पर भी कभी एक तालाब हुआ करता था। बाद में प्रशासन ने यह जमीन मप्र वाणिज्यिक कर अल्प आय गृह निर्माण सहकारी संस्था को दे दी। बीते साल वापस ले लिया। हालांकि जमीन राजस्व रिकार्ड में अब भी संस्था के ही नाम है। इस बात की पुष्टि संस्था के अध्यक्ष शोभरन सिंह भी करते हैं। उनका कहना है कि मुलत: तालाब था या नहीं यह तो नहीं पता लेकिन यहां तलाई की तरह पानी जरूर भरा रहता था।
-- सर्वे नं. 425 की 0.344 जमीन पर तालाब और सर्वे नं. 432 की 0.219 हेक्टेयर पाल की जमीन पर कॉलोनी कट चुकी है। भू-माफियाओं ने अवैध रूप से प्लॉट बेचे और मकान बनवा दिए।
-- इसी तरह सर्वे नं. 251 की 0.421 हेक्टेयर जमीन पर भी कॉलोनी कट चुकी है।
-- ये कॉलोनियां विगत 15 वर्षों में कटी है। इससे पहले तालाब और तलई की जमीन को लोगों ने बराबर करके खेती शुरू कर दी थी। बाद में कॉलोनियां कटी। यहां 300 से लेकर 700 रुपए वर्गफीट तक में 50-100 रुपए के स्टॉम्प पर प्लॉट बेचे गए।
उम्मीद जागी है...
खजराना में सीलिंग की जमीन पर कटी कॉलोनी के खिलाफ हुई सरकारी तोड़फोड़ ने क्षेत्र के तालाब चिंतकों में उम्मीद जगा दी है। अब लोगों को लगने लगा है कि यदि वे महकमे में बैठे सख्ती पसंद अफसरों की शरण लें तो तालाब कब्जे मुक्त हो जाएंगे। यदि ऐसा होता है तो क्षेत्र को और भी तालाब मिलेंगे जो पेयजल के काम भले न आए लेकिन जलपुनर्भरण का काम जरूर लिया जा सकता है।
प्रशासन ने ध्यान ही नहीं दिया...
कभी चार तालाब थे। एक की जमीन संस्था को सरकार ने ही दे दी जबकि दो पर कब्जे करके भू-माफियाओं ने कॉलोनियां का डाली। हमने संघर्ष समिति बनाई। कई शिकायतें की लेकिन उन शिकायतों पर अमल करने के बजाय अधिकारी आंख बंद करके बैठ गए। अब जब सरकार सीलिंग की जमीन बचाना चाहती है तो हम भी कोशिश करेंगे, उम्मीद है कार्रवाई होगी।
नासिर मेवाड़वाला, क्षेत्रवासी
खसरा नं. रकबा (हेक्टेयर) उपयोग
432 0.219 ताल की पार
425 0.344 तालाब
251 0.421 तालाब (पोखर)
4351/1/1 5 एकड़ ......
जमीन जहां तालाब है...
902 3.137 तालाब
(7 एकड़ 32743 वर्गफीट जमीन है कुल इस तालाब की। इसमें से अभी तालाब बमुश्किल 5-साढेÞ पाच एकड़ जमीन बची है। बाकी पर लोगों ने कब्जे कर लिया। या सरकार ने सड़क निकाल दी।)
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