Thursday, February 18, 2016

पासबुक को चॉकलेट का डिब्बा कहते हैं renuka mata

, डीडी को केडबरी रेणुकामाता मल्टीस्टेट को-आॅपरेटिव बैंक इनकम
टैक्स की कार्रवाई
इंदौर. विनोद शर्मा ।
मल्टीस्टेट को-आॅपरेटिव बैंक के नाम पर चल रही रेणुकामाता हवाला बैंक का सारा कामकाज कोडवर्ड पर टिका है। अपने कर्मचारियों के नाम पर थोकबंद खाते खोलकर बैठे कारोबारी इस बैंक की पासबुक को चॉकलेट का डिब्बा कहते हैं जबकि डिमांड ड्राफ्ट (डीडी) को केडबरी का नाम दिया गया है। बैंक चेक सुविधा नहीं देती। बहरहाल, इनकम टैक्स की कार्रवाई से बैंक कम, कारोबारी ज्यादा दहशतजदा है। बैंक से मिले दस्तावेजों के आधार पर रायपुर में ज्वैलर्स के खिलाफ इनकम टैक्स की छापेमार कार्रवाई जारी है।
रायपुर में 80 लाख रुपए सीज करने के बाद इनकम टैक्स ने सर्वे की कार्रवाई को जैसे सर्च में तब्दील कर दिया था वैसे ही इंदौर और सेंधवा में भी हुआ। सेंधवा से तकरीबन 25 लाख रुपए और  इंदौर से 50 लाख रुपए सीज किए गए। मंगलवार-बुधवार की दरमियानी रात तक जारी रही कार्रवाई के दौरन डीडी व पासबुक के बंच सहित कई महत्वपूर्ण सुराग इनकम टैक्स के हाथ लगे हैं। बैंक सुभाषचौक पार्किंग के सामने 40 हजार रुपए महीने के किराए पर है। यहां 12 कर्मचारी काम करते हैं। बुधवार को बैंक के डायरेक्टर भी इंदौर पहुंचे। अधिकारियों ने उनसे भी पूछताछ की।
फर्जी खातों से खेल
- जिन कारोबार की निर्भरता महाराष्ट्र पर ज्यादा निर्भर है उन्हीं के खाते यहां हैं। जैसे रेडीमेड, बर्तन बाजार, इलेक्ट्रॉनिक आईटम और मोबाइल ऐसेसरिज।
- एक कारोबारी ने कमसकम 5-5 खाते खुलवा रखे हैं।
- सेल्समैन, प्यून
- रेडीमेड कारोबारियों के खाते हैं कारिगर, कांच-बटन और तुरपई करने वालों से लेकर धागे काटने वालों तक के नाम। इंदौर में 2000 रेडीमेड कारोबारी हैं। करीब-करीब सभी के खाते रेणुकामाता, बुलडाना, ज्ञानराधा और रत्नेश्वरी माता बैंक में हैं।
- यहां पेनकार्ड नहीं लगता। पुलिस वेरिफिकेशन के नाम पर लिए पहचान-पत्रों की कॉपी लगाकर यह खाते खुलवाए गए हैं। इनका संचालन कारोबारी या उनके दलाल करते हैं। कर्मचारियों को तो पता ही नहीं है।
सालाना 550 करोड़ से अधिक का कारोबार
बैंक में खातों की संख्या 1500 से 1800 बताई जा रही है। ऐसे में यदि कारोबारियों के 50 फीसदी यानी 750 से 900 खातों में यदि रोज 20 हजार रुपए का ट्रांजेक्शन भी होता है तो 1.50 से 1.80 करोड़ का कारोबार होता है बैंक में। सालाना 547.5 करोड़ से ज्यादा।
तीन महीने तक वैध रहती है डीडी...
- बैंक में जो डीडी बनती है उसकी वैधानिकता 3 महीने की रहती है। इस दौरान डीडी एक से दूसरे और दूसरे से तीसरे कारोबारी के बीच ट्रांसफर होती रहती है। 3 महीने बाद बैंक में संपर्क करके डीडी की वैधानिकता बढ़वाई जा सकती है।
- बैंक के कुछ निजी बैंकों में खाते हैं। उन्हीं खातों के सपोर्ट से डीडी चलती रहती है।
- डीडी को केडबरी कहा जाता है। उदाहरण के तौर पर यदि किसी को
50 हजार रुपए देना है तो कारोबारी कहता है 50 की केडबरी दे दो।
200 नोटिस के बाद कार्रवाई हुई...
सेंधवा में ही संस्था की ब्रांच को एक साल में 200 से अधिक नोटिस दिए गए, लेकिन किसी का भी जवाब नहीं दिया गया। इसके बाद कार्रवाई शुरू की गई है।

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