डीएमआईसी : 35 हजार करोड़ के करार को 5 साल से ‘जमीन’ का इंतजार
- अधिग्रहण कानून, किसानों के विरोध और कंसलटेंट की कामचोरी से अटकी महत्वकांक्षी परियोजना
इंदौर. विनोद शर्मा ।
महत्वकांक्षी दिल्ली मुंबई इंडस्ट्रियल कॉरिडोर (डीएमआईसी) परियोजना पांच साल के लंबे इंतजार और 35 हजार करोड़ के करार के बावजूद आज वेंटिलेटर पर है। जमीन अधिग्रहण कानून, जमीन देने से किसानों के इंकार और मप्र के इंडस्ट्रियल लैंडबिल के प्रति सरकार की सुस्ती के साथ ही कंसलटेंसी कंपनी का काम से परहेज भी इसका बड़ा कारण है।
डीएमआईसी 2009-10 में मंजूर हुआ था। इस परियोजना के पहले चरण तहत चार अर्ली बर्ड प्रोजेक्ट का काम होना था। अक्टूबर 2010 में खजुराहों में संपन्न ग्लोबल इन्वेस्टर्स समिट में डीएमआईसी और उद्योग विभाग के बीच मेमोरेंडम आॅफ अंडरस्टेंडिंग (एमओयू) साइन हुआ था। 5 साल 2 महीने हो चुके हैं लेकिन अब तक डीएमआईसी का अस्तित्व दस्तावेजों से बाहर नहीं आ पाया। लंबे इंतजार के बाद अब स्थिति यह है कि एकेवीएन इंदौर से लेकर उद्योग मंत्री तक यह बताने में अक्षम है कि अट्रेक्टिव प्रजेंटेशन और फाइलों में डीएमआईसी का जैसा स्वरूप अब तक दिखाया जाता रहा है उसे जमीनी जामा कब तक मिलेगा।
चक्रव्यूह में चकरघिन्नी हो चुका डीएमआईसी
- इंदौर एअरपोर्ट से पीथमपुर औद्योगिक क्षेत्र के बीच प्रस्तावित इकोनॉमिक कॉरिडोर की जमीन का अधिग्रहण किसानों के विरोध के कारण अटका हुआ है। कई किसान कोर्ट पहुंच चुके हैं। मामले विचाराधीन हैं। उज्जैन में 448 हेक्टेयर जमीन पर प्रस्तावित नॉलेज सिटी और 223 हेक्टेयर में प्रस्तावित बेटमा क्लस्टर और 178 में प्रस्तावित लॉजिस्टिक हब की स्थिति भी यही है।
- 2013 में केंद्र ने कड़ा जमीन अधिग्रहण कानून जारी कर दिया था जिसके तहत किसानों को जमीन की गाइडलाइन से चार गुना ज्यादा कीमत चुकाना है। अभी कानून विचाराधीन है लेकिन किसान चार गुना मुआवजा चाहते हैं।
- इंदौर विकास प्राधिकरण की तरह राज्य सरकार औद्योगिक उपयोग की जमीन अधिग्रहण करने के लिए जो कानून ला रही है वह भी लंबे समय से केबिनेट/विधानसभा की मंजूरी के इंतजार में अटका है।
कंसलटेंट काम करने को तैयार ही नहीं...
डीएमआईसी को जापान सरकार की मदद से क्रियान्वित किया जाना है। डीएमआईसी, दिल्ली की शर्तों के अनुसार प्रोजेक्ट को कंसलटेंट के माध्यम से डिजाइन व क्वालिटी कंट्रोल करवाना है। प्रोजेक्ट प्लानिंग की जिम्मेदारी मेसर्स लिया एसोसिएट्स को दी थी। कंपनी ने माही पानी परियोजना की प्लानिंग तैयार की जो पूरी तरह हवाई थी। एकेवीएन को इस प्लानिंग में कई बदलाव करना पड़े। इसके बाद कंपनी ने काम में रुचि नहीं ली।
पीएमओ भी जता चुका है असंतोष...
30 सितंबर 2015 को डिपार्टमेंट आॅफ इंडस्ट्रियल पॉलिसी एंड प्रमोशन (डीआईपीपी) ने देशभर में प्रस्तावित डीएमआईसी प्रोजेक्ट की मॉनिटरिंग रिपोर्ट बनाकर प्रधान मंत्री कार्यालय को सौंपी। इस रिपोर्ट में मप्र में डीएमआईसी की वास्तविकता पर पीएम नरेंद्र मोदी भी असंतोष व्यक्त कर चुके हैं।
टेंडर में कंपनियों की रुचि नहीं...
30 सितंबर 2015 को पीएमओ भेजी गई रिपोर्ट के अनुसार विक्रम उद्योगपुरी के लिए जो टेंडर निकाले गए थे उनमें कंपनियों ने रुचि नहीं ली। 5 फरवरी 2015 और 8 मई 2015 को टेंडर निकालना पड़े। 8 सितंबर 2015 को इस प्रोजेक्ट को स्टेट लेवल एन्वायरमेंट असेसमेंट अथॉरिटी (एमपीएसईआईएए) इन्वायरमेंट क्लीयरेंस के लिए आवेदन स्वीकार कर चुका है। जल्द ही ईसी मिल जाएगी।
- अधिग्रहण कानून, किसानों के विरोध और कंसलटेंट की कामचोरी से अटकी महत्वकांक्षी परियोजना
इंदौर. विनोद शर्मा ।
महत्वकांक्षी दिल्ली मुंबई इंडस्ट्रियल कॉरिडोर (डीएमआईसी) परियोजना पांच साल के लंबे इंतजार और 35 हजार करोड़ के करार के बावजूद आज वेंटिलेटर पर है। जमीन अधिग्रहण कानून, जमीन देने से किसानों के इंकार और मप्र के इंडस्ट्रियल लैंडबिल के प्रति सरकार की सुस्ती के साथ ही कंसलटेंसी कंपनी का काम से परहेज भी इसका बड़ा कारण है।
डीएमआईसी 2009-10 में मंजूर हुआ था। इस परियोजना के पहले चरण तहत चार अर्ली बर्ड प्रोजेक्ट का काम होना था। अक्टूबर 2010 में खजुराहों में संपन्न ग्लोबल इन्वेस्टर्स समिट में डीएमआईसी और उद्योग विभाग के बीच मेमोरेंडम आॅफ अंडरस्टेंडिंग (एमओयू) साइन हुआ था। 5 साल 2 महीने हो चुके हैं लेकिन अब तक डीएमआईसी का अस्तित्व दस्तावेजों से बाहर नहीं आ पाया। लंबे इंतजार के बाद अब स्थिति यह है कि एकेवीएन इंदौर से लेकर उद्योग मंत्री तक यह बताने में अक्षम है कि अट्रेक्टिव प्रजेंटेशन और फाइलों में डीएमआईसी का जैसा स्वरूप अब तक दिखाया जाता रहा है उसे जमीनी जामा कब तक मिलेगा।
चक्रव्यूह में चकरघिन्नी हो चुका डीएमआईसी
- इंदौर एअरपोर्ट से पीथमपुर औद्योगिक क्षेत्र के बीच प्रस्तावित इकोनॉमिक कॉरिडोर की जमीन का अधिग्रहण किसानों के विरोध के कारण अटका हुआ है। कई किसान कोर्ट पहुंच चुके हैं। मामले विचाराधीन हैं। उज्जैन में 448 हेक्टेयर जमीन पर प्रस्तावित नॉलेज सिटी और 223 हेक्टेयर में प्रस्तावित बेटमा क्लस्टर और 178 में प्रस्तावित लॉजिस्टिक हब की स्थिति भी यही है।
- 2013 में केंद्र ने कड़ा जमीन अधिग्रहण कानून जारी कर दिया था जिसके तहत किसानों को जमीन की गाइडलाइन से चार गुना ज्यादा कीमत चुकाना है। अभी कानून विचाराधीन है लेकिन किसान चार गुना मुआवजा चाहते हैं।
- इंदौर विकास प्राधिकरण की तरह राज्य सरकार औद्योगिक उपयोग की जमीन अधिग्रहण करने के लिए जो कानून ला रही है वह भी लंबे समय से केबिनेट/विधानसभा की मंजूरी के इंतजार में अटका है।
कंसलटेंट काम करने को तैयार ही नहीं...
डीएमआईसी को जापान सरकार की मदद से क्रियान्वित किया जाना है। डीएमआईसी, दिल्ली की शर्तों के अनुसार प्रोजेक्ट को कंसलटेंट के माध्यम से डिजाइन व क्वालिटी कंट्रोल करवाना है। प्रोजेक्ट प्लानिंग की जिम्मेदारी मेसर्स लिया एसोसिएट्स को दी थी। कंपनी ने माही पानी परियोजना की प्लानिंग तैयार की जो पूरी तरह हवाई थी। एकेवीएन को इस प्लानिंग में कई बदलाव करना पड़े। इसके बाद कंपनी ने काम में रुचि नहीं ली।
पीएमओ भी जता चुका है असंतोष...
30 सितंबर 2015 को डिपार्टमेंट आॅफ इंडस्ट्रियल पॉलिसी एंड प्रमोशन (डीआईपीपी) ने देशभर में प्रस्तावित डीएमआईसी प्रोजेक्ट की मॉनिटरिंग रिपोर्ट बनाकर प्रधान मंत्री कार्यालय को सौंपी। इस रिपोर्ट में मप्र में डीएमआईसी की वास्तविकता पर पीएम नरेंद्र मोदी भी असंतोष व्यक्त कर चुके हैं।
टेंडर में कंपनियों की रुचि नहीं...
30 सितंबर 2015 को पीएमओ भेजी गई रिपोर्ट के अनुसार विक्रम उद्योगपुरी के लिए जो टेंडर निकाले गए थे उनमें कंपनियों ने रुचि नहीं ली। 5 फरवरी 2015 और 8 मई 2015 को टेंडर निकालना पड़े। 8 सितंबर 2015 को इस प्रोजेक्ट को स्टेट लेवल एन्वायरमेंट असेसमेंट अथॉरिटी (एमपीएसईआईएए) इन्वायरमेंट क्लीयरेंस के लिए आवेदन स्वीकार कर चुका है। जल्द ही ईसी मिल जाएगी।
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