Monday, December 28, 2015

बक्से में पूरी हो गई उपकरणों की उम्र

खरीदी का मनमाना खेल, तांक पर रोगी कल्याण
इंदौर. विनोद शर्मा।
कायाकल्प के नाम पर करोड़ों रुपया खर्च करने वाले एमवायएच प्रशासन की मरीजों को लेकर सोच कितनी सतही है इसका अंदाजा अस्पताल परिसर में इस्तेमाल के इंतजार में कबाड़ हो रहे उपकरणों से लगाया जा सकता है। फिर मुद्दा एक्सरे डिपार्टमेंट में पेटीपेक पड़ी कम्प्यूटराइज्ड डिजिटल रेडियोग्राफी (सीडीआर) मशीन का हो या फिर बक्से में ही गारंटी पीरियड पूरे कर चुके वेंटिलेटर का। अतिआवश्यक सेवाओं के नाम पर लाखों रुपया पानी की तरह बहाकर इन उपकरणों की खरीदी की गई थी।
दवा और उपकरणों की खरीदी को लेकर सरकार जितनी पारदर्शिता की बात करती है हकीकत उसकी उतनी ही उलटी है। यहां तो कमीशन के लालच में जबरिया मांग बताकर उपकरण खरीदे जाते हैं। यह बात अलग है कि उनका इस्तेमाल अर्से तक हो या न हो। इस्तेमाल के इंतजार में ही अस्पताल परिसर में दर्जनों उपकरण सड़ रहे हैं। सूत्रों की मानें तो एक्स-रे विभाग में सीडीआर मशीन सालभर पहले खरीदी गई थी। आज तक बक्से से बाहर नहीं आई। मशीन की खरीदी डिजिटल रेडियोग्राफी के लिए की गई थी। हालांकि एमवाय के पास इस मशीन को चलाने के लिए प्रशिक्षित आॅपरेटर तक नहीं है।
तो फिर खरीदी क्यों..
केज्युअल्टी में जो ट्रामा सेंटर है वहां दर्जनभर से अधिक बॉक्सेस रखे हुए हैं। इन बॉक्स में वेंटिलेटर मशीने हैं। इन मशीनों की खरीदी करीब सवा साल पहले हुई थी। बड़ी बात यह है कि इन मशीनों पर कंपनी ने एक साल की गारंटी दी थी और तीन साल की वारंटी। गारंटी बक्से में ही खत्म हो चुकी है। वारंटी का भी कुछ समय बीत चुका है। ये मशीनें कब खुलेगी और कब इस्तेमाल होगी? इसका जवाब अभी किसी के पास नहीं है। एक वेंटिलेटर मशीन की कीमत 14 लाख है। यदि 12 मशीनें भी हैं तो उनकी खरीदी 1.68 करोड़ में हुई है।
आधी मशीनें बंद...
सूत्रों की मानें तो एक्स-रे डिपार्टमेंट में 7 सीडीआर मशीने हैं जिनमें से चलती सिर्फ 3 ही हैं। चार इस्तेमाल ही नहीं होती। इनमें से कुछ खराब भी है। इसी तरह बड़ी तादाद में खरीदे गए पल्स आॅक्सीमीटर भी बर्बाद पड़े हैं। कंपनी ने ब्रांड के नाम पर चायनीज उपकरण सप्लाई कर दिए ताकि जल्दी खराब हो और जल्दी आॅर्डर मिले।
ऐसे होती है उपकरणों की खरीदी में सेटिंग...
-- दलाल अस्पतालों के सतत संपर्क में रहते हैं। डॉक्टरों को लालच देकर उपकरणों व दवाइयों की जरूरत पैदा करते हैं।
-- चूंकि खरीदी ई टेंडर से होती है। यहां गड़बड़ की संभावना कम रहती है। लिहाजा कंपनी के प्रतिनिधि और दलाल टेंडर जारी होने से पहले ही अस्पतालों से संपर्क कर लेते हैं।
-- यहां वे अपनी कंपनी के उत्पाद के जो स्पेसिफिकेशन हैं उन्हीं स्पेसिफिकेशन को टेंडर की शर्तों में अनिर्वायता के साथ शामिल करवा देते हैं। जैसे यदि कोई कंपनी सोनोग्राफी के 14 र्इंची मॉनिटर बनाती है, बाकी कंपनियां 12 र्इंची बनाती है या फिर 16 र्इंची। ऐसे में कंपनी स्पेसिफिकेशन की शर्त में डलवा देती है कि मॉनिटर 14 र्इंची ही खरीदा जाएगा।
- जब विज्ञप्ती जारी होती है तो 12 और 16 र्इंची मॉनिटर वाली कंपनियां शर्तों के लिहाज से बाहर हो जाती है और मनमाने कोटेशन के बावजूद आॅर्डर मिलता है 14 र्इंची मॉनिटर बनाने वाली कंपनी को।
ऊपर से होती है सेटिंग...
स्पेसिफिकेशन के मापदंड वहीं सेट करते हैं जो टेंडर की शर्तें तय करते हैं। जिनके आदेश से टेंडर जारी होते हैं। जिन्हें खरीदी की जिम्मेदारी सौंपी जाती है।


इंदौर. चीफ रिपोर्टर ।
टार्गेट रहता है जो कि नॉमिनल है। महीने में दो-चार सेंपल का रहता है।
 फेल तो होता ही नहीं है।   चार-पांच साल में एकाध ही फेल होता है।  पुराने केस में सुनवाई चलती रहती है। पांच साल हो गए हैं नए लोगों को हैं। पीडीपीएल  रिपोर्ट  प्रोस्यूकशन  फिर दंड  त्रिवेदी था। पीडीपीएल का मामला है। पीडीपीएल में ही कंसलटेंसी कर रही है।  ड्रग इंस्पेक्टर हैं।
ड्रग की लैब है भोपाल में। कोलकाता में विशेष जाता है। सेंट्रल ड्रग लेब है।  एमवायएच में सेंपल लेने में कभी अजय गोयल का नंबर हो तो  9755112121 गोयल अशोक गोयल है।  मंथनी रिपोर्ट  दिसंबर में बनेगी। ड्रग कंट्रोलर  आॅनलाइन ही नहीं है। 

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