Friday, September 16, 2016

अस्पताल भर्ती, डायरेक्टर डिस्चार्ज

सवालों में प्रशासन की सख्ती
इंदौर. विनोद शर्मा ।
एअर सिलेंडर फटने से हुए हादसे के बाद सख्ती का उदाहरण पेश करते हुए प्रशासन ने क्योरवेल हॉस्पिटल को तो अस्थाई रूप से बंद कर दिया लेकिन अस्पताल मालिक के खिलाफ किसी तरह की कार्रवाई नहीं की गई। न सिर्फ लापरवाही के संबंध में बल्कि इसलिए भी नहीं कि वह तीन आवासीय प्लॉटों को जोड़कर तीस साल से कैसे अस्पताल चलाता आ रहा है। इधर, अस्पताल संचालकों ने प्रशासन के साथ अपनी लड़ाई में साथ देने के लिए इंदौर नर्सिंग होम एसोसिएशन पर भी दबाव बनाना शुरू कर दिया।
विस्फोट के बाद क्योरवेल की मनमानियां भी जगजाहिर हुई। इसके बावजूद तीस साल से अस्पताल चलाते आ रहे सुराना परिवार के माथे पर किसी तरह की शिकन नजर नहीं आई। वे आश्वस्त थे। जैसे तीन आवासीय उपयोग के प्लॉटों को जोड़कर बना अस्पताल नगर निगम की आंख में आए बिना तीस साल चल गया वैसे ही अधिकारियों की मेहरबानी से यह मामला भी एक-दो दिन के हो-हल्ले के बाद ठंडा पड़ जाएगा। उन्हें काफी हद तक कामयाबी मिली भी। जब प्रशासन ने जिम्मेदार संचालकों को छोड़ अस्पताल पर लगाम कसना शुरू कर दी।
और मरीजों को किया शिफ्ट
बताया जा रहा है कि शुक्रवार सुबह तक 28 मरीज भर्ती थे। इसमें से 8-10 को डिस्चार्ज कर दिया गया जबकि बाकी मरीजों के उनकी सहुलियत और सेहत के हिसाब से नजदीकी अस्पतालों में शिफ्ट कर दिया। शिफ्टिंग से डॉक्टर व अन्य स्टाफ भी परेशान हैं।
नर्सिंग होम एसोसिएशन दे साथ
अधिकारियों ने जिस अस्पताल संचालक दिलीप सुराना को बख्श रखा है वह नर्सिंग होम एसोसिएशन के पदाधिकारियों से सतत संपर्क में है। दबाव बनाया जा रहा है कि ऐसोसिएशन इस मामले में प्रशासनिक सख्ती के खिलाफ दखल दे।
क्यों कसे शिकंजा
1- अस्पताल पार्मार्थिक नहीं है। कंपनी द्वारा संचालित है जहां मुलत: चिकित्सा के नाम पर व्यवसाय होता है। 26 दिसंबर 1988 को पंजीबद्ध हुई कयोरवेल हॉस्पिटल प्रा.लि. नाम की कंपनी के डायरेक्टर दिलीप कुमार सुराना, संजीव सुराना, उर्मिला सुराना और निरेन मेहता हैं। इनमें से एक भी मेडिकल फिल्ड से नहीं है। यह सुरटेल टेक्नोलॉजिस प्रा.लि. और सिस्टकॉन टेक्नोलॉजी प्रा.लि. चला रहे हैं।
2- चूंकि यहां लगाई गई मशीनें या उपकरण सीधे मरीजों की जान से जुड़े हैं इसीलिए उनकी बारीकी से मॉनिटरिंग की जिम्मेदारी मैनेजमेंट की है। मैंनेजमेंट को एक-एक उपकरण की निगरानी और मेंटेनेंस के लिए बजट निर्धारित करना पड़ता है। इस बजट का इस्तेमाल कब और किन उपकरणों पर होगा? इसकी उनके पास विधिवत सूची रहती है। आखिरी बार उपकरण कब चेक हुआ से लेकर चेकअप की तारीख तक का चार्ट मैनेजमेंट से लेकर मालिक तक जाता है।
3- ऐसे में सिलेंडर या उसके वॉल्व की खराबी मैनेजमेंट से कैसे छिपी रह सकती थी। बावजूद इसके ‘कर लेंगे’, की मानसिकता के साथ प्रबंधन लापरवाही बरतता रहा।
4- ब्लास्ट के वक्त बेसमेंट में मरीज भर्ती थे जिनमें से 80 फीसदी को दूसरे दिन दोपहर में ही डिस्चार्ज कर दिया गया। जो बचे थे उन्हें चौथी मंजिल पर भर्ती किया। प्रशासन को यह बताना भी उचित नहीं समझा कि ब्लास्ट से उड़ी र्इंट और बिखरे कांच से उस वक्त भर्ती रहे कितने मरीजों या उनके परिजनों को चोट लगी। बस यही बताया जाता रहा कि एक मरीज को ही मामूली चोट लगी है।
5- प्रशासन ने हादसे वाले दिन प्रबंधन को अस्पताल से जुड़े तमाम इंतजामात को मुक्कल करने के निर्देश दिए थे लेकिन शुक्रवार को हुई मरीजों की शिफ्टिंग के वक्त तक भी मलबा ही हटता रहा। मेडिकल इंजीनियर्स द्वारा उपकरणों की बारीक जांच नहीं कराई गई।
6- अस्पताल के नाम पर  1994 में एसबीआई से 18 और 2011 में देना बैंक से 25 लाख का लोन भी अस्पताल के नाम पर लिया जा चुका है

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