स्वास्थ्य समिति प्रभारी राठौर ने लिखा निगमायुक्त को कड़ा पत्र
स्कीम-31 के प्लॉट नं. 22 पर दी गई 65.09 लाख की माफी ने फिर पकड़ा तूल
इंदौर. विनोद शर्मा ।
लापरवाही पर मस्टरकर्मियों को निलंबित करने वाले नगर निगम आयुक्त को पत्र लिखकर स्वास्थ्य समिति प्रभारी राजेंद्र राठौर ने निगम के अधिवक्ता और आधा दर्जन अधिकारियों पर कार्रवाई की मांग की है। इन्होंने तमाम आपत्तियों के बावजूद स्कीम-31 के प्लॉट नं. 22 पर प्रीमियम आॅन एफएआर के पेटे मिलने वाले 65 लाख रुपए माफ कर दिए थे। बाद में राठौर की पहल पर मामला पकड़ में आया और राशि जमा कराई गई हालांकि अब तक प्लॉट की बिल्डिंग पर्मिशन रद्द है।
राठौर ने 21 दिसंबर को पत्र लिखा है। पत्र में उन्होंने कहा है कि 65 लाख रुपए का पीएफएआर माफ करने के मामले में जब मैंने शिकायत की थी तब अपर आयुक्त मनोज पुष्प ने जांच की थी। जांच में उन्होंने इस बात की पुष्टि कर दी थी कि निगम के अधिवक्ता जाहिद हसन खान ने बिल्डर के पक्ष में अभिमत देकर निगम को आर्थिक नुकसान पहुंचाने का प्रयास किया है। जबकि इसी स्कीम 31 के प्लॉट नं. 27 का नक्शा पास करने से पहले पीएफएआर की बड़ी राशि वसूली गई। जांच रिपोर्ट में आरोपों की पुष्टि के बावजूद आज दिन तक न अभिभाषक के खिलाफ कार्रवाई की गई। न ही दोषी अधिकारियों के खिलाफ। चूंकि आप सख्ती और अनुशासन पसंद है लिहाजा आप से कार्रवाई की उम्मीद करते हैं। ताकि आगे से निगम को नुकसान पहुंचाने वालों को सबक मिले।
65,09 लाख कर दिए थे माफ...
मामला सपना संगीता रोड स्थित स्कीम-31 रेसिडेंशियल और सेमी कमर्शियल है। यहां प्लॉट नं. 22 पर बिल्डिंग के लिए लक्ष्मण दास पिता उदाराम भाटिया एवं अन्य ने आवेदन किया था। स्वीकृति के क्रम में दो फीस मेमो जारी हुए। बिल्डिंग पर्मिशन के 3,89,826 रुपए और कर्मकार कल्याण शुल्क पेटे 2,25,600 रुपए जमा कराए गए। यहां जनवरी 2008 में स्वीकृत हुए मास्टर प्लान-2021 के अनुसार कमर्शियल प्लॉट पर बिल्डिंग पर्मिशन के दौरान अनिवार्य किया गया प्रीमियम आॅन एफएआर नहीं वसूला गया जो 65,09,000 रुपए जोड़ा गया था।
एक वकील ने कहा जमा करो, दूसरे ने कहा माफ...
नक्शा लगने के बाद निगम ने पीएफएआर के लिए 65 लाख का फीस मेमो भी जारी किया। भवन निमार्ता ने आपत्ति ली, कहा शुल्क नहीं चुकाऊंगा। निगम ने विधिक राय ली। अधिवक्ता नवीन नवलखा ने राशि जमा करवाने की राय दी। वहीं अधिकारियों ने बिल्डर को फायदा देने के मकसद से बाद में जाहिद खान की राय ली। खान ने पीएफएआर न लेने की अनुसंशा कर दी।
दो साल बाद जमा कराई राशि
मुख्यालय के भवन अधिकारी (बीेओ) विनोद नागर ने भी लिख दिया शुल्क लेना होगा। भवन निमार्ता ने लोकायुक्त में नागर की शिकायत की। वहां जांच शुरू हुई, इधर भवन निमार्ता ने हाईकोर्ट में याचिका लगाई। नागर को व्यक्तिगत रूप से पार्टी बनाया गया। कोर्ट ने सिटी इंजीनियर भवन अनुज्ञा हरभजनसिंह ने को सुनवाई के निर्देश दिए। सिंह ने जनवरी 2014 में फीस जमा कराने का आदेश दिया। आखिर में राशि जमा कराई गई। उधर, नगर निगम ने बिल्डिंग पर्मिशन रद्द कर दी। इस संबंध में बिल्डर को हाईकोर्ट से आज तक राहत नहीं मिली है।
नहीं तो निगम को 100 करोड़ का नुकसान होता....
प्लॉट नं. 22 के लिए 2012 में आवेदन किया गया था जबकि पीएफएआर लागू हुआ था जनवरी 2008 से। यदि पकड़ में नहीं आता तो प्लॉट नं. 22 से तो 65.09 लाख मिलते ही नहीं बल्कि माफी पर आपत्ति लेने वाले प्लॉट नं. 27 के बिल्डर को भी वसूला गया पीएफएआर लौटाना पड़ता जो भी लाखों में था। इन दो उदाहरणों से जनवरी 2008 से 2012 के बीच जितनी बिल्डिंगों से पीएफएआर वसूला गया था उन्हें भी रास्ता मिल जाता निगम के खिलाफ मोर्चा खोलने का। इसीलिए निगम के लिए घर भेदी साबित हो रहे ऐसे अभिभाषक और अधिकारियों के खिलाफ कड़ी कार्रवाई की जाना चाहिए।
राजेंद्र राठौर, प्रभारी
स्वास्थ्य समिति
स्कीम-31 के प्लॉट नं. 22 पर दी गई 65.09 लाख की माफी ने फिर पकड़ा तूल
इंदौर. विनोद शर्मा ।
लापरवाही पर मस्टरकर्मियों को निलंबित करने वाले नगर निगम आयुक्त को पत्र लिखकर स्वास्थ्य समिति प्रभारी राजेंद्र राठौर ने निगम के अधिवक्ता और आधा दर्जन अधिकारियों पर कार्रवाई की मांग की है। इन्होंने तमाम आपत्तियों के बावजूद स्कीम-31 के प्लॉट नं. 22 पर प्रीमियम आॅन एफएआर के पेटे मिलने वाले 65 लाख रुपए माफ कर दिए थे। बाद में राठौर की पहल पर मामला पकड़ में आया और राशि जमा कराई गई हालांकि अब तक प्लॉट की बिल्डिंग पर्मिशन रद्द है।
राठौर ने 21 दिसंबर को पत्र लिखा है। पत्र में उन्होंने कहा है कि 65 लाख रुपए का पीएफएआर माफ करने के मामले में जब मैंने शिकायत की थी तब अपर आयुक्त मनोज पुष्प ने जांच की थी। जांच में उन्होंने इस बात की पुष्टि कर दी थी कि निगम के अधिवक्ता जाहिद हसन खान ने बिल्डर के पक्ष में अभिमत देकर निगम को आर्थिक नुकसान पहुंचाने का प्रयास किया है। जबकि इसी स्कीम 31 के प्लॉट नं. 27 का नक्शा पास करने से पहले पीएफएआर की बड़ी राशि वसूली गई। जांच रिपोर्ट में आरोपों की पुष्टि के बावजूद आज दिन तक न अभिभाषक के खिलाफ कार्रवाई की गई। न ही दोषी अधिकारियों के खिलाफ। चूंकि आप सख्ती और अनुशासन पसंद है लिहाजा आप से कार्रवाई की उम्मीद करते हैं। ताकि आगे से निगम को नुकसान पहुंचाने वालों को सबक मिले।
65,09 लाख कर दिए थे माफ...
मामला सपना संगीता रोड स्थित स्कीम-31 रेसिडेंशियल और सेमी कमर्शियल है। यहां प्लॉट नं. 22 पर बिल्डिंग के लिए लक्ष्मण दास पिता उदाराम भाटिया एवं अन्य ने आवेदन किया था। स्वीकृति के क्रम में दो फीस मेमो जारी हुए। बिल्डिंग पर्मिशन के 3,89,826 रुपए और कर्मकार कल्याण शुल्क पेटे 2,25,600 रुपए जमा कराए गए। यहां जनवरी 2008 में स्वीकृत हुए मास्टर प्लान-2021 के अनुसार कमर्शियल प्लॉट पर बिल्डिंग पर्मिशन के दौरान अनिवार्य किया गया प्रीमियम आॅन एफएआर नहीं वसूला गया जो 65,09,000 रुपए जोड़ा गया था।
एक वकील ने कहा जमा करो, दूसरे ने कहा माफ...
नक्शा लगने के बाद निगम ने पीएफएआर के लिए 65 लाख का फीस मेमो भी जारी किया। भवन निमार्ता ने आपत्ति ली, कहा शुल्क नहीं चुकाऊंगा। निगम ने विधिक राय ली। अधिवक्ता नवीन नवलखा ने राशि जमा करवाने की राय दी। वहीं अधिकारियों ने बिल्डर को फायदा देने के मकसद से बाद में जाहिद खान की राय ली। खान ने पीएफएआर न लेने की अनुसंशा कर दी।
दो साल बाद जमा कराई राशि
मुख्यालय के भवन अधिकारी (बीेओ) विनोद नागर ने भी लिख दिया शुल्क लेना होगा। भवन निमार्ता ने लोकायुक्त में नागर की शिकायत की। वहां जांच शुरू हुई, इधर भवन निमार्ता ने हाईकोर्ट में याचिका लगाई। नागर को व्यक्तिगत रूप से पार्टी बनाया गया। कोर्ट ने सिटी इंजीनियर भवन अनुज्ञा हरभजनसिंह ने को सुनवाई के निर्देश दिए। सिंह ने जनवरी 2014 में फीस जमा कराने का आदेश दिया। आखिर में राशि जमा कराई गई। उधर, नगर निगम ने बिल्डिंग पर्मिशन रद्द कर दी। इस संबंध में बिल्डर को हाईकोर्ट से आज तक राहत नहीं मिली है।
नहीं तो निगम को 100 करोड़ का नुकसान होता....
प्लॉट नं. 22 के लिए 2012 में आवेदन किया गया था जबकि पीएफएआर लागू हुआ था जनवरी 2008 से। यदि पकड़ में नहीं आता तो प्लॉट नं. 22 से तो 65.09 लाख मिलते ही नहीं बल्कि माफी पर आपत्ति लेने वाले प्लॉट नं. 27 के बिल्डर को भी वसूला गया पीएफएआर लौटाना पड़ता जो भी लाखों में था। इन दो उदाहरणों से जनवरी 2008 से 2012 के बीच जितनी बिल्डिंगों से पीएफएआर वसूला गया था उन्हें भी रास्ता मिल जाता निगम के खिलाफ मोर्चा खोलने का। इसीलिए निगम के लिए घर भेदी साबित हो रहे ऐसे अभिभाषक और अधिकारियों के खिलाफ कड़ी कार्रवाई की जाना चाहिए।
राजेंद्र राठौर, प्रभारी
स्वास्थ्य समिति
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