इंदौर. विनोद शर्मा ।
बड़वानी आॅपरेशन में 40 लोगों की आंखों की रोशनी गई। सरकार ने आनन-फानन में 17 दवाओं की बिक्री प्रतिबंधित कर दी। गुरुवार तक मेडिकल संचालकों तक प्रतिबंध की सूचना पहुंची ही नहीं। यह बात अलग है कि जिन 11 कंपनियों की दवाएं प्रतिबंधित हुई उनमें से 80 फीसदी की दवाएं इंदौर के मेडिकल्स पर उपलब्ध है ही नहीं। मेडिकल्स संचालकों का कहना है कि कंपनियां लोकल है और ये सिर्फ सरकारी सप्लाई के लिए ही दवाएं बनाती है। ऐसे में बड़ा सवाल यह है कि सड़क-बिल्डिंग से लेकर हर निर्माण तक क्वालिटी एश्योरेंस की बात करने वाली सरकार मोतियाबिंद जैसे सेंसेटिव आॅपरेशन लोकल दवाओं के भरौसे कैसे कर सकती है।
दवाओं की बिक्री पर लगे सरकारी प्रतिबंध की पड़ताल करने पहुंची दबंग दुनिया टीम ने 25 मेडिकल स्टोर पर विजिट की। एक-दो स्टोर छोड़ बाकी जगह 80 फीसदी कंपनियों की दवा नहीं मिली। मेडिकल संचालकों ने रोचक खुलासा किया। बताया लोकल कंपनियों की दवा न डॉक्टर लिखते हैं, न डिमांड रहती है। इन्हें भारीभरकम कमीशन से अफसरों का पेट भरके सरकारी सप्लाई के रास्ते ही खपाया जाता है। वहां इस्तेमाल से पहले न तो इन दवाओं की गुणवत्ता देखी जाती है न इस्तेमाल के बाद के साइड इफेक्ट सोचे जाते हैं। इसीलिए मोतियाबिंद, नसबंदी या टीटी आॅपरेशन के सरकारी अभियान में आए दिन गड़बड़ सामने आ रही है।
एक मुश्त दे दिया 11.80 करोड़ का ठेका
इंदौर की बैरल ड्रग लिमिटेड कंपनी को मध्यप्रदेश पब्लिक हेल्थ सर्विस प्रोक्योरमेंट कॉरपोरेशन लिमिटेड (एमपीपीएचएससीएल) कंपनी के बीच 23 जनवरी 2015 मे 11 करोड 80 लाख की आई ड्रॉप खरीदी का एकमुश्त आॅडर मिला था। इससे कंपनी का टर्नओवर 60 से 65 प्रतिशत तक बढ़ गया। 1.20 करोड़ बॉटल से बढ़कर क्षमता 2 करोड़ बॉटल हो गई। कंपनी आईवी फ्ल्यूड्स और इंजेक्टेबल प्रोडक्ट बनाती है। जिन दवाओं को प्रतिबंधित किया है उनमें बैरल की तीन दवाएं हैं। 0.9 सोडियम क्लोराइज इंजेक्शन (एसआईबी5यू175 और 5185यू183), कम्पाउंड सोडियम लेक्टेड इंजेक्शन। दवा की सरकारी खरीदी प्रतिबंधित कर दी गई है।
बातें समझी जा सकती हैं, बोली नहीं
लोकल कंपनियों की दवा खरीदी के मामले में स्वास्थ्य विभाग में ही जिम्मेदार पद पर पदस्थ एक अधिकारी ने आॅफ द रिकार्ड दवा खरीदी में कमीशनबाजी की बात स्वीकारी। उन्होंने उदाहरण देते हुए कहा कि सरकार जहां हर मामले में क्वालिटी प्रोडक्ट और क्वालिटी कंट्रोल की बात करती है वहीं हैल्थ में कमीशनबाजों की कम्प्रोमाइज लोगों के जीवन से खिलवाड़ है। यदि पर्याप्त बजट है तो सही दवा दो। यदि बजट नहीं है तो आॅपरेशन के टार्गेट कम कर दो ताकि व्यक्ति को क्वालिटी ट्रिटमेंट मिले।
कोई लैब ही नहीं है...
स्वास्थ्य विभाग से जुड़े सूत्रों की मानें तो निजी कंपनियों से खरीदी जा रही दवाओं की इस्तेमाल से पहले गुणवत्ता जांचने के लिए मप्र सरकार के पास कोई लैबोरेटरी नहीं है। कंपनियां दवाई को लेकर जो क्वालिटी रिपोर्ट देती है उसे ही मानना पड़ता है फिर उसकी हकीकत चाहे जो हो। बताया जा रहा है दवा कंपनियों के साथ भोपाल स्तर पर सेटिंग होती है। यहां पर्चेस के लिए अलग डिपार्टमेंट है। ड्रग कंट्रोलर आॅफिस, आयुक्त आॅफिस से लेकर मंत्रालय तक के लोग इन्वॉल्व रहते हैं।
एमवाय की दवाओं की क्वालिटी भी दाव पर...
एमवाय में ही 6-7 करोड़ रुपए/सालाना की दवाई खरीदी जाती है। इसमें 20 प्रतिशत दवाओं के इस्तेमाल को लेकर आपत्ति आती है। ज्यादातर सर्जिकल आइटम रहते हैं। रबर ग्लब्स, आॅपरेशन इक्यूपमेंट्स। बिटाडिन सौल्यूशन, इंजेक्शन सिफाटॉक्सीन, अमिकासिन, सिप्रासिन टेजोबेक्टम जैसी दवाओं की गुणवत्ता पर सवाल उठते हैं।
लोकल और अन्य दवाओं में अंतर...
एक ही फॉर्मुले की लोकल और ब्रांडेड दवाओं की बात करें तो ब्रांडेड दवा की एक गोली जो असर करती है उतना असर लोकल तीन गोली नहीं कर पाती। लोकल गोलियों की प्रोटेंसी कम होती है। इसीलिए ईलाज के दौरान डॉक्टर इनका इस्तेमाल कम करते हैं। क्योंकि हर डॉक्टर चाहता है मरीज जल्द ठिक हो।
डॉ. जितेंद्र मालवीय, स्कीम-78
लोकल दवा और ब्रांडेड दवाओं की कीमत में अंतर रहता है। कुछ दवाएं या सोल्यूशन ऐसे हैं जिनकी दवाओं की कीमत सीमय तय है। उससे ज्यादा में नहीं बिकती। इनमें सर्जिकल इक्यूपमेंट और सोल्यूशन भी शामिल हैं। ऐसे में आॅपरेशन के दौरान गुणवत्ता से समझौता नहीं करना चाहिए।
रितेश शर्मा, मेडिकल संचालक
जब केंद्र से लेकर राज्य सरकार तक पैसा दे रही है तो आॅपरेशन के दौरान उच्च कोटी की दवाएं इस्तेमाल होना चाहिए। वह गुणवत्ता के साथ। क्यों कमजोर ईलाज करके लोगों को राइट टू विजन से वंचित किया जा रहा है। न्यूनतम दर पर टेंडर कंस्ट्रक्शन तक ठिक है, ईलाज में नहीं।
डॉ.आनंद राय, आरटीआई कार्यकर्ता
बड़वानी आॅपरेशन में 40 लोगों की आंखों की रोशनी गई। सरकार ने आनन-फानन में 17 दवाओं की बिक्री प्रतिबंधित कर दी। गुरुवार तक मेडिकल संचालकों तक प्रतिबंध की सूचना पहुंची ही नहीं। यह बात अलग है कि जिन 11 कंपनियों की दवाएं प्रतिबंधित हुई उनमें से 80 फीसदी की दवाएं इंदौर के मेडिकल्स पर उपलब्ध है ही नहीं। मेडिकल्स संचालकों का कहना है कि कंपनियां लोकल है और ये सिर्फ सरकारी सप्लाई के लिए ही दवाएं बनाती है। ऐसे में बड़ा सवाल यह है कि सड़क-बिल्डिंग से लेकर हर निर्माण तक क्वालिटी एश्योरेंस की बात करने वाली सरकार मोतियाबिंद जैसे सेंसेटिव आॅपरेशन लोकल दवाओं के भरौसे कैसे कर सकती है।
दवाओं की बिक्री पर लगे सरकारी प्रतिबंध की पड़ताल करने पहुंची दबंग दुनिया टीम ने 25 मेडिकल स्टोर पर विजिट की। एक-दो स्टोर छोड़ बाकी जगह 80 फीसदी कंपनियों की दवा नहीं मिली। मेडिकल संचालकों ने रोचक खुलासा किया। बताया लोकल कंपनियों की दवा न डॉक्टर लिखते हैं, न डिमांड रहती है। इन्हें भारीभरकम कमीशन से अफसरों का पेट भरके सरकारी सप्लाई के रास्ते ही खपाया जाता है। वहां इस्तेमाल से पहले न तो इन दवाओं की गुणवत्ता देखी जाती है न इस्तेमाल के बाद के साइड इफेक्ट सोचे जाते हैं। इसीलिए मोतियाबिंद, नसबंदी या टीटी आॅपरेशन के सरकारी अभियान में आए दिन गड़बड़ सामने आ रही है।
एक मुश्त दे दिया 11.80 करोड़ का ठेका
इंदौर की बैरल ड्रग लिमिटेड कंपनी को मध्यप्रदेश पब्लिक हेल्थ सर्विस प्रोक्योरमेंट कॉरपोरेशन लिमिटेड (एमपीपीएचएससीएल) कंपनी के बीच 23 जनवरी 2015 मे 11 करोड 80 लाख की आई ड्रॉप खरीदी का एकमुश्त आॅडर मिला था। इससे कंपनी का टर्नओवर 60 से 65 प्रतिशत तक बढ़ गया। 1.20 करोड़ बॉटल से बढ़कर क्षमता 2 करोड़ बॉटल हो गई। कंपनी आईवी फ्ल्यूड्स और इंजेक्टेबल प्रोडक्ट बनाती है। जिन दवाओं को प्रतिबंधित किया है उनमें बैरल की तीन दवाएं हैं। 0.9 सोडियम क्लोराइज इंजेक्शन (एसआईबी5यू175 और 5185यू183), कम्पाउंड सोडियम लेक्टेड इंजेक्शन। दवा की सरकारी खरीदी प्रतिबंधित कर दी गई है।
बातें समझी जा सकती हैं, बोली नहीं
लोकल कंपनियों की दवा खरीदी के मामले में स्वास्थ्य विभाग में ही जिम्मेदार पद पर पदस्थ एक अधिकारी ने आॅफ द रिकार्ड दवा खरीदी में कमीशनबाजी की बात स्वीकारी। उन्होंने उदाहरण देते हुए कहा कि सरकार जहां हर मामले में क्वालिटी प्रोडक्ट और क्वालिटी कंट्रोल की बात करती है वहीं हैल्थ में कमीशनबाजों की कम्प्रोमाइज लोगों के जीवन से खिलवाड़ है। यदि पर्याप्त बजट है तो सही दवा दो। यदि बजट नहीं है तो आॅपरेशन के टार्गेट कम कर दो ताकि व्यक्ति को क्वालिटी ट्रिटमेंट मिले।
कोई लैब ही नहीं है...
स्वास्थ्य विभाग से जुड़े सूत्रों की मानें तो निजी कंपनियों से खरीदी जा रही दवाओं की इस्तेमाल से पहले गुणवत्ता जांचने के लिए मप्र सरकार के पास कोई लैबोरेटरी नहीं है। कंपनियां दवाई को लेकर जो क्वालिटी रिपोर्ट देती है उसे ही मानना पड़ता है फिर उसकी हकीकत चाहे जो हो। बताया जा रहा है दवा कंपनियों के साथ भोपाल स्तर पर सेटिंग होती है। यहां पर्चेस के लिए अलग डिपार्टमेंट है। ड्रग कंट्रोलर आॅफिस, आयुक्त आॅफिस से लेकर मंत्रालय तक के लोग इन्वॉल्व रहते हैं।
एमवाय की दवाओं की क्वालिटी भी दाव पर...
एमवाय में ही 6-7 करोड़ रुपए/सालाना की दवाई खरीदी जाती है। इसमें 20 प्रतिशत दवाओं के इस्तेमाल को लेकर आपत्ति आती है। ज्यादातर सर्जिकल आइटम रहते हैं। रबर ग्लब्स, आॅपरेशन इक्यूपमेंट्स। बिटाडिन सौल्यूशन, इंजेक्शन सिफाटॉक्सीन, अमिकासिन, सिप्रासिन टेजोबेक्टम जैसी दवाओं की गुणवत्ता पर सवाल उठते हैं।
लोकल और अन्य दवाओं में अंतर...
एक ही फॉर्मुले की लोकल और ब्रांडेड दवाओं की बात करें तो ब्रांडेड दवा की एक गोली जो असर करती है उतना असर लोकल तीन गोली नहीं कर पाती। लोकल गोलियों की प्रोटेंसी कम होती है। इसीलिए ईलाज के दौरान डॉक्टर इनका इस्तेमाल कम करते हैं। क्योंकि हर डॉक्टर चाहता है मरीज जल्द ठिक हो।
डॉ. जितेंद्र मालवीय, स्कीम-78
लोकल दवा और ब्रांडेड दवाओं की कीमत में अंतर रहता है। कुछ दवाएं या सोल्यूशन ऐसे हैं जिनकी दवाओं की कीमत सीमय तय है। उससे ज्यादा में नहीं बिकती। इनमें सर्जिकल इक्यूपमेंट और सोल्यूशन भी शामिल हैं। ऐसे में आॅपरेशन के दौरान गुणवत्ता से समझौता नहीं करना चाहिए।
रितेश शर्मा, मेडिकल संचालक
जब केंद्र से लेकर राज्य सरकार तक पैसा दे रही है तो आॅपरेशन के दौरान उच्च कोटी की दवाएं इस्तेमाल होना चाहिए। वह गुणवत्ता के साथ। क्यों कमजोर ईलाज करके लोगों को राइट टू विजन से वंचित किया जा रहा है। न्यूनतम दर पर टेंडर कंस्ट्रक्शन तक ठिक है, ईलाज में नहीं।
डॉ.आनंद राय, आरटीआई कार्यकर्ता
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