Tuesday, April 13, 2010

कैलाश ही नहीं, कमिश्नर भी घेरे में



इंदौर। सुगनीदेवी कॉलेज परिसर की लीज की करोड़ों की भूमि की गड़बड़ी में उद्योग मंत्री कैलाश विजयवर्गीय, विधायक रमेश मेंदोला व धनलक्ष्मी केमिकल इंडस्ट्रीज के भागीदार विजय कोठारी और मनीष संघवी के खिलाफ मामले का भंडाफोड़ होने के बाद 2002 से अब तक रहे निगम कमिश्नर भी संदेह के घेरे में आ गए हैं। इतनी बड़ी गड़बड़ी हुई, शिकायतें भी हुई, लेकिन वे आंखें मूंदे रहे। कानूनविदों के मुताबिक, इस दौरान पदस्थ रहे कमिश्नर भी बच नहीं सकते।

कोर्ट ने लोकायुक्त को आदेश दिया है कि 90 दिन (6 जुलाई तक) में जांच प्रतिवेदन पेश करें और संबंधितों के दोषी पाए जाने पर धोखाधड़ी की धाराओं में केस दर्ज करें। इसके चलते फाइलें खंगालना शुरू हो गया है। परिवादी व पूर्व मंत्री सुरेश सेठ का दावा है कि उनके बताए महत्वपूर्ण पांच सूबतों की जांच से मामले का पटाक्षेप हो जाएगा।

सेठ का दावा : इन पांच बिंदुओं की जांच हो तो सुलझे मामला
संस्था अध्यक्ष रमेश मेंदोला ने लीज की जमीन की निगम व टाउन एंड कंट्री प्लानिंग से अनुमति की बात कही है। सेठ व एक्सपर्टो का मत है कि लीज की जमीन बेची-खरीदी ही नहीं जा सकती। ऎसे में तत्कालीन महापौर कैलाश विजयवर्गीय की परिषद ने अनुमति कैसे दी?

जब 2004 में उप सचिव ने गंभीर खामियां पाकर जमीन को धनलक्ष्मी केमिकल इंडस्ट्रीज द्वारा नंदानगर संस्था (मेंदोला) को बेचने की अनुमति नहीं देकर शून्य घोषित किया, तो कमिश्नर क्या करते रहे?

जमीन 2002 में 1.38 करोड़ रू. बेची गई। तब सेठ ने लगभग हर कमिश्नरको शिकायत की, लेकिन उन्होंने कुछ नहीं किया। इस दौरान रहे कमिश्नर नीतेश व्यास, सीबी सिंह, आकाश त्रिपाठी, पी. नरहरि, विनोद शर्मा, नीरज मंडलोई और फिर अब सीबी सिंह की भूमिका पर सवाल उठे हैं। सेठ ने तो हाल ही में सीबी सिंह से फिर शिकायत की थी। लीज की भूमि का उपयोग कैसे बदला?

जब उक्त जमीन पर सहकार के आधार पर स्कूल-कॉलेज निर्माण की महत्वाकांक्षा थी, तो योजनाओं का प्रस्ताव सार्वजनिक क्यों नहीं किया गया, जबकि यह हजारों छात्र-छात्राओं से जुड़ा मामला था।

मेयर इन काउंसिल के पत्र (22 सितंबर 04) में मेंदोला के नाम तीन एकड़ भूमि का नामांतरण स्वीकार एवं आगामी 30 वर्ष यानी 13 नवंबर 2010 के बाद 30 वर्ष के लिए नाममात्र लीज पर मंजूर हुआ, लेकिन इसमें राज्य सरकार की तो स्वीकृति थी ही नहीं।

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