दिसंबर 2016 में पास विधेयक, 1973 से लागू होगा
पीड़ितों से कोर्ट जाने के अधिकार तक छीने
इंदौर. विनोद शर्मा ।
एक तरफ मोदी सरकार भू-अधिग्रहण कानून को कड़ा बना रही है ताकि किसानों को उनका वाजिब हक मिले वहीं मप्र सरकार ने मप्र नगर तथा ग्राम निवेश (संशोधन तथा विधिमान्यकरण) विधेयक-2016 को मंजूरी देकर किसानों की कमर तोड़ दी है। इस विधेयक को 1973 से प्रभावशाली माना गया है। मतलब सरकार 43 साल पुराना हवाला देकर किसी भी जमीन को अधिग्रहित कर सकती है। इतना ही नहीं अधिग्रहण के विरुद्ध कोर्ट जाने के अधिकार तक छीन लिए गए हैं। इस कानून के खिलाफ किसान अब एक होने लगे हैं।
सुप्रीम कोर्ट के एक फैसले में बिना जोनल प्लान के पूरे प्रदेश के विकास प्राधिकरणों की स्कीम अवैध करार दी गई थी। इससे बचने के लिए सरकार ने सितंबर में अध्यादेश लाकर कानून से जोनल प्लान ही खत्म कर दिया। अफसरों ने कारगुजारी करते हुए अन्य धाराओं में भी संशोधन कर दिए। इसमें किसानों से जबरिया जमीन लेने जैसा फैसला भी है। केंद्र के भूमि अधिग्रहण कानून के तहत जमीन का अधिग्रहण नहीं होना। यानी अफसर मनमाने तरीके अधिग्रहण के दाम तय करेंगे।
प्रजातंत्र है या...
युवा किसान संघ के अध्यक्ष नीरज द्विवेदी ने बताया कि इंदौर में किसानों ने विरोध करना शुरू कर दिया है। जमीन देने से ऐतराज नहीं है, लेकिन कार्रवाई कानूनन हो। अभी तो यह हाल है कि सुनवाई की उचित व्यवस्था नहीं। यदि किसी किसान को न्याय नहीं मिला तो वह कोर्ट भी नहीं जा सकता है। कानून में संशोधन 43 साल पहले लागू करने से कई विसंगतियां होगी। एक्ट में बदलाव की मंजूरी राष्ट्रपति से भी नहीं ली गई।
सचिव विपिन पाटीदार ने बताया कि 3 साल की समय सीमा खत्म यानी कभी भी जमीन अधिग्रहण हो सकता है। यही नहीं, प्रदेश की सभी शहरी विकास योजनाओं के लिए होने वाले जमीन अधिग्रहण पर किसानों के कोर्ट जाने से रोकने का विवादास्पद बदलाव भी कर दिया।
बदलाव जिनका है बेहद विरोध
संसोधित विधेयक दिसंबर 2016 में मंजूर हुआ तो 1973 से कैसे लागू हो सकता है जबकि इंदौर जैसे शहर का पहला मास्टर प्लान ही 1975 में आया था।
विकास योजना की परिभाषा संशोधित मप्र नगर तथा ग्राम निवेश अधिनियम 1973 की धारा 18-19 को निर्मित विकास योजना तक सीमित रखा गया है। इससे धारा 20-21 के तहत होने वाली जोनल प्लानिंग खत्म कर दी गई है जबकि मास्टर प्लान 2021 जोनल प्लान पर अधारित था।
सुप्रीमकोर्ट के आदेशों के विपरीत जाकर सरकार ने जोनल प्लान को खत्म करने का प्रयास किया है। जोन प्लान खत्म होने से अधिकारी भू-उपयोग में मनमानी करेंगे।
धारा 56 में किए गए बदलाव के अनुसार किसी भी भू-अर्जन की कार्रवाई या भू-अर्जन के दौरान जारी पंचाट ही माना जाएगा। चुनौती नहीं दी जा सकती।
धारा 6 में विधिमान्यकरण के नाम पर किए गए संसोधन के तहत भू-अर्जन से प्रभावित होने वाले किसानों से कोर्ट जाने का अधिकार छीन लिया है।
अभी तो मामला कोर्ट में ही विचाराधीन है
संगठन के दिनेश पालीवाल ने बताया कि संगठन ने संशोधन तथा विधिमान्यकरण अध्यादेश की वैधता और उसमें समाहित किए गए किसान विरोधी बदलाव को मप्र हाईकोर्ट की जबलपुर खंडपीठ में याचिका (डब्ल्यूपी19342) के माध्यम से चुनौती दी थी। जो अभी विचाराधीन है। बावजूद इसके सरकार ने 6 दिसंबर को संसोधन विधेयक मंजूर कर दिया।
इंदौर में 5 हजार एकड़ जमीन पर असर
आईडीए की एमआर 10 और सुपरकॉरिडोर में आने वाली स्कीमें 171, 172, 174 व 151 आदि में करीब 5 हजार एकड़ जमीन टीएंडसीपी के एक्ट से प्रभावित है।
स्कीम 131 बी में किसानों को नोटिस भी दिए जाने लगे हैं। इंफोसिस, टीसीएस आदि को दी गई जमीनें भी कानूनी अड़चन में फंस रही थी। यही वजह है कि पूरे प्रदेश के लिए कानून बदल दिया गया।
इन स्कीमों का भविष्य भी संकट में। स्कीम-165, 169 ए और 169 बी, स्कीम-155।
पीड़ितों से कोर्ट जाने के अधिकार तक छीने
इंदौर. विनोद शर्मा ।
एक तरफ मोदी सरकार भू-अधिग्रहण कानून को कड़ा बना रही है ताकि किसानों को उनका वाजिब हक मिले वहीं मप्र सरकार ने मप्र नगर तथा ग्राम निवेश (संशोधन तथा विधिमान्यकरण) विधेयक-2016 को मंजूरी देकर किसानों की कमर तोड़ दी है। इस विधेयक को 1973 से प्रभावशाली माना गया है। मतलब सरकार 43 साल पुराना हवाला देकर किसी भी जमीन को अधिग्रहित कर सकती है। इतना ही नहीं अधिग्रहण के विरुद्ध कोर्ट जाने के अधिकार तक छीन लिए गए हैं। इस कानून के खिलाफ किसान अब एक होने लगे हैं।
सुप्रीम कोर्ट के एक फैसले में बिना जोनल प्लान के पूरे प्रदेश के विकास प्राधिकरणों की स्कीम अवैध करार दी गई थी। इससे बचने के लिए सरकार ने सितंबर में अध्यादेश लाकर कानून से जोनल प्लान ही खत्म कर दिया। अफसरों ने कारगुजारी करते हुए अन्य धाराओं में भी संशोधन कर दिए। इसमें किसानों से जबरिया जमीन लेने जैसा फैसला भी है। केंद्र के भूमि अधिग्रहण कानून के तहत जमीन का अधिग्रहण नहीं होना। यानी अफसर मनमाने तरीके अधिग्रहण के दाम तय करेंगे।
प्रजातंत्र है या...
युवा किसान संघ के अध्यक्ष नीरज द्विवेदी ने बताया कि इंदौर में किसानों ने विरोध करना शुरू कर दिया है। जमीन देने से ऐतराज नहीं है, लेकिन कार्रवाई कानूनन हो। अभी तो यह हाल है कि सुनवाई की उचित व्यवस्था नहीं। यदि किसी किसान को न्याय नहीं मिला तो वह कोर्ट भी नहीं जा सकता है। कानून में संशोधन 43 साल पहले लागू करने से कई विसंगतियां होगी। एक्ट में बदलाव की मंजूरी राष्ट्रपति से भी नहीं ली गई।
सचिव विपिन पाटीदार ने बताया कि 3 साल की समय सीमा खत्म यानी कभी भी जमीन अधिग्रहण हो सकता है। यही नहीं, प्रदेश की सभी शहरी विकास योजनाओं के लिए होने वाले जमीन अधिग्रहण पर किसानों के कोर्ट जाने से रोकने का विवादास्पद बदलाव भी कर दिया।
बदलाव जिनका है बेहद विरोध
संसोधित विधेयक दिसंबर 2016 में मंजूर हुआ तो 1973 से कैसे लागू हो सकता है जबकि इंदौर जैसे शहर का पहला मास्टर प्लान ही 1975 में आया था।
विकास योजना की परिभाषा संशोधित मप्र नगर तथा ग्राम निवेश अधिनियम 1973 की धारा 18-19 को निर्मित विकास योजना तक सीमित रखा गया है। इससे धारा 20-21 के तहत होने वाली जोनल प्लानिंग खत्म कर दी गई है जबकि मास्टर प्लान 2021 जोनल प्लान पर अधारित था।
सुप्रीमकोर्ट के आदेशों के विपरीत जाकर सरकार ने जोनल प्लान को खत्म करने का प्रयास किया है। जोन प्लान खत्म होने से अधिकारी भू-उपयोग में मनमानी करेंगे।
धारा 56 में किए गए बदलाव के अनुसार किसी भी भू-अर्जन की कार्रवाई या भू-अर्जन के दौरान जारी पंचाट ही माना जाएगा। चुनौती नहीं दी जा सकती।
धारा 6 में विधिमान्यकरण के नाम पर किए गए संसोधन के तहत भू-अर्जन से प्रभावित होने वाले किसानों से कोर्ट जाने का अधिकार छीन लिया है।
अभी तो मामला कोर्ट में ही विचाराधीन है
संगठन के दिनेश पालीवाल ने बताया कि संगठन ने संशोधन तथा विधिमान्यकरण अध्यादेश की वैधता और उसमें समाहित किए गए किसान विरोधी बदलाव को मप्र हाईकोर्ट की जबलपुर खंडपीठ में याचिका (डब्ल्यूपी19342) के माध्यम से चुनौती दी थी। जो अभी विचाराधीन है। बावजूद इसके सरकार ने 6 दिसंबर को संसोधन विधेयक मंजूर कर दिया।
इंदौर में 5 हजार एकड़ जमीन पर असर
आईडीए की एमआर 10 और सुपरकॉरिडोर में आने वाली स्कीमें 171, 172, 174 व 151 आदि में करीब 5 हजार एकड़ जमीन टीएंडसीपी के एक्ट से प्रभावित है।
स्कीम 131 बी में किसानों को नोटिस भी दिए जाने लगे हैं। इंफोसिस, टीसीएस आदि को दी गई जमीनें भी कानूनी अड़चन में फंस रही थी। यही वजह है कि पूरे प्रदेश के लिए कानून बदल दिया गया।
इन स्कीमों का भविष्य भी संकट में। स्कीम-165, 169 ए और 169 बी, स्कीम-155।
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